म.प्र की दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा की पराजय का मुख्य कारण पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र की टिकिट कटना माना जा रहा है। 2023 में वे यहाँ से पराजित हो गए थे। लेकिन जीते हुए कांग्रेस विधायक का चुनाव निरस्त हो जाने के बाद जब उपचुनाव की स्थिति बनी तब श्री मिश्रा जोर - शोर से सक्रिय हो गए क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि पार्टी उन्हीं को उम्मीवारी सौंपेगी । लेकिन सबको चौंकाते हुए पार्टी नेतृत्व ने उनकी जगह किसी अन्य को प्रत्याशी बना दिया। और वह भी ये कहते हुए कि ऐसा आंतरिक सर्वे के आधार पर किया गया। इस फैसले से नाराज नरोत्तम समर्थकों ने दतिया में खूब उपद्रव मचाया। हालाँकि मान - मनौव्वल के बाद ऊपरी तौर पर तो सब शांत हो गया और श्री मिश्रा अपने गुट के साथ चुनाव प्रचार में दिखने लगे लेकिन जो नुकसान होना था वह तो हो ही चुका था। रही - सही कसर पूरी कर दी आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव ने जो 22 हजार वोट ले गए। इनमें यादव समाज के भी हजारों मत माने जा रहे हैं जिनके बारे में भाजपा आश्वस्त थी कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रभाव के चलते उनके सजातीय मत उसके खाते में ही जाएंगे। चुनाव प्रचार में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी। सत्ता और संगठन दोनों मोर्चे पर डटे रहे किंतु निराशा हाथ लगी। उसके बाद गत दिवस पार्टी ने अनुशासन का चाबुक चलाया। जिला संगठन की समस्त इकाइयों को भंग कर दिया गया। कैडर आधारित पार्टी में इस तरह की कार्रवाई नई बात नहीं है किंतु भाजपा में इस बात पर मंथन होना चाहिए कि क्या वह पहले जैसी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं वाली पार्टी ही है जो गुटबाजी से मुक्त थी। कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल, नारायण प्रसाद गुप्ता (सभी दिवंगत) और उन जैसे समर्पित अनेक संगठनकर्ता अब नहीं दिखाई देते । एक जमाना था जब संगठन मंत्री की कार्यप्रणाली केवल पार्टी के हित में होती थी। साधारण कार्यकर्ताओं और बड़े नेताओं के बीच संपर्क और संवाद निरंतर बना रहता था। लेकिन आज वह गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। जो संगठन मंत्री पार्टी में गुटबाजी दूर करने नियुक्त होते थे वे खुद भी गुटीय राजनीति में लिप्त हैं। उन पर वे सभी आरोप लगने लगे हैं जिनके लिए राजनीतिक नेता बदनाम होते हैं। नब्बे के दशक में लालकृष्ण आडवाणी ने भाजपा को पार्टी विथ डिफरेंस (औरों से भिन्न) बताकर एक बड़े वर्ग में उसके लिए आकर्षण उत्पन्न किया था। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि भले ही भाजपा ने चुनावी सफलता के कीर्तिमान स्थापित करते हुए केंद्र और तमाम राज्यों की सत्ता हासिल कर ली किंतु इस आपाधापी में उसकी संगठनात्मक कसावट कुछ कमजोर हुई है। यही वजह है कि उसमें ऐसे लोग आते जा रहे हैं जिनका उद्देश्य सत्ता से जुड़े लाभ हासिल करना मात्र है। दतिया ही क्यों बिहार की बाँकीपुर सीट से आ रही जानकारी से भी इसी बात की पुष्टि हो रही है कि पार्टी को हरवाने में उसी के लोग आगे रहे। जब भी ऐसा होता है अनुशासन का डण्डा घूमता है। लेकिन अगला चुनाव आते तक सारे निलम्बन और बर्खास्तगी रद्द हो जाती है। यही वजह है कि अपने अहं की संतुष्टि के लिए पार्टी के विरुद्ध काम करने वालों के मन में कोई खौफ नहीं बचा। जहाँ तक बात पार्टी के ग्राफ की है तो ये निःसंकोच स्वीकार करना पड़ेगा कि आज वह सफलता के उच्चतम शिखर पर है। लगातार तीसरी बार केंद्र में सत्ता पर कब्जा करना साधारण बात नहीं है। देश के अनेक प्रमुख राज्यों में उसकी सरकारें हैं। किसी जमाने में उत्तर भारत और सवर्णों की पार्टी के तौर पर जानी जाने वाली भाजपा अब हर दृष्टि से राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत में है। उसकी मारक क्षमता में हुई वृद्धि आश्चर्यचकित करती है। नीतिगत मोर्चे पर उसने अपने समर्थक वर्ग को काफी हद तक संतुष्ट भी किया है। पूर्वोत्तर जैसे अछूते इलाकों में भी वह मुख्य धारा की पार्टी बन गई है। लेकिन इस विस्तार के लिए जो समझौते और गठबंधन उसे करना पड़े वे उन लोगों को पसंद नहीं आ रहे जो पार्टी की जड़ों से जुड़े हैं। हालांकि ये भी मानना पड़ेगा कि आज की स्थिति में फिलहाल भाजपा का कोई विकल्प राष्ट्रीय स्तर पर नजर नहीं आ रहा। इसलिए ये जरूरी है कि वह अपने भीतर घुस आई उन बुराइयों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करे जिनके चलते समय - समय पर दतिया और बाँकीपुर जैसी शर्मिंदगी उसे झेलनी पड़ जाती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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