अगस्त महीने की शुरुआत तक म.प्र में मानसून की आधी बारिश हो जाती थी। लेकिन इस साल एक चौथाई से भी कम बरसात होने से न केवल किसान अपितु व्यापारी और सामान्य जन भी परेशान हैं। सरकार के माथे पर भी पसीना छलछलाने लगा है। कई जिलों में धान की बोनी बरसात के अभाव में बेकार चली गई। भूजल स्तर नीचे जाने से सिंचाई हेतु लगाए गए पंप आदि भी जवाब देने लगे हैं। गर्मियों में पीने के पानी की जो किल्लत हुई वह बरसात के मौसम में भी जारी रहने से आगामी गर्मियों में क्या होगा इसकी चिंता स्थानीय निकायों को सताने लगी है। अच्छे मानसून से हमारे देश में व्यापार भी फलता - फूलता है जिस पर आर्थिक विकास की इमारत खड़ी होती है। बढ़ते शहरीकरण के बाद भी भारतीय बाजारों में रौनक ग्रामीण भारत के बल पर ही आती है। चिंता का सबसे बड़ा कारण ये है कि वर्षा कम होने से खरीफ फसल तो खराब होगी ही जमीन सूखी होने से अगली रबी फसल पर भी इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। फसलें खराब होने से खाद्यान्न का अभाव होगा जिसका परिणाम महंगाई के रूप में देखने मिलेगा। हालांकि ज्योतिष शास्त्र के जानकारों का कहना है कि सनातनी मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष अधिक मास ( पुरुषोत्तम मास) होने से सावन की शुरुआत भी देर से हुई लिहाजा मानसून का दौर भी देर तक चलेगा। यदि ऐसा होता है तब भी गनीमत है किंतु उस स्थिति में भी धान सहित इस मौसम की फसलें खराब होने से किसानों को भारी नुकसान होना तय है। लेकिन सावन और भादों में भी मानसून रूठा रहा तब पीने के पानी के साथ ही बिजली का संकट भी उत्पन्न हुए बिना नहीं रहेगा क्योंकि प्रदेश के जितने भी बड़े बांध हैं उनमें जलभराव की स्थिति बेहद चिंताजनक है। बांध खाली रहने से पनबिजली उत्पादन तो घटेगा ही, नहरों से होने वाली सिंचाई में भी कमी आयेगी। लंबे अरसे बाद ये हालात उत्पन्न हुए हैं जब म.प्र का बड़ा हिस्सा कमजोर मानसून का शिकार हो रहा है। वरना बरसात का आंकड़ा कुछ जिलों में कम तो कुछ में ज्यादा होने से औसत बराबर हो जाया करता था। लेकिन इस साल अब तक जो स्थिति देखने मिल रही है उसके मुताबिक प्रदेश का बड़ा हिस्सा मानसून की बेरुखी झेलने मजबूर है। नदियों का मायका कहे जाने वाले इस राज्य में अनेक बड़े बांध भी हैं। उनमें होने वाले जल भंडारण से म.प्र ही नहीं बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र के हित भी जुड़े हुए है। इसलिये शासन - प्रशासन को अभी से आपदा प्रबंधन की योजना बना लेनी चाहिए। इस स्थिति में वर्षा जल संचयन ( वाटर हार्वेस्टिंग) अभियान की उपेक्षा भी उभरकर आ रही है। घरों सहित सरकारी भवनों की छतों पर वर्षा जल को बेकार नालियों में बहने देने के बजाय निकटवर्ती नलकूप से जोड़ देने से उसका भूजल स्तर गर्मियों में भी बना रहता है। इसके अलावा छतों से आने वाले बरसाती पानी को एक गड्ढे ( सोक पिट) के जरिये जमीन के नीचे भेज देने से भी आस - पास का भूजल स्तर बरकरार रहने से अल्प वृष्टि के समय जल संकट से निपटना आसान हो जाता है। वर्षा जल संचयन बेहद महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी मूलतः स्थानीय निकायों की है। कम से कम नये बनने वाले भवनों में तो इसे अनिवार्य किया ही जा सकता है। नये भवनों का नक्शा स्वीकृत करने में भी वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से किये जाने के निर्देश होते हैं। लेकिन इस बारे में ध्यान नहीं दिये जाने से ये योजना केवल कागजों और आंकड़ों तक ही सीमित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर से ही सही किंतु अंततोगत्वा इंद्र देव प्रसन्न होकर पर्याप्त वर्षा करवा देंगे जिससे प्रदेश को जल संकट से राहत मिलने के साथ ही किसानों की चिंता दूर हो सकेगी। लेकिन ऐसे अवसरों पर आपदा प्रबंधन के साथ ही आपदा को अवसर बनाने की सूझबूझ भी दिखानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है मानसून के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय भविष्य में आने वाले संकट से निपटने के पुख्ता इंतजाम समय रहते किये जाएं। पानी की बरबादी रोकने के अलावा उसके संचयन की प्रणाली को जन अभियान बनाकर लागू किया जाना चाहिए। मानसून ने इस वर्ष जो चेतावनी दी है उससे सावधान होकर भविष्य में आने वाले संकट के लिए प्रदेश को तैयार रहना चाहिए। शासन और प्रशासन के साथ ही जनता को भी ये याद रखना चाहिए कि जल ही जीवन है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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