Tuesday, 7 July 2026

बर्फ़ानी बाबा के लिए खतरा बना आस्था का अतिरेक


जम्मू कश्मीर स्थित अमरनाथ की पवित्र गुफा में स्वनिर्मित बर्फ के शिवलिंग का दर्शन करने लाखों श्रृद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। दुर्गम रास्तों से होते हुए वहाँ पहुँचने का सफर मुश्किल  होने के बाद भी आस्था के वशीभूत देश - विदेश से सनातनी परंपरा के अनुगामी शिव भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। पहले पहलगाम से चंदनबाड़ी होते हुए अमरनाथ पहुंचा जाता था, जिसमें तीन दिन लगते थे। लेकिन अब बालटाल से  दूसरा मार्ग  खुल जाने से यात्रा की अवधि कम हो गई है। यात्रियों के लिए पूरे रास्ते में निःशुल्क भोजन का प्रबंध भंडारों के रूप में होता है। यह यात्रा कश्मीर घाटी के मुस्लिम वॅाशिंदों के लिए आय का बड़ा साधन है क्योंकि अमरनाथ आने वाले यात्रियों का बड़ा वर्ग कश्मीर में अन्य स्थानों का भ्रमण भी करता है जिसके कारण वहाँ पर्यटन उद्योग भी फलता - फूलता है। यद्यपि आतंकवाद के दौर  में घाटी का पर्यटन बहुत कम हो गया था किंतु अमरनाथ यात्रा का उत्साह लगातार बढ़ता रहा जो आतंकवाद की प्रतिक्रिया थी। धारा 370 हटने के बाद घाटी के हालात सुधरे तब इस यात्रा का आकर्षण और बढ़ा। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद श्रृद्धालुओं में नये सिरे से जोश दिखाई देने लगा। इस साल गर्मियों में जम्मू कश्मीर में पर्यटकों की संख्या ने भी पुराने कीर्तिमान तोड़ दिये। इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष अमरनाथ यात्रा में श्रृद्धालुओं की बाढ़ आ जायेगी। यद्यपि कश्मीर घाटी से आतंकवाद की विदाई हो चुकी है किंतु उसके कुछ बीज अभी भी अंकुरित हो जाते हैं। यही कारण है कि यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था का दायित्व  सेना को सौंपा जाता है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर जिस पहलू पर लोगों का ध्यान नहीं जाता वह है इस यात्रा से अमरनाथ के पर्यणवरण पर पड़ने वाला प्रभाव। 3 जुलाई से  अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही मात्र चार दिनों में लगभग 60 हजार यात्री अमरनाथ की यात्रा कर चुके हैं। 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा हेतु 4 लाख लोगों का पंजीयन हो चुका है। लेकिन श्रृद्धालुओं को निराश करने वाली खबर ये है कि पवित्र गुफा में बनने वाला पवित्र हिम शिवलिंग तेजी से पिघलकर  करीब एक फीट का रह गया है । जबकि मई माह में इसकी ऊंचाई लगभग 7 फीट और  पहली पूजा के समय  5 फीट से अधिक थी। यदि यही स्थिति रही और पर्यटकों की भीड़ निरंतर बढ़ती गई तब आने वाले दिनों में गुफा के भीतर शिवलिंग आकार ही नहीं लेगा। उल्लेखनीय है अमरनाथ में बढ़ती भीड़ के कारण प्राकृतिक विपदाएं भी आने लगी हैं। इस साल वहाँ हेलीकाप्टर सेवा रोकने का कारण भी पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकना ही है। सोचने वाली बात ये है कि श्रृद्धालु जिस प्रकृति निर्मित पवित्र शिवलिंग के दर्शन हेतु तरह - तरह के कष्ट सहने के साथ ही समय और पैसा खर्च करते हुए आता है, वही उसे न दिखे तो निराशा और दुःख होना स्वाभाविक है। हालांकि अमरनाथ के इस अद्भुत शिवलिंग का पिघलना नई बात नहीं है। प्रतिवर्ष यात्रा शुरू होने के बाद से ऐसा होता है। इसका सीधा कारण इस निर्जन स्थान पर अचानक भीड़ की मौजूदगी है जो दो महीनों तक बनी रहती है। जैसे - जैसे सनातन के प्रति श्रृद्धा और प्रतिबद्धता में वृद्धि हो रही है वैसे - वैसे धर्मस्थलों में जन सैलाब उमड़ने लगा है। लेकिन जो धर्मस्थल पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं उनमें अपेक्षा से अधिक मानवीय उपस्थिति उनके नैसर्गिक स्वरूप के लिए हानिकारक बनती है । भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं इसका प्रमाण हैं। कुछ साल पहले अमरनाथ में  गुफा के पीछे से अचानक आया जनसैलाब प्रलय का एहसास करवा गया था। केदारनाथ त्रासदी की स्मृति भी रोंगटे खड़े कर देती है। ये कहना गलत नहीं है कि  अमरनाथ में शिवलिंग के पिघलने  का सबसे बड़ा कारण वहाँ श्रृद्धालुओं की बढ़ती भीड़ ही है। हमारा आशय किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं है किंतु तीर्थ यात्रा और पर्यटन में जो भावनात्मक अंतर है उसका निहितार्थ समझने की जरूरत है। और जिस बर्फ़ानी बाबा को देखने जाएं , वही लुप्त रहें तो यात्रा का स्वाभाविक आनंद और उससे जुड़ी आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 July 2026

मुंबई की बदहाली शर्मनाक



इस साल मानसून देर से आया। उसके कारण देश के बड़े भूभाग में जल संकट के साथ ही खरीफ फसल के लिए धान के रोपे लगाने में विलंब होने से किसान परेशान है। नदियों, तालाबों और कुओं आदि का जल स्तर खतरे के निशान से भी नीचे चला गया। भूजल स्तर गिरने से जलापूर्ति पर भी बुरा असर पड़ा है। हालांकि अब मानसून सक्रिय होकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन जिस तरह उसके विलंबित होने से स्थिति चिंताजनक हो उठी वही दशा उसके आने के बाद देखने मिल रही है। जिसकी बानगी देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई है। बीते दो - तीन दिनों से वहाँ भारी बारिश होने से जनजीवन अस्त - व्यस्त हो गया है। मुंबई - पुणे के रास्ते में अनेक स्थानों पर भूस्खलन के कारण यातायात अवरुद्ध  है। मुंबई महानगर और उसके उपनगरीय क्षेत्रों में भी अति वृष्टि से सभी व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। निचले इलाकों में जल भराव की समस्या तो सभी शहरों में कमोबेश एक जैसी है। लेकिन मुंबई कोई साधारण शहर न होकर वैश्विक पहचान रखता है। इसीलिए यहाँ होने वाली किसी भी छोटी - बड़ी घटना की चर्चा दूर - दूर तक होती है। आज मिल रही खबरों के  मुताबिक मुंबई से जाने और आने वाली उड़ानें बड़ी संख्या में रद्द की जा चुकी हैं या विलम्बित हैं। इस महानगर की जीवन रेखा कही जाने लोकल ट्रेन सेवा पर भी बुरा असर पड़ा है। दर्जनों गाड़ियां रद्द करने से सप्ताह के पहले दिन ही लाखों लोग अपने गन्तव्य तक नहीं जा सके। कुल मिलाकर हालात चिंताजनक होने के साथ ही शर्मनाक भी हैं। हालांकि अप्रत्याशित रूप से होने वाली भारी बरसात के कारण किसी भी शहर में व्यवस्थाएं   गड़बड़ा जाना स्वाभाविक  हैं किंतु मुंबई में ऐसा होना इसलिए शर्मिंदा करता है क्योंकि यह एक अंतर्राष्ट्रीय महानगर होने से देश की छवि को पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करता है।  देश का मुख्य व्यवसायिक केंद्र होने से यहाँ गतिविधियां ठप होने से प्रतिदिन करोड़ों - अरबों का नुकसान होता है। एक ही दिन में जरूरत से ज्यादा बरसात होने पर स्थितियाँ खराब होना स्वाभाविक है लेकिन मुंबई में चूंकि प्रति वर्ष ऐसा होता है इसलिए ये विचारणीय प्रश्न है कि महाराष्ट्र सरकार और मुंबई महानगर पालिका हर साल पैदा होने वाले इस संकट से लोगों को बचाने के लिए क्या करते हैं ? हालांकि देश के सभी महानगरों के अलावा अन्य प्रमुख शहरों की स्थिति भी भारी बरसात होने पर चिंताजनक हो जाती है जिससे ये साबित होता है कि हमारे देश में शहरों की बसाहट और उनका नियोजन दोषपूर्ण है।  अनियोजित विस्तार  और आबादी के बढ़ते बोझ के कारण शहरों की कमर टूटती जा रही है। यद्यपि चर्चा बड़े शहरों की ज्यादा होती है लेकिन बढ़ते शहरीकरण का दुष्प्रभाव अब पूरे देश में अनुभव किया जा सकता है। मुंबई में आई मौजूदा आपदा के परिप्रेक्ष्य में इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाये जाने चाहिए। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी योजना के तहत अरबों रुपये खर्च करने के बाद जिन शहरों की सूरत सुधारने का दावा सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है उनमें भी बरसात बुरे हाल कर देती है। इन सबसे साबित होता है कि  सिर्फ महानगर ही नहीं अपितु छोटे और मध्यम आकार के शहरों में आपदा प्रबन्धन की स्थिति चिंताजनक है। हर साल इससे होने वाले नुकसान को रोकने की व्यवस्था हो सके तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान से बचाने के अलावा जनता को होने वाली तकलीफों से निजात मिल सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी