Friday, 31 July 2026

आज के जमाने में मनु स्मृति का जिक्र औचित्यहीन



मल्लिकार्जुन खरगे देश के वरिष्ट राजनेताओं में से हैं।  कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के साथ ही वे राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। । मूलतः कर्नाटक के  खरगे जी दलित समुदाय से आते हैं। अपने गृह राज्य के मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने काफी हाथ - पैर मारे किंतु पार्टी हायकमान ने उन्हें उपकृत न करते हुए उनके  पुत्र प्रियांक को राज्य में मंत्री बनवा दिया जिन्होंने तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे उदयनिधि द्वारा सनातन की तुलना डेंगू और मलेरिया से करते हुए उसे समाप्त करने जैसी बात का खुलकर समर्थन किया था। समय - समय पर मल्लिकार्जुन जी भी अपने दलित होने का एहसास करवाना नहीं भूलते। ताजा प्रमाण राज्यसभा में उनके द्वारा मनु स्मृति का उल्लेख करते हुए लगाये गए आरोप हैं। जब सत्ता पक्ष के साथ ही सदन के सभापति ने उनसे आरोपों को प्रमाणित करने कहा तब वे शांत हो गए। दरअसल मनु स्मृति और मनुवाद ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर दलित समुदाय के मन में सवर्णों के प्रति विद्वेष भरा जाता है। मायावती और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता भी इन्हें बतौर औजार उपयोग करते रहते हैं। इनके अलावा जे.एन.यू की ढपलीबाज टुकड़े - टुकड़े गैंग भी मनुवाद से आजादी के नारे लगाया करती है। दिल्ली के जंतर मंतर  पर संपन्न काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में भी मनुवाद के साथ ही ब्राह्मण वाद के विरोध में नारेबाजी सुनाई दी। पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके भी अपने दलित होने का उल्लेख करते हुए डाॅ. अंबेडकर का पोस्टर लहराते देखे गए। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आरक्षण की श्रेणी में आने वाले राजनेताओं द्वारा अपने समुदाय का भयादोहन करने के लिए मनु स्मृति और मनुवाद के विरोध का ढोल पीटा जाता है। जबकि 21 वीं सदी के भारतीय समाज में 10 फीसदी सवर्ण हिंदुओं को भी मनु स्मृति के बारे में लेशमात्र जानकारी नहीं होगी। यदि  दलित नेता और दलित समुदाय से जुड़े साहित्यकार  मनु स्मृति का जिक्र न करें तब कुछ वर्षों बाद शायद यह लोगों की स्मृति से ही वह विलुप्त हो जाएगी। और फिर जिस मनु स्मृति  के आधार पर दलित राजनीति के पुरोधा ब्राह्मण वाद को कोसते हैं उसका जो अनुवाद वर्तमान में प्रचलित है उसकी प्रामाणिकता ही संदिग्ध है। सवर्ण वर्ग कभी भी अपने बचाव हेतु मनु स्मृति का उपयोग नहीं करता । भारत की सामाजिक व्यवस्था संबंधी किसी भी कानूनी विवाद में मनु स्मृति को आधार अथवा संदर्भ ग्रंथ नहीं माना जाता। ऐसे में खरगे जी और उन जैसे अन्य दलित नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मनु स्मृति के बहाने जो जातिगत विद्वेष फैलाते हैं उससे दलितों का कोई लाभ नहीं होता। दलितों के कल्याण के प्रति उनकी चिंता वाजिब है लेकिन मनु स्मृति के बहाने गैर दलित जातियों के बारे में अनावश्यक प्रलाप करने वाले कांग्रेस अध्यक्ष उस समय क्यों शांत रहे जब कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गाँधी ने सवर्ण समुदाय को कांग्रेस के पक्ष में लाने के लिए खुद को जनेऊ धारी सारस्वत ब्राह्मण  प्रचारित करवाया। इसके बाद वे अनेक मंदिर और मठों में कर्मकांड करते दिखाये गए। मानसरोवर की यात्रा कर शिव भक्त होने का दावा भी किया। यद्यपि उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने के बाद श्री गाँधी को ब्राह्मण साबित करने की मुहिम ठंडी पड़ गई और बीते कुछ सालों से वे जातिगत जन गणना और जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का मुद्दा पकड़कर बैठ गए। खरगे जी ने मनु स्मृति के नाम पर दलितों को शिक्षा से रोके जाने का जो  आरोप लगाया उसका कोई प्रमाण वे नहीं दे सके। सही बात ये है कि आज  आरक्षण के विरोध में जो आवाजें उठ रही हैं उनका कारण श्री खरगे और उन जैसे कुछ दलित नेता ही हैं जिनकी अनावश्यक और अप्रासंगिक टिप्पणियों से सामाजिक समरसता को क्षति पहुंचती है। आजादी के आठ दशक बाद भी  यदि दलित समुदाय आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर दौड़ में पीछे है तो फिर आरक्षण की उपयोगिता और सार्थकता पर दलितों के बीच ही विमर्श होना चाहिए। सवाल ये भी है कि दलित नेताओं की संतानें तो आगे बढ़ जाती हैं तो आम दलित क्यों नहींं? कर्नाटक में कांग्रेस के और भी दलित विधायक होंगे किंतु मंत्री पद पर खरगे जी के बेटे को ही बिठाया गया। सरकारी नौकरियों और राजनीति में जितने भी दलित नेता हैं उनके परिजन हर तरह से सुविधाजनक स्थिति में हैं। ऐसे में इन नेताओं द्वारा मनु स्मृति की आड़ लेकर जो रोना - धोना किया जाता है वह पूरी तरह पाखंड है और  उसी का प्रदर्शन श्री खरगे द्वारा किया गया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 July 2026

कोचिंग माफिया पर भी शिकंजा कसा जाए



लोक परीक्षा संशोधन विधेयक गत दिवस लोकसभा में पारित होने के बाद आज राज्यसभा में विचारार्थ रखा जा रहा है। सत्ता पक्ष के संख्या बल को देखते हुए वहाँ भी इसके स्वीकृत होने की पूरी संभावना है जिसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होकर इसे कानून की शक्ल मिल जायेगी। नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हो जाने के बाद देश भर में सरकार द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों की गोपनीयता भंग होने को लेकर छात्रों के साथ ही उनके अभिभावकों के मन में भी व्यवस्था को लेकर जबरदस्त गुस्सा देखने मिला। कुछ परीक्षार्थियों द्वारा आत्महत्या करने के कारण शिक्षा मंत्रालय की अक्षमता का मुद्दा उठ खड़ा हुआ। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान निशाने में आने लगे। इस चिंगारी को नई -  नवेली कॉकरोच जनता पार्टी ने हवा देकर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन खड़ा कर दिया जिसकी परिणिति श्री प्रधान के त्यागपत्र से हुई। हालांकि शिक्षा मंत्रालय से जुड़े अनेक अधिकारियों पर भी गाज गिरी किंतु परीक्षा संचालित करवाने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के शीर्ष पदाधिकारी को आश्चर्यजनक ढंग से अभय दान दे दिया गया। चौतरफा दबाव के बाद सरकार ने प्रश्न पत्र लीक होने से रोकने के लिए विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति भी गठित कर दी और उसी के साथ प्रश्न पत्र लीक करने वालों को कड़ा दंड देने वाला कानून बनाने की पहल संदर्भित विधेयक के माध्यम से कर दी।  नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने के मामले में कई लोग गिरफ़्त में आ चुके हैं। मामले के त्वरित निपटारे हेतु फास्ट ट्रैक कोर्ट भी गठित किया गया है। सीबीआई इस प्रकरण में जाँच एजेंसी है। इस बारे में  जिन लोगों पर अपराधिक मामले दर्ज हुए उनमें कुछ कोचिंग संचालकों के अलावा प्रश्न पत्र तैयार करने वाले शिक्षक, और दलाल किस्म के लोग हैं। देर - सवेर कुछ और लोगों का पर्दाफ़ाश होना तय है। लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है शिक्षा जैसे पवित्र पेशे में आई इस बुराई की जड़ों में मठा डालने की। और इसके लिए शिक्षा का व्यवसायीकरण रोकना पहली आवश्यकता है। आजकल अखबारी पन्नों के अलावा होर्डिंग्स और डिजिटल मीडिया पर कोचिंग संस्थानों के बड़े - बड़े विज्ञापन इस बात का प्रमाण हैं कि शिक्षा अब पूरी तरह एक उद्योग बन चुकी है जिसमें पूँजी का खेल होने से मुनाफाखोरी चरम पर है। कोचिंग व्यवसाय को माफिया कहा जाना बेशक अटपटा लगता है ।  लेकिन बिहार की राजधानी पटना में दो कोचिंग संचालकों के  विवाद में गोली चलने तक की नौबत आ आ गई जिसके चलते एक संचालक को जेल जाना पड़ा। राजस्थान का कोटा शहर तो कोचिंग की राजधानी कहलाता है। ये बात भी धीरे - धीरे सामने आती जा रही है कि प्रश्न पत्र लीक होने में कोचिंग संचालकों की भी भूमिका रहती है। इनकी अनाप - शनाप कमाई का अंदाज इनके द्वारा प्रचार पर किया जाने वाला खर्च है। अखबार के प्रथम पृष्ठ कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से भरे रहते हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि बिल्डर और ऑटोमोबाइल उद्योग की  टक्कर के विज्ञापनदाता इन दिनों कोचिंग संस्थान हैं।  चूंकि इनका व्यवसाय इनके संस्थान से सफल होकर निकलने वाले छात्रों पर ही टिका होता है इसीलिये ये परीक्षा परिणाम आते ही करोड़ों के विज्ञापनों की झड़ी लगा देते हैं। यही सब देखते हुए प्रश्न पत्र लीक मामले में कतिपय कोचिंग संचालक शक के दायरे में है। जैसी कि चर्चा है उसके अनुसार इस बार की नीट परीक्षा के अलावा अतीत में संघ लोकसेवा आयोग सहित राज्यों की प्रवेश और चयन परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने में शिक्षा माफिया की सक्रिय हिस्सेदारी है। इसीलिये सरकार को चाहिए कोचिंग संस्थानों पर शिकंजा कसने के लिए सख्त इंतजाम करे क्योंकि इनके कारण हमारे देश में शाला स्तर की शिक्षा की गुणवत्ता का सत्यानाश हो रहा है। हाल ही में एक सर्वे ने ध्यान खींचा जिसके अनुसार आई.आई.टी जैसे विश्वस्तरीय संस्थान के प्राध्यापक से अधिक वेतन और भत्ते कोटा के कुछ कोचिंग संस्थान देते हैं। भले ही इसकी पुष्टि न की जा सके किंतु प्रश्न पत्र लीक होने के मामलों में कोचिंग माफिया की गर्दन में फँदा डालना बेहद जरूरी है। वरना कितने भी कानून बना लिए बजाएं पैसे की ताकत के आगे व्यवस्था लाचार नजर आयेगी। इसके साथ ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और संघ लोक सेवा आयोग में होने वाली नियुक्तियों में राजनीतिक प्रतिबद्धता को परे रखते हुए योग्यता और प्रामणिकता का ध्यान रखा जाए। वरना आगे पाट पीछे सपाट की स्थिति बनी रहेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 July 2026

पाक अधिकृत कश्मीर में हो रही बगावत से भारत को सतर्क रहना होगा



पाक अधिकृत कश्मीर के हालात भी बलूचिस्तान की तरह ही बेहद तनावपूर्ण हैं।  पाकिस्तान के हुक्मरानों के अलावा सेना के जनरल चाहे जब जम्मू - कश्मीर को भारत से छीनने की डींगें हाँकते रहते हैं। आजादी के फौरन बाद उसने कबायलियों की शक्ल में बाकायदा सेना भेजकर  कश्मीर के एक हिस्से पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना ने जब हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू किया तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन और शेख अब्दुल्ला के बहकावे में आकर सं.रा संघ में शिकायत कर दी। उसके बाद युद्ध तो रुक गया किंतु पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर का हिस्सा आज तक उसके अधीन ही बना हुआ है। दूसरी समस्या नेहरू जी पैदा कर गए जम्मू - कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा देकर। इसके चलते मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में अलगाववाद बढ़ते - बढ़ते आतंकवाद का रूप ले बैठा जिसके पीछे पाकिस्तान का खुला हाथ था। इसी के तहत घाटी से हिंदुओं को पलायन करने बाध्य किया गया। वहाँ पाकिस्तान का झंडा लहराना और भारत विरोधी नारेबाजी आम बात थी। सेना की टुकड़ियों पर पत्थरबाजी व्यवसाय बन गई थी । इस स्थिति को समाप्त करने के लिए वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने धारा 370 समाप्त करने जैसा साहसिक कदम उठाते हुए जम्मू - कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा विलोपित कर दिया। इसके बाद घाटी में अलगाववाद पूरी तरह समाप्त हो गया हो ये मान लेना तो गलत होगा लेकिन वह लगातार कमजोर होता जा रहा है। आतंकवादियों की गतिविधियां भी पहले से काफी घट गई हैं। हालांकि अपना घर छोड़ने मजबूर किये कश्मीरी हिंदुओं की वापसी अब तक संभव नहीं हो सकी किंतु पहलगाम हत्याकांड के बाद उत्पन्न चिंता और भय अब नहीं दिखाई देता। जिसका प्रमाण वहाँ पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। धारा 370 हटने के बाद राज्य में चुनाव भी सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। लेकिन इसे संयोग कहें या कुछ और कि इधर जम्मू - कश्मीर में शांति स्थापित हो रही है उधर पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के प्रति असंतोष बढ़ते - बढ़ते बगावत की सीमा तक आ पहुंचा है। पाकिस्तानी सेना वहाँ वैसा ही दमन कर रही है जैसा 1971में उसने बांग्लादेश में  किया था। गत दिवस ही सेना की गोली से 30 आंदोलनकारियों के मारे जाने की खबर वहाँ की गंभीर स्थिति का प्रमाण है। जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक पाकिस्तान इस समय उसी समस्या में फंसा हुआ है जो उसने जम्मू - काश्मीर सहित भारत के अनेक हिस्सों में पैदा करने का कुचक्र रचा था। पाक अधिकृत कश्मीर उससे अलग होकर भारत से जुड़ने के संकेत दे रहा है। बलूचिस्तान अपने को अलग देश घोषित कर चुका है। पश्चिमी सीमांत पर खैबर पख्तून और तालिबानी इस्लामाबाद की नींद उड़ाए हुए हैं। सिंध में भी अलगाववाद की दबी हुई चिंगारी फिर भड़कती दिख रही है। कुल मिलाकर मुल्क के अंदरूनी हालात बेहद संगीन हैं। भारत का विभाजन कर अस्तित्व में आया ये देश आज खुद खंडित होने के कगार पर है। भारत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है क्योंकि उसका गिलगित वाला हिस्सा पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया। स्मरणीय है चीन इस क्षेत्र से वन बेल्ट वन रोड जैसे प्रकल्प पर तेजी से काम कर रहा है जिससे उसे प. एशिया और यूरोप तक अपना व्यापार विस्तारित करने में मदद मिलेगी । लेकिन बलूचिस्तान के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का बढ़ता विरोध पाकिस्तान के दुर्भाग्य की पटकथा लिख रहा है। पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत में शामिल होने जा रहा है इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि पाकिस्तान के साथ ही चीन भी आसानी से ऐसा नहीं होने देगा। लेकिन उस पार के कश्मीर में पाकिस्तान का नियंत्रण  लगातार कमजोर होता जा रहा है जो भारत के हित  में है क्योंकि अपनी आंतरिक अशांति से जूझने के कारण  आतँकवाद का निर्यात करने की उसकी क्षमता कमजोर होगी। लेकिन  एक  बात गौरतलब है कि भारत का वह वर्ग जो जम्मू -  कश्मीर में अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए भारतीय सेना को अत्याचारी ठहराने में तनिक भी शर्म नहीं करता था वह पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाये जा रहे दमन चक्र पर मुँह में दही जमाये बैठा है। धारा 370 के हटाये जाने पर छाती पीटने वाली रुदालियों की टोली पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ती देखकर भी शांत है। दरअसल उसे इस बात की चिंता सताये जा रही है कि कश्मीर के उस हिस्से पर पाकिस्तान की पकड़ कमजोर पड़ने से कहीं वह जम्मू कश्मीर के साथ वापस न जुड़ जाए। भारत को इस स्थिति पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि पाकिस्तान और चीन मिलकर भारत के लिए कोई परेशानी खड़ी कर सकते हैं। और फिर हमारे यहाँ आस्तीन के सांप भी कम नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 July 2026

छात्रों की मौत पर हुए आंदोलन के बाद जश्न का क्या औचित्य



काॅकरोच जनता पार्टी ने आज से अपना आंदोलन फिर शुरू करने की धमकी दी है। उसका आरोप है कि जंतर मंतर आंदोलन समाप्त करने के लिए सरकार के साथ जो बातचीत हुई उसमें धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र और नीट पेपर लीक पर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को एक करोड़ रु. की क्षतिपूर्ति के साथ ही इस आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली के अलावा देश के किसी भी हिस्से में छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के बात तय थी। श्री प्रधान ने तो त्यागपत्र दे दिया और पीड़ित परिवारों को आर्थिक क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया भी प्रारंभ हो रही है किंतु छात्रों पर अपराधिक प्रकरण दर्ज होने और गिरफ्तारी की खबरें समझौते का उल्लंघन है। इसके बाद बिहार सरकार ने 26 तारीख तक छात्रों के विरुद्ध दायर सभी प्रकरण वापस लेने का फैसला कर लिया। लेकिन पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके का आरोप है कि दिल्ली और मुंबई में आंदोलन में शामिल  अनेक छात्रों को  पूछताछ के नाम पर जबरन थाने में बिठाकर रखा गया है जिससे उनके मन में भय व्याप्त है। उन्होंने एक वीडियो संदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि यदि उक्त कारवाई जारी रही तो पार्टी दोबारा आंदोलन शुरू कर देगी। इस सबके बीच आंदोलन के नेताओं ने वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल से संपर्क साधा जिन्होंने ऐसे मामलों में कानूनी सहायता का आश्वासन भी दे दिया। इस बारे विचारणीय बात  ये  है कि  आंदोलन खत्म करते समय जो समझौता हुआ था उसमें छात्रों का उल्लेख था। लेकिन जो कारवाई हो रही है वह उन आपराधिक तत्वों के विरुद्ध है जिन्होंने पुलिस पर हमला किया, सरकारी वाहन तोड़े और पत्थरबाजी की। उल्लेखनीय है कि काॅकरोच जनता पार्टी पर जब ये आरोप लगा कि उसके आंदोलन में हिंसक तत्व घुस आये जिन्होंने पुलिस कर्मियों पर हमले किये तब उनका जबाब था कि भाजपा और रास्वसंघ ने अपने गुंडे आंदोलन में भेजकर हिंसा फैलाई। अब जब पुलिस वीडियो और सी.सी कैमरों की रिकार्डिंग के जरिये आंदोलन को हिंसक रूप देने वालों की  धरपकड़ कर रही है तब काॅकरोच जनता पार्टी को  अपनी असलियत सामने आने का डर सता रहा है। जिस समझौते के उल्लंघन का रोना पार्टी नेता रो रहे हैं उसमें भी अपराधी तत्वों को अभयदान का कोई जिक्र नहीं था।  सर्वोच्च न्यायालय ने भी आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए पुलिस की बर्बरता पर जहाँ ऐतराज जताया वहीं उस पर होने वाले हमलों पर भी चिंता जताई। काॅकरोच जनता पार्टी की मांग है कि दिल्ली पुलिस अपनी कारवाई के लिए माफी मांगे लेकिन दूसरी तरफ वह उपद्रवी तत्वों द्वारा पुलिस पर हमले और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के जिम्मेदार लोगों को बचाने में लगी है। इस दोहरे रवैये के कारण वह आलोचनाओं का शिकार हो रही है। आंदोलन के प्रति गंभीरता पर सवालिया निशान भी उसने स्वयं खड़े कर दिये जब सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी के नेताओं के वे वीडियो जारी हुए जिसमें वे लड़के - लड़कियों के साथ किसी आलीशान होटल में नाचते हुए जश्न मनाते दिखे। जब इसे लेकर उनकी फजीहत शुरू हुई तब बजाय शर्मिंदगी व्यक्त करने के कहा गया कि जेन जी का यही तरीका है। यदि ये नाच - गाना आंदोलन खत्म करने वाली रात जंतर मंतर पर हुआ होता तब ये नेता वहाँ मौजूद भीड़ पर उसकी जिम्मेदारी डालकर बच निकलते ।  लेकिन अपना घर छोड़कर  आंदोलन स्थल पर दिन - रात मौजूद रहे कथित जेन जी  को घर वापसी का रास्ता पकड़ने का निर्देश देकर गिने - चुने दरबारियों के साथ नाच - गाने की महफ़िल सजाना उन हजारों युवक - युवतियों के साथ छलावा है जिनके बल पर तीन - चार पेशेवर लोगों ने पूरे देश को अशांत करने की कोशिश की।  बहरहाल , आंदोलन की समाप्ति के बाद  होटल में जश्न मनाते हुए इस पार्टी के नेताओं के वीडियो उन जेन जी लड़के - लड़कियों  के लिए आँखें खोल देने वाले हैं जो उनके बहकावे में आकर कई हफ्ते धूप में पसीना बहाते रहे। और अब तो कपिल सिब्बल ने इस पार्टी को 1 करोड़ रु.देने की घोषणा भी कर दी। इसके बाद  बड़ी बात नहीं यदि बड़ी बात नहीं अगला आंदोलन भी किसी  होटल या रिसार्ट में आयोजित हो क्योंकि हर बात पर ये सफाई दी जाती है कि जेन जी कुछ अलग  हटकर सोचने और करने में यकीन रखते हैं। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 July 2026

दूसरा जंतर मंतर तैयार : आरक्षण हटाओ आंदोलन से जुड़ गए 35 लाख



जंतर मंतर आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र से समाप्त हो गया। उसकी आयोजक  काॅकरोच जनता पार्टी ने स्पष्ट नहीं किया कि वह राजनीतिक दल बनेगी या दबाव समूह के रूप में समय - समय पर उभरती रहेगी। इस पार्टी ने जंतर मंतर का आंदोलन जिस तरह संचालित किया उससे स्पष्ट हो गया कि यदि प्रधान न्यायाधीश काॅकरोच वाली टिप्पणी नहीं करते तब भी किसी और नाम से ये प्रयोग होता ।  इस पार्टी ने उस वर्ग को आकर्षित किया जिसकी चिंता न अतीत है और न ही वर्तमान। उसके लिए उसका भविष्य ही एकमात्र लक्ष्य है। पहले यूजीसी और फिर नीट पेपर लीक ने इस वर्ग को चिंता में डाल दिया जिसे इसने लपक लिया। कोशिश तो देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी ने भी की थी लेकिन उसके नेता मुद्दे को बीच में छोड़कर विदेश यात्रा पर चले गए। आम आदमी पार्टी ने भी प्रयास किया परंतु युवाओं में उसकी विश्वसनीयता नहीं बची। इसीलिए उसने अपने पुराने साथियों को इस पार्टी के रूप में आगे कर युवा असंतोष की चिंगारी को भड़काने का तानाबना बुना। लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बाद भी आंदोलन की सफलता का सेहरा अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, आतिशी और संजय सिंह अपने सिर पर नहीं बांध सके। दूसरी बात ये हुई कि आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत दिपसे ने खुद को दलित बताकर अपनी पहचान स्पष्ट कर दी। इसीलिए भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण ने भी आंदोलन में घुसपैठ बढ़ाई।जंतर मंतर पर ब्राह्मण वाद विरोधी नारे भी इसीलिए लगे। जेएनयू की टुकड़े - टुकड़े गैंग  ने भी जंतर मंतर पर अपनी ढपली पीटकर अश्लीलता का हरसंभव परिचय दिया। सरकार द्वारा मांगे मान लेने के बाद आंदोलन तो खत्म हो गया किंतु नये आंदोलन के बीज बिखेर गया। युवा शक्ति की जीत का ढिंढोरा पीटते हुए डाॅ. अंबेडकर का चित्र  लहराने वाले अभिजीत दिपके और उनके सिपहसालारों ने जिस डिजिटल क्रांति का आगाज किया वह अब उन्हीं के गले पड़ने जा रही है। कॉकरोच जनता पार्टी की तर्ज पर आरक्षण के विरोध में एक पेज इंस्टाग्राम पर बनाये जाते ही उसके साथ 35 लाख लोग जुड़ गए। स्मरण रहे यूजीसी विवाद के समय भी सवर्ण जातियों के युवाओं का गुस्सा सामने आया था। नीट पेपर लीक के चलते वह ठण्डा होता दिखा किंतु काॅकरोच जनता पार्टी ने राख के नीचे दबी चिंगारी को हवा दे दी। इसीलिए जंतर मंतर  से उसका डेरा उठते ही इंस्टाग्राम परआरक्षण हटाओ आंदोलन का शोला भड़क उठा। इसका नारा है सभी जातियाँ एक समान,मेरा बस ये देश महान। सामान्य और कुछ ओबीसी श्रेणी के युवाओं ने इस  डिजिटल अभियान को हवा दी है। इसके एडमिन की मांग है कि जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण को पूरी तरह खत्म कर सरकारी नौकरियों और कॉलेज में प्रवेश प्रतिभा, अंक और योग्यता के आधार पर हों।आर्थिक आधार पर मदद की जाए जिससे  कमजोर आर्थिक और सामाजिक हैसियत  वाले युवाओं के सपने साकार हो सकें। इस पेज पर आरक्षण भेदभाव है जैसे नारे लगाए गए हैं। पेज के एडमिन और समर्थकों ने घोषणा की है कि वे इसे काॅकरोच जनता पार्टी  की तरह ही एक बड़े आंदोलन में बदलेंगे। इसी तरह  E20 जनता पार्टी नामक डिजिटल अभियान भी शुरू हो गया जो एक तरह का डिजिटल कैंपेन  उन लोगों द्वारा शुरू किया गया है, जो मानते हैं कि देशभर में E20 पेट्रोल को बढ़ावा देने के साथ-साथ ग्राहकों के पास 100% शुद्ध पेट्रोल खरीदने का विकल्प भी होना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार  बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल भी पंपों पर मिलना चाहिए ताकि फैसला ग्राहक खुद कर सकें। इस कैंपेन से भी लोग तेजी से जुड़ रहे हैं। हालांकि ये अभियान उतना सड़क पर नहीं उतर सकता किंतु आरक्षण हटाओ आंदोलन से कुछ ही दिनों में करोड़ों लोग जुड़ गए तब और एक नया जंतर मंतर खड़ा होकर सरकार को चुनौती देने मैदान में उतर आया तब क्या दिपके, केजरीवाल, राहुल, और सोनम वांगचुक इस जेन जी के पक्ष में भी खड़े होने का साहस दिखाएंगे? काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में ब्राह्मणवाद को गालियाँ दी गईं तो जेन जी के प्रशंसक इसे अभिव्यक्ति की आजादी का नया दौर बताते हुए इतरा रहे थे किंतु अब सवाल ये है कि आरक्षण हटाओ आंदोलन में शामिल जेन जी आंबेडकरवाद के विरुद्ध नारेबाजी करे तब क्या दिपके और चंद्रशेखर रावण उसका समर्थन करेंगे? जंतर मंतर आंदोलन की सफलता से आत्ममुग्ध तबके को ये जा लेना चाहिए कि नीट परीक्षा में सफल हुए लाखों छात्र  ऐसे भी हैं जिन्हें ज्यादा अंक मिलने के बाद भी उन्हें इसलिए प्रवेश नहीं मिल सका क्योंकि आरक्षण  प्राप्त कम अंकों वाले छात्र को उपकृत किया गया। डिजिटल आंदोलन का ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये कहना कठिन है क्योंकि जेन जी नामक जो जिन्न बोतल से बाहर आ गया है उसे दोबारा बंद करना बहुत बड़ी समस्या है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 July 2026

सरकार का जवाब तय करेगा आगे की राजनीति



दिल्ली में चल रहे आंदोलन की जड़ में नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने से छात्रों में उपजा गुस्सा था। हालांकि दोबारा परीक्षा होने के बाद परिणाम भी आ गए लेकिन शिक्षा प्रणाली में व्याप्त वि संगतियों के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग उठ खड़ी हुई। इसकी शुरुआत कांग्रेस द्वारा की गई और उसकी छात्र इकाई द्वारा अनेक शहरों में धरना - प्रदर्शन भी किये गए किंतु तभी राहुल गाँधी अपनी निजी यात्रा पर विदेश चले गए। वे कहाँ और क्यों गए इसे हमेशा की तरह गोपनीय रखा गया।लेकिन इसी बीच देश के प्रधान न्यायाधीश द्वारा अपनी एक टिप्पणी में कॉकरोच शब्द का उपयोग किया गया जिसका संदर्भ कुछ और था किंतु अमेरिका में बैठे एक युवक अभिजीत दिपके ने उससे नाराज होकर जब काॅकरोच जनता पार्टी का गठन सोशल मीडिया पर किया तब रातों - रात उससे करोड़ों लोग जुड़ गए। इससे उत्साहित होकर उसने भारत आने का ऐलान कर दिया। विपक्षी दलों से निराश सरकार विरोधी तबके को अभिजीत में क्रांतिदूत नजर आया । दिल्ली आकर उसने एक औपचारिक आयोजन में श्री प्रधान के इस्तीफे की मांग हेतु सरकार के सामने समय सीमा रखी और पूरी न होने पर संसद का सत्र शुरू होने वाले दिन जंतर मंतर से चलो संसद का आह्वान किया। उसके चलते हजारों लोग संसद भवन की ओर बढ़ने लगे जिन्हें रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और अश्रुगैस छोड़ी। उस दौरान क्या - क्या हुआ उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। इधर जंतर मंतर पर अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को पुलिस ने उठाकर सरकारी  अस्पताल में भर्ती कर दिया किंतु उनका अनशन जारी रहा । बाद में उन्हें मेदांता अस्पताल पहुंचा दिया गया और दो दिन पहले उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों के हाथ से जूस पीकर भूख हड़ताल तोड़ दी। साथ ही शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग से भी पीछे हट गए। गुरुवार की आधी रात जब वांगचुक जूस ग्रहण कर रहे थे उसी समय प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश प्रसारित हुआ जिसमें पेपर लीक  के दोषियों को कड़ा दंड देने हेतु कानून बनाने की घोषणा की गई। इसके बाद काॅकरोच जनता पार्टी और सरकार के बीच संवाद कायम हुआ और गत दिवस एक बैठक भी हुई। केंद्रीय मंत्री द्वय जगत प्रकाश नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह के साथ बातचीत में शामिल पार्टी प्रवक्ताओं ने बाद में बताया कि सरकार पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को 1 करोड़ रु देने के अलावा 20 जुलाई के संसद मार्च में हुए उपद्रव के आरोपियों पर दर्ज आपराधिक प्रकरण वापस लेने सहमत है किंतु श्री प्रधान के त्यागपत्र की मांग पर 24 घंटे बाद अर्थात आज 2 बजे तक जवाब। देगी। पार्टी ने इस माँग से पीछे न हटने की बात दोहराते हुए धमकी भी दी कि आंदोलन को पूरे देश में फैला दिया जाएगा। उसके बाद गत रात्रि प्रधानमंत्री नये वीडियो संदेश के साथ आये और युवाओं की मिजाजपुर्सी का भरपूर प्रयास किया। आज सुबह से ही इस बात को लेकर उत्सुकता है कि सरकार शिक्षा मंत्री को हटाने के लिए राजी होती है या नहीं ? हालांकि श्री प्रधान को मंत्री पद से हटाया जाना कोई बड़ी समस्या नहीं है। प्रधानमंत्री चाहें तो शिक्षा मंत्री क्या किसी अन्य मंत्री को भी एक क्षण में हटा सकते हैं। लेकिन इतने दबाव और आलोचना के बाद भी उनको मंत्री बनाये रखने के बाद एक नई नवेली पार्टी की जिद पर यदि ऐसा किया जाता है तब उससे प्रधानमंत्री की वजनदारी पर सवाल उठेंगे। उल्लेखनीय है जंतर मंतर से इतर संसद में भी विपक्ष , शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ा रहकर कार्यवाही नहीं चलने दे रहा। सोमवार को सरकार पेपर लीक रोकने एक कड़े कानून का प्रस्ताव लेकर भी आ रही है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी  चिंता परिसीमन और विदेशी अनुदान संबंधी  विधेयक को लेकर  है जिन पर भाजपा की भावी व्यूहरचना निर्भर है। प्रधानमंत्री अतीत में भी भूमि अधिगृहण और कृषि सुधार जैसे कानून वापस ले चुके हैं जिसके बाद उनके 56 इंची सीने के दावे का मखौल भी उड़ा किंतु उसके उपरांत मिली चुनावी सफलताओं ने उनकी नेतृत्व क्षमता का दबदबा बनाये रखा। लेकिन यहाँ सवाल ये है कि स्थापित दलों के सामने अड़े रहने के बाद यदि वे एक नवोदित पार्टी के सामने जिसका कोई विधिवत ढांचा नहीं है, झुक जाते हैं तब क्या उनकी मजबूत छवि पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा? लेकिन राजनीति की समझ रखने वाले जानते हैं कि बड़ी लड़ाई जीतने के लिए कभी - कभी रणनीति के तहत कदम पीछे भी खींचना पड़ते हैं। आज दोपहर के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार का अगला कदम क्या होगा और  आंदोलन की दिशा भी। 

नोट:- उक्त आलेख शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के पहले प्रकाशित हुआ था। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 July 2026

संसदीय गरिमा का पुनर्स्थापन सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी



म.प्र विधानसभा का मानसून सत्र समय से पहले ही समाप्त होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। सरकार द्वारा प्रस्तुत तमाम विधेयक होहल्ले के बीच पारित हो गए जिनमें समान नागरिक संहिता जैसा महत्वपूर्ण विधेयक भी था। बीते कुछ सालों से देखने मिल रहा है कि विधानसभा और संसद के सत्रों का ज्यादातर समय हंगामे की बलि चढ़ जाता है। विपक्ष अपनी कुछ मांगों को लेकर अड़ता है जिन्हें सत्ता पक्ष द्वारा नहीं माने जाने पर गतिरोध बना रहता है। अक्सर विपक्ष और आसंदी के बीच कहासुनी होने पर भी सदन स्थगित करने की नौबत आ जाती है। आम तौर पर सत्ता और मुख्य विपक्ष में टकराव से सदन की कारवाई बाधित होती है जिससे छोटे - छोटे दलों के सांसदों को अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने का अवसर नहीं मिल पाता। म.प्र विधानसभा को ही लें तो पिछली बार कोई भी सत्र पूरी अवधि तक कब चला, ये शायद ही कोई बता पायेगा। संसद के भी अनेक सत्र  बिना कोई विधायी कामकाज किये ही पूरे हो गये और मौजूदा सत्र भी उसी ओर बढ़ता दिख रहा है। इस स्थिति के लिए दोनों पक्ष एक दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं लेकिन सही बात ये है कि संसदीय प्रणाली के महत्व को कम करने में दोनों पक्षों का बराबर दोष है। सत्ता पक्ष को लगता है सदन जितना कम चले उतना उसके लिए हितकर है क्योंकि  सदन स्थगित रहने से वह संवेदनशील मुद्दों पर जवाबदेही से बचने में सफल हो जाता है। हंगामे के माहौल में प्रश्नकाल तक स्थगित होता है जबकि इसके जरिये बहुत सी ऐसी जानकारियां उजागर होती हैं जो अन्यथा लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। प्रश्नकाल में मंत्री द्वारा दिये उत्तर पर प्रश्नकर्ता सांसद पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। इस अवसर के छिन जाने से सांसदों के अधिकारों का हनन होने के साथ ही प्रश्नों के उत्तर तैयार करने में लगने वाले समय और  संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। ये देखते हुए विपक्ष को ये सावधानी रखनी चाहिए कि प्रश्नकाल को स्थगित होने से बचाये। हालांकि  वह ये कहकर बचना चाहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु ऐसा कहने मात्र से वह अपनी भूमिका के निर्वहन से नहीं भाग  नहीं सकता। मसलन सत्र शुरू होते ही किसी   मुद्दे पर तत्काल चर्चा की जिद सत्ता पक्ष द्वारा स्वीकार नहीं किये जाने पर सदन को नहीं चलने देने की गलती विपक्ष के लिए नुकसान दायक होती है। संसद के वर्तमान सत्र में भी यही देखने मिल रहा है। सत्र शुरू होने के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र के सुचारु रूप से संचालन पर आम सहमति बनाते हैं। लेकिन सत्र शुरू होने पर ऐसा लगता ही नहीं कि ये लोग दो दिन पहले बैठकर सदन चलाने के लिए मीठी - मीठी बातें कर रहे थे। सदन की कार्य सूची पहले से तैयार होती है। आकस्मिक घटनाओं और मुद्दों पर ध्यानाकर्षण और स्थगन प्रस्ताव लाये जा सकते हैं। लेकिन सब काम छोड़कर तुरंत चर्चा कराये जाने की मांग पूरी नहीं होने पर सदन को न चलने देने पर सरकार से ज्यादा हानि विपक्ष की होती है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास तो अपनी बात रखने  के तमाम साधन हैं जबकि विपक्ष के लिए संसद और विधानसभा ही  हैं जहाँ से वे अपनी बात  जनता तक पहुंचा सकते हैं। ये देखते हुए रणनीतिक तौर पर बेहतर होगा कि विपक्ष सदन को बाधित करने की गलती से बचे। वैसे भी व्यवधान के दौरान  सरकार अपनी जरूरत के विधेयकों को पारित करवा ही लेती है किंतु विपक्ष उन पर अपनी राय रखने से वंचित रह जाता है। संसदीय प्रणाली की खूबसूरती सदन में होने वाली बहस में से ही उभरकर सामने आती है। देश की छवि भी इस बात से बनती है कि देश और जनता से जुड़े मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष की सोच क्या है?  वर्तमान परिदृश्य इस लिहाज से निराश करने वाला है क्योंकि संसद और विधानसभाओं में ऐसे प्रभावशाली सदस्य कम ही हैं जिनका भाषण उनके विरोधी भी ध्यान से सुना करते थे। आज देश में  विश्वास का जो संकट है उसके लिए संसदीय प्रणाली की गिरती छवि भी बड़ा कारण है। भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता की आशंका के पीछे संसद के भीतर होने वाले हंगामे भी हैं। जनता के मन में ये बात बैठती जा रही है कि  जनप्रतिनिधि केवल अपना और अपनों का ही भला सोचते हैं। इस अवधारणा को और प्रबल होने से रोकने के लिए संसदीय प्रणाली की पुरानी गरिमा की पुनर्स्थापना जरूरी है जिसका दायित्व किसी एक दल या नेता का न होकर सभी का है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 July 2026

जंतर मंतर आंदोलन पूरी तरह पेशेवर आंदोलनजीवियों के कब्जे में


 
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन का अब छात्रों से कोई लेना - देना नहीं रहा। इसे शांतिपूर्ण कहना भी हास्यास्पद है। जिस तरह शालीन बाग में धरने के पीछे अलगाववादी ताकतें सक्रिय रहीं उसी तरह किसानों के साल भर चले धरने में धीरे - धीरे खालिस्तानी अलगाववादी घुस आये जिसकी परिणिति लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने के तौर पर हुई।  यही स्थिति इस आंदोलन की है जिसमें असली छात्र कितने हैं ये जाँच का विषय है। ये बात इसलिए उठी क्योंकि प्रश्न पत्र लीक होने पर दोबारा हुई नीट परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद  सफल हुए छात्र भविष्य की तैयारी में लग गए । नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने से भी अन्य छात्र प्रवेश आदि में व्यस्त  हैं। किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन ने भी जंतर मंतर आंदोलन से जुड़ने में रुचि नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी को छोड़ अन्य कोई राजनीतिक दल भी सक्रिय रूप से सामने नहीं आया। धरना स्थल पर आकर अपनी मौजूदगी की औपचारिकता जरूर अनेक नेताओं ने दिखाई किंतु 20 जुलाई को संसद भवन की तरफ बढ़ती भीड़ पूरी तरह नेतृत्वविहीन होने से अराजक हो उठी। इस तरह के आंदोलन जब भी हुए उनका नेतृत्व करने वाले आगे - आगे रहते थे। लेकिन 20 जुलाई को जंतर मंतर पर मंच लूटने वाले कथित छात्र हितैषी छू मंतर हो गए। भीड़ को संसद भवन में घुसने के लिए उकसाकर कॉकरोच जनता पार्टी के नामचीन चेहरे कहाँ रहे इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। एक को तो बर्गर खाने के अपराध में प्रवक्ता पद से हटा दिया किंतु कुछ युवाओं ने ही पकड़कर उसके वीडियो बना लिए वरना उसे भी न हटाया जाता। कहा जा रहा है दो नेताओं को जगत प्रकाश नड्डा ने अपने निवास पर रोके रखा लेकिन पार्टी के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत संसद जाने वाले जत्थों के अग्रिम भाग में क्यों नहीं दिखे  ? हर आंदोलन में बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर कूदने वाले योगेंद्र यादव एक कोने में खड़े अपना वीडियो बनवाते रहे। मुंबई से अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी अपने दो बेटों को जंतर मंतर लेकर आये किंतु जब लाठीचार्ज हुआ तब वे कहां थे कोई नहीं जानता। नीले झंडों के साथ जय भीम का नारा लगाने वाली भीड़ भीम आर्मी के नेता सांसद चंद्रशेखर रावण लेकर आये थे किंतु पुलिस की कारवाई से बचने वे भी भीड़ से दूर रहे। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, आतिशी भी आग में पेट्रोल डालकर दूर बैठ गए। कुल मिलाकर आंदोलन को अराजक तत्वों के हाथ सौंपकर तमाम नेता पीछे रह गए। यही वजह है कि वे पिटने से भी बचे और उनके विरुद्ध कोई प्रकरण भी दर्ज नहीं हुआ।  उस घटनाक्रम के बाद जो राजनीति हो रही है उसमें न तो शिक्षा प्रणाली में सुधार की चिंता है और न ही छात्रों के हित की क्योंकि आंदोलन की कमान  पेशेवर आंदोलनजीवियों के हाथ में है जिन्हें छात्र राजनीति का धेले भर अनुभव नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी अभी तक आम आदमी पार्टी को छोड़कर अधिकांश दलों के लिए अछूत बनी हुई है। राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास पर दिये धरने को आप सांसद संजय सिंह और आतिशी ने जिस तरह कांग्रेस और सरकार की जुगलबंदी करार दिया उससे स्पष्ट हो गया कि विपक्ष की राजनीति आपदा में अवसर तलाशने पर केंद्रित है। गत दिवस लोकसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसदों के बीच हुई कहा सुनी के पीछे भी श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा ही थी। यद्यपि सरकार के सामने भी संकट कम नहीं हैं। विपक्ष की रणनीति उन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं होने देने की है जिन पर भाजपा की आगामी व्यूह रचना निर्भर है। बीते काफी समय से अन्य पार्टियों में तोड़फोड़ मचाकर भाजपा दो तिहाई बहुमत का प्रबंध करने में जुटी थी। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान को अभी तक नहीं हटाया जाना  इस बात का संकेत है कि मोदी - शाह का आत्मविश्वास कायम है। लेकिन अंदरखाने की राजनीति का अंदाजा लगाना मुश्किल है। बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि किसी भी पक्ष के लिए पीछे लौटना आत्मघाती होगा। रही बात आंदोलनकारियों  की तो वे खुद भ्रमित हैं। शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग तो पूरी हुई नहीं और वे प्रधानमंत्री को हटाने की मांग कर बैठे। सोनम वांगचुक भी अनिर्णय में फंसे हुए हैं। चूंकि सरकार के विरोध में खड़ी ताकतों में समन्वय और आपसी विश्वास नहीं है इसीलिए आंदोलन गैर जिम्मेदाराना तरीके से संचालित है। रोज शाम को जंतर मंतर पर दिखाई देने वाली अराजकता इसका प्रमाण है। चीन के साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग ने कहा था क्रांति कोई चाय पार्टी नहीं है। लेकिन जंतर मंतर पर सुबह से रात तक पार्टियां देखी जा सकती हैं। वहाँ से जो वीडियो लगातार आ रहे हैं उनसे अनेक चेहरों के नकाब उतर चुके हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 July 2026

छात्र हित छोड़ आंदोलन पर राजनीतिक स्वार्थ हावी



दिल्ली में नीट परीक्षा प्रश्न पत्र लीक होने के विरोध में चल रहा आंदोलन दो टुकड़ों में बट चुका है। उल्लेखनीय है नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर राजधानी के जंतर मंतर पर काफी दिनों से धरना दिया जा रहा है। बाद में इसमें लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी उसी मांग को लेकर अनशन शुरू कर दिया तो आंदोलन की चर्चा सर्वत्र फैलने लगी। विभिन्न पार्टियों के नेता उनसे मिलने आये और समर्थन दिया। लेकिन श्री वांगचुक के आग्रह पर भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी धरना स्थल पर नहीं आये और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा को भेजकर रस्म अदायगी कर दी। अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी जंतर मंतर से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी। लेकिन आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल सहित तमाम नेता धरना स्थल पर उपस्थिति दर्ज करवाने  में सबसे आगे दिखे। इस वजह से पहले से चल रही इस चर्चा को बल मिला कि सोशल मीडिया से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी भी आम आदमी पार्टी की मानस पुत्री ही है। वामपंथी छात्र संगठनों ने भी इस आंदोलन में खुलकर हिस्सेदारी दिखाई। राहुल गाँधी के धरनास्थल पर आकर सोनम वांगचुक से न मिलने का कारण जल्द स्पष्ट हो गया। दरअसल कांग्रेस  इस बात को भांप गई कि  जनता पार्टी की आड़ में अरविंद केजरीवाल खुद को पुनर्स्थापित करना चाह रहे हैं ताकि निकट भविष्य में होने जा रहे विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी मजबूती से खड़ी हो सके। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पंजाब जहाँ आम आदमी पार्टी ही सत्ता में है। लेकिन उसकी लोकप्रियता लगातार गिरने से कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं। दूसरी ओर भाजपा भी प. बंगाल जैसा उलटफेर करने की तैयारी कर रही है। हिमाचल प्रदेश में भी आम आदमी पार्टी , कांग्रेस के मतों में सेंध लागाएगी । दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता हाथ से निकल जाने के लिए राहुल को जिम्मेदार मानते हैं जिन्होंने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर भाजपा की राह आसान बना दी।  उसके बाद से ही दोनों में छत्तीस का आंकड़ा चला आ रहा था। इसीलिए कांग्रेस जो पहले से ही नीट परीक्षा मामले में मुखर थी, जंतर मंतर के धरने से कटी - कटी रही। 20 जुलाई को जब  संसद भवन की ओर बढ़ रही भीड़ पर लाठीचार्ज हुआ और पूरे देश में उसकी चर्चा हुई तब कांग्रेस को लगा कि अब भी वह इस आंदोलन से दूर रही तो फिर मुद्दा उसके हाथ से पूरी तरह फिसल चुका होगा और वह युवा विरोधी कहलायेगी। इसीलिए गत दिवस राहुल गाँधी ने सबको चौंकाते हुए प्रधानमंत्री निवास पर डेरा जमाया और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह की समझाइश पर भी नहीं उठे तब पुलिस ने उन्हें और प्रियंका वाड्रा को हिरासत में लेकर कुछ देर बाद रिहा कर दिया। राजनीतिक तौर पर ये सामान्य घटना थी किंतु  इसके जरिये काँग्रेस ने आंदोलन की लगाम अपने हाथ में लेने का दांव चल दिया। इसका असर भी फौरन दिखा जब आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमन्त्री आतिशी मार्लेना ने सोशल मीडिया पर इसे जंतर मंतर का आंदोलन कमजोर करने के लिए कांग्रेस और भाजपा की जुगलबंदी बता दिया। स्मरणीय है कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी को भाजपा की बी टीम कहा जाता रहा है। इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी के लोगों ने देर रात कनाट प्लेस में उपद्रव मचाकर अपनी खीझ निकाली। लेकिन कल के घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि छात्रों के नाम पर राजनीतिक पार्टियां अपना स्वार्थ सिद्ध करने में जुटी हैं। न जंतर मंतर पर नीट पीड़ित छात्र नजर आ रहे हैं और न ही राहुल के साथ दिखे। संसद जाते हुए लाठी खाने वालों में भी छात्र कम आंदोलनजीवी ज्यादा थे। भले ही दोनों पक्ष अपने - अपने मतलब के लिए आंदोलन को आगे  खींचते रहें किंतु उसकी गंभीरता और वजनदारी रोज घटती जा रही है। संसद का सत्र चलने के कारण  जो सरगर्मी है वह भी जल्द खत्म होना तय है। विडंबना ये है कि इस आंदोलन का चेहरा बने लोगों का छात्रों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे में पहले दिन से दिशाहीन नजर आ रही ये मुहिम पूरी तरह भटकते हुए राजनेताओं के शिकंजे में आ चुकी है।  रही बात कॉकरोच जनता पार्टी की तो उसका वही हश्र होना तय है जो कॉकरोच का होता है। वैसे भी उसका नियंत्रण विदेश में बैठी उन अदृश्य शक्तियों के हाथ  में है जो भारत में अराजकता फैलाना चाह रही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी





Tuesday, 21 July 2026

दिल्ली में किसानों का जमावड़ा जंतर मंतर पर भारी पड़ सकता है



दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में गत दिवस संसद भवन तक छात्रों का मार्च आयोजित किया गया था। पुलिस के रोकने पर भी हज़ारों  लोग उस ओर बढ़े। संसद का सत्र भी चूंकि कल से है शुरू हुआ था लिहाजा सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी थी। जब प्रदर्शनकारी अनियंत्रित होने लगे तब पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस जैसे परंपरागत तरीके अपनाकर भीड़ को तितर - बितर किया गया। दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं। पुलिस का कहना है भीड़ द्वारा पथराव एवं सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के बाद स्थिति बिगड़ी वहीं आंदोलन के कर्ताधर्ताओं की मानें तो पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस छोड़े जाने से भीड़ भड़क उठी। विभिन्न वीडियो देखने पर पता चलता है कि दोनों तरफ के आरोप काफी हद तक सही हैं। भीड़ द्वारा पत्थर फेंके जाने के साथ पुलिस के वाहनों को क्षति पहुंचाए जाने के दृश्य साफ नजर आये वहीं पुलिस को भी डंडे बरसाते हुए देखा गया। ये बात पूरी तरह सच है कि सुरक्षा बल सख्ती न दिखाते  तो प्रदर्शनकारी संसद परिसर में घुसकर अकल्पनीय स्थिति उत्पन्न कर सकते थे। ये आशंका इसलिए पैदा हुई क्योंकि छात्रों के नाम पर उपद्रवी तत्व भी प्रदर्शन में शामिल थे जिनका उद्देश्य अराजकता फैलाना था। दरअसल  इस आंदोलन को गैर राजनीतिक बनाये रखने के दावे झूठे निकले जब आम आदमी पार्टी के अलावा भीम आर्मी सांसद दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने पहले तो धरना स्थल पर मंच साझा किया और फिर प्रदर्शन में भी मौजूद रहे। सपा सांसद डिंपल यादव ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। योगेंद्र यादव,शबाना आज़मी अरुंधति रॉय, प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसी घोषित मोदी विरोधी हस्तियां भी नजर आईं। जेएनयू से जुड़े  सरकार विरोधी संगठनों  ने तो धरना स्थल पर पहले दिन से ही कब्जा जमा लिया था। इस आयोजन के पीछे नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने से परीक्षार्थियों में उपजी नाराजगी थी जिसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग जोर पकड़ती गई। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का इस आंदोलन से जुड़ना आज तक रहस्य बना हुआ है क्योंकि उसका प्रादुर्भाव देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किये एक कटाक्ष की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था। इसके अलावा सोनम वांगचुक का लद्दाख़ से आकर इस आंदोलन से जुड़ना भी चौंकाने वाला रहा। धीरे - धीरे यह मुहिम छात्रों के हाथ से निकालकर पेशेवर आंदोलनजीवियों के नियन्त्रण में आ गई। इसी के चलते वहाँ वही नारे गूंजने लगे जो जेएनयू परिसर की पहचान बन चुके हैं। हिंदू देवी - देवताओं का उपहास, मनुवाद को कोसते हुए जय भीम के नारे और क्रांति के नाम पर अल्लाह की तारीफ जैसी भड़काऊ बातें सुनाई दीं। देश विरोधी शर्जील इमाम और खालिद उमर को महान बताने की जुर्रत के साथ ही धारा 370 की वापसी का दंभ भरा गया। कल जो प्रदर्शन हुआ उसमें भीम आर्मी की जुटाई भीड़ छात्रों पर भारी पड़ी। इन्हीं सब कारणों से आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। सोनम वांगचुक तक सांसदों से मिलकर अनशन तोड़ने के लिए राजी हो गए। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक माइग्रेन नामक बीमारी की आड़ लेकर भूख हड़ताल से पीछे हट गए। सरकार के बुलावे पर पार्टी के दो प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से मिलने जा पहुंचे लेकिन रात में दोबारा जंतर मंतर पर तम्बू तानकर आंदोलन जारी रखने की डींग हाँकी गई। लेकिन अब तक ये समझ से परे है कि इस आयोजन का असली सूत्रधार कौन है? अभिजीत दीपके के भारत लौटते ही उसकी आम आदमी पार्टी से निकटता स्पष्ट हो गई थी। इसीलिए इस आंदोलन में उस पार्टी का पूरा शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहा। यही वजह थी की कांग्रेस ने कल के प्रदर्शन से दूरी बनाये रखी। राहुल गाँधी का बयान प्रधानमंत्री के  विरुद्ध तो आया किंतु कॉकरोच जनता पार्टी की तरफदारी से वे बचे और तो और सोनम वांगचुक की मिजाजपुर्सी की जरूरत भी नहीं समझी। स्मरणीय है किसी आंदोलन की सफलता के लिए किसी या कुछ राजनीतिक पार्टियों की हिस्सेदारी जरूरी होती है जिसका इस अभियान में अभाव है। हालांकि आम आदमी पार्टी पर्दे के पीछे है, लेकिन दीपके एण्ड कम्पनी का कोई ढांचा नहीं है। ऐसे में कुछ दिन के होहल्ले के बाद इसकी वजनदारी कम होती जायेगी। सबसे खास बात ये है कि भारत - अमेरिका के बीच होने वाली व्यापार संधि  के विरोध में दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर किसान जमा होने लगे हैं। ऐसे में अब आंदोलन का केन्द्र जंतर मंतर से खिसक कर किसानों के धरने पर पहुँच जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक दलों और मीडिया को भी किसानों में ज्यादा रुचि होगी विशेष रूप से पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव को देखते हुए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 July 2026

समान नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय


मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

 नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय

मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 July 2026

वांगचुक को बलि का बकरा बनाया काॅकरोच जनता पार्टी ने



इसका संकेत तो गुरुवार को ही मिल गया था जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देशित किया था कि वह  दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशनरत लद्दाख़ की चर्चित शख्सियत सोनम वांगचुक का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करवाए और जरूरत होने पर उनकी चिकित्सा का प्रबंध भी करे। उल्लेखनीय है नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने के बाद सोशल मीडिया पर धूमकेतु की तरह उभरी काॅकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर लगातार किये जा रहे आंदोलन का जब कोई प्रभाव नहीं पड़ा तब राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया गया। लद्दाख़ को पूर्ण राज्य बनाये जाने की मांग को लेकर वे आंदोलन का नेतृत्व करते रहे हैं और कुछ महीनों तक जेल में भी रहे। लेकिन ये बात संदेहों को जन्म देती है कि अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी नामक एक संगठन की घोषणा की और देखते - देखते ही उसके साथ लाखों अनुयायी जुड़ते चले गए। उसके बाद जब वह भारत लौटा तब एक वर्ग विशेष ने उसे मसीहा बनाना चाहा किंतु दिल्ली आने के कुछ घंटों बाद ही जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन  ने काॅकरोच जनता पार्टी के ढोल की पोल खोल दी। अभिजीत को लगा था कि देश का युवा उन्हें हाथों - हाथ लेगा। लेकिन दिल्ली के अलावा भी वे जहाँ - जहाँ गए उनके आयोजन फ्लॉप शो साबित हुए। अंततः दिल्ली में अनशन का फैसला लिया गया और बजाय खुद मैदान संभालने के श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया। अभिजीत समझ चुके थे कि उनके नाम में वह आकर्षण नहीं है लिहाजा वांगचुक के कंधे पर बन्दूक रखकर निशाना लगाना चाहा। लेकिन ये दाँव भी कारगर नहीं रहा। जेएनयू और  कुछ ढपलीबाज   वामपंथी छात्रों को छोड़कर न तो वे युवा आये जिनके लिए वांगचुक को भूखा रखा गया और न आम जनता। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने अनशन स्थल पर आकर मगरमच्छी आँसू तो खूब बहाये लेकिन मैदानी समर्थन नहीं दिया। यही वजह रही कि आंदोलन न गति पकड़ सका और न ही उसकी कोई दिशा ही स्पष्ट हुई। शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र मांगने से हटकर जंतर मंतर में टुकड़े - टुकड़े  गैंग के देश विरोधी नारे गूंजने लगे। असल में इस आंदोलन को फुस्स करवाने में सभी प्रमुख विपक्षी दलों की भूमिका रही। अरविंद केजरीवाल भले ही श्री वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाये जाते जाने की मांग कर अपने को उनका हितैषी साबित करना चाह रहे हों लेकिन। उनकी पार्टी भी नहीं चाहती कि काॅकरोच जनता पार्टी उसका विकल्प बन जाए। आज पुलिस ने श्री वांगचुक को उठाकर अस्पताल भेज दिया जिसके बाद अब अभिजीत दीपके ने अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन नीट परीक्षा का परिणाम घोषित होने से इस आंदोलन की धार पहले ही कमजोर पड़ चुकी है। सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। विपक्षी पार्टियां  उसमें सरकार को घेरकर राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहेंगी। इसीलिए उन्होंने इस आंदोलन को दिखावटी समर्थन तो दिया किंतु  जंतर मंतर की सीमा से बाहर नहीं आने दिया। सरकार पर अनशन की उपेक्षा का जो आरोप है उसमें दम इसलिये नहीं है क्योंकि काॅकरोच जनता पार्टी अभी तक संगठित स्वरूप नहीं ले सकी। और श्री वांगचुक का इस आंदोलन से जुड़ना भी अप्रासंगिक था। उनकी छवि  आंदोलनजीवी की बन जाने से वे मीडिया की सुर्खियों में सिमटकर रह गये। रही - सही कसर पूरी कर दी जेएनयू के छात्र - छात्राओं ने जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनकर समूचे आंदोलन पर अतिक्रमण कर बैठे। हिंदू देवी - देवताओं का अपमान करने वाले एक स्टैंड अप कामेडियन ने भी आंदोलन को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सच कहें तो काॅकरोच जनता पार्टी ने एक अच्छे भले मुद्दे का कचरा कर दिया। स्मरणीय है किसान आंदोलन अपने साथ देश भर के किसानों को नहीं जोड़ पाने के कारण अपनी मौत मर गया था, वहीं शाहीन बाग का धरना भी अंततः फुस्स होकर रह गया। ठीक वैसे ही ये आंदोलन भी अधोगति को प्राप्त हो रहा है  ये कहना गलत नहीं होगा कि काॅकरोच जनता पार्टी ने सोनम वांगचुक की जान खतरे में डालकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की जो चाल चली थी वह उल्टी पड़ गई और अभिजीत दीपके का नौ नौसिखियापन भी उजागर हो गया। 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 17 July 2026

बांग्लादेश के साथ जैसे को तैसा की नीति अपनानी चाहिए



बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीदें धीरे - धीरे खत्म होती जा रही हैं।  चीन को मोंगला बंदरगाह के समीप इकौनोमिक ज़ोन के  विकास का काम सौंपने के बाद  गत दिवस उसने भारतीय सीमा से बेहद नजदीक स्थित तीस्ता परियोजना भी उसको सौंप दी जो इसके लिए उसे 7 हजार डॉलर का ऋण देगा। भारत ने इसके लिए 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव दिया था। ऐसा ही मोंगला परियोजना को लेकर हुआ था। उल्लेखनीय है शेख हसीना के शासनकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफी सुधर गए थे। यद्यपि कट्टरपंथी मुस्लिम वहाँ रह रही हिन्दु आबादी पर अत्याचार करने से बाज नहीं आते थे। मंदिरों सहित हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले आम बात थी। बावजूद इसके सरकारी स्तर पर संवाद बना रहा और अनेक लंबित विवाद भी सुलझे । लेकिन हसीना  का तख्ता उलटने के बाद स्थितियाँ पूरी तरह बिगड़ गईं। दरअसल उनको भारत में। पनाह दिये जाने से बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के मुखिया मो. युनुस को बहाना मिल गया। हालांकि उनका झुकाव पहले से ही चीन की तरफ था। लेकिन चुनाव के बाद जब तारिक रहमान भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने तब शुरुआत में ये लगा था कि संभवतः बांग्लादेश दोबारा भारत के साथ सम्बन्ध सुधारेगा। लेकिन शेख हसीना का भारत में बने रहना आड़े आ गया। उनकी गैर मौजूदगी में ही उन्हें मृत्युदंड सुनाया जा चुका है। बांग्लादेश सरकार लगातार उनकी वापसी के लिए दबाव बनाती रही है जिसे भारत ने नजरंदाज कर दिया। जाहिर है इससे उसकी नाराजगी बढ़ी होगी। हालांकि अपने जन्म के कुछ बरस बाद शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या होने के बाद से बांग्लादेश में बैठे सभी शासक भारत से दुश्मनी की राह पर चले। हसीना के कार्यकाल को जरूर अपवाद कहा जा सकता है। लेकिन उसके बाद से ये देश भारत विरोधी ताकतों से जुड़ने लगा। बांग्लादेश के नये शासक  तारिक रहमान लंबे समय तक विदेश में रहे हैं। इसीलिए उनसे उम्मीद रही कि वे कट्टरता को त्यागकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के साथ संबंध कायम करने आगे आयेंगे। लेकिन चीन के साथ किये ताजा  समझौतों से ये साफ हो चला है कि वे भी अपने मरहूम  पिता और माँ की तरह से ही भारत विरोध की मानसिकता के वशीभूत हैं। यद्यपि हाल ही में शेख हसीना ने ये कहते हुए सबको चौंका दिया था कि वे आगामी दिसम्बर माह में ढाका लौटकर अदालत के समक्ष आत्म समर्पण करते हुए फांसी की सजा रद्द करने की अपील करेंगी। उसके बाद ऐसा लगा था कि दोनों देशों के रिश्तों में चली आ रही तल्खी दूर होने लगी है। लेकिन तारिक रहमान द्वारा चीन की यात्रा और फिर दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं के विकास हेतु भारत के प्रस्तावों को ठुकराते हुए चीन की गोद में बैठ जाने के बाद इस बात में कोई शंका नहीं रह गई है कि हमारा ये पड़ोसी भी हमारे दुश्मनों के साथ मिल गया है। तीस्ता परियोजना भारत की सीमा से महज 20 - 22 कि.मी दूर होने से हमारी सुरक्षा के लिए खतरा है। सिलिगुड़ी कारीडोर वैसे भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। प. बंगाल में भाजपा सरकार बन जाने के बाद बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के अभियान में तेजी के अलावा घुसपैठियों को वापस भेजने जैसी कारवाई से बांग्लादेश भन्नाया हुआ है। असम की भाजपा सरकार भी अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए बेहद आक्रामक है। चीन के साथ तारिक रहमान सरकार रक्षा समझौते भी कर रही है। निश्चित रूप से उसके ताजा कदम विशुद्ध रूप से भारत विरोधी मोर्चेबंदी ही है। आश्चर्य तो तब होता है जब बांग्लादेश उस पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ करने में भी नहीं हिचकता जिसने उसकी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। पाकिस्तान के कब्जे से से उसे मुक्त करने में भारत ने जो सैन्य कारवाई की और करोड़ों बांग्लादेशियों को शरण दी उसके प्रति कृतज्ञता की बजाय बांग्लादेश भारत के साथ हर वह हरकत करने पर आमादा है जो किसी शत्रु देश के साथ की जाती है। ऐसे में भारत को उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति रखने से बचते हुए कड़ाई से पेश आना चाहिए क्योंकि चीन का वहाँ बैठना हमारी सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करने वाला है। सबसे बड़ा कदम उन घुसपैठियों की वापसी का उठाया जाए जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 July 2026

आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी



अयोध्या स्थित भव्य राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का प्रकरण पूरी दुनिया में चर्चित हो गया। सनातन में आस्था रखने वाले करोड़ों रामभक्तों को उक्त घटना ने पीड़ा पहुंचाई क्योंकि मसला केवल रुपये - पैसे की हेराफेरी तक सीमित न रहकर उन नैतिक मूल्यों और मर्यादाओं के उल्लंघन से भी जुड़ा हुआ है जिनका प्रभु श्री राम ने जीवन भर पालन किया और जिसकी वजह से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम जैसा पवित्र संबोधन प्राप्त हुआ। इस मामले की जाँच चल रही है और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा है। इसलिए उसके कानूनी पक्ष पर कुछ भी बोलना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन जो न्यास राम मंदिर की व्यवस्था देखता है उसके प्रशासनिक ढांचे में  शीर्ष स्तर पर हो रहे बदलाव से ही मामले की गंभीरता स्पष्ट हो जाती है। उक्त न्यास में रा.स्व.संघ से जुड़े लोग महत्वपूर्ण दायित्वों पर थे लिहाजा मामले को राजनीतिक रंग भी दिया जाने लगा जो कि स्वाभाविक  है। उ.प्र में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं ।  ये देखते हुए भाजपा विरोधी ताकतों को हमलावर होने का मौका मिल गया। जाहिर है केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता पक्ष इस मामले में रक्षात्मक होने के लिए मजबूर हो गया है। खैर, राजनीति के अपने तौर - तरीके होते हैं इसलिए इस मामले में भी दोनों पक्षों से जिस तरह के वार और पलटवार हो रहे हैं उनसे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन इस कांड के उजागर होते ही देश भर से विभिन्न मंदिरों, धर्म स्थलों और उनकी व्यवस्था देख रहे न्यासों के प्रबंधन में आर्थिक अनियमिताओं की खबरें निकलकर आने लगीं जिनके मूल में चंदे और चढ़ावे की चोरी ही मुख्य रूप से सामने आई है। कुछ प्रसिद्ध धर्मस्थलों से  बहुमूल्य मुकुट एवं आभूषण आदि गायब होने की शिकायतें भी मिल रही हैं। शुरुआत में ऐसा लगा कि सारी अव्यवस्था हिन्दू मंदिरों को लेकर ही है किंतु मुस्लिम समुदाय के बीच से भी वक्फ संपत्ति से जुड़े घोटाले सामने आने लगे। अन्य धार्मिक संगठनों के भीतर भी इसी तरह की हेराफेरी चर्चाओं में आ गई। देश के अनेक हिस्सों में ईसाई समुदाय से जुड़ी बेशकीमती जमीनों की बंदरबांट भी किसी से छिपी नहीं है। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि धर्म के नाम पर अधर्म करने वालों के हौसले बुलंद हैं जिन्हें न ईश्वरीय कोप का डर है और न ही कानून का। जहाँ तक बात धार्मिक केंद्रों और उनसे जुड़े आर्थिक प्रबंधन की है तो उसमें भावना का स्थान सर्वोपरि है। भले ही व्यक्ति बतौर कर्मचारी उससे जुड़ा हो किंतु उस स्थल या संस्थान की पवित्रता उसे प्रभावित करती होगी , ये विश्वास जनमानस में गहराई तक समाया हुआ था। इसीलिए मंदिर में पुजारी के आसन पर बैठे व्यक्ति की योग्यता और जाति के बारे में जाने बिना श्रृद्धालु जन उसे आदर देते हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि राम मंदिर से आई चंदा और चढ़ावा घोटाले की जानकारी  के बाद देश भर से ऐसी ही खबरों की बाढ़ सी आ गई।  सनातन धर्म के अलावा  अन्य धर्मों से जुड़ी संस्थाओं एवं संपत्तियों की लूटखसोट का पर्दाफ़ाश भी उन्हीं से जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा है। इन सबसे ये बात खुलकर सामने आ गई है कि लोग श्रद्धा भाव से धर्म स्थलों और उनका प्रबंधन देखने वाले संस्थानों को जो आर्थिक सहयोग देते हैं उसका निजी स्वार्थपूर्ति हेतु भी दुरूपयोग होता है। मंदिरों में चढ़ाई जाने वाली  बहुमूल्य वस्तुओं की पेशेवर चोरों द्वारा की जाने वाली चोरी पर किसी को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि उनसे ईमानदारी की अपेक्षा कोई नहीं करता । लेकिन मंदिरों और धर्मस्थलों में सेवा प्रदान करने वालों से तो ईमानदारी और समर्पण  की उम्मीद की जाती है क्योंकि किसी भी धर्म में चोरी - बेईमानी नहीं सिखाई जाती। यही वजह है कि अयोध्या में हुई चढ़ावे की चोरी के बाद लगातार आ रही खबरें धर्म प्रेमियों को धक्का पहुँचा रही हैं। कानून दोषियों को दंडित करेगा इसका भरोसा भी लोगों को है किंतु देश भर से आ रही खबरों से लोगों की आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 July 2026

ट्रम्प के टैरिफ आतंक का जवाब हैं मुक्त व्यापार समझौते



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये टैरिफ युद्ध ने एक नई तरह की  उथल - पुथल को जन्म दिया जिसके कारण अंतराष्ट्रीय व्यापार की समूची स्थापित व्यवस्था के मानदंड टूट - फूट गए। दरअसल ट्रम्प का घोषित उद्देश्य  कम आयात शुल्क के कारण अमेरिका को होने वाले व्यापार घाटे में कमी लाना था जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। लेकिन जोश में होश खो बैठने वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए उन्होंने टैरिफ रूपी अस्त्र से दुनिया भर  को एक साथ आतंकित करने की जो मूर्खता की उसके कारण सभी प्रमुख देशों ने अपने आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए अमेरिका पर निर्भरता घटाने की मुहिम छेड़ दी। परिणामस्वरूप नये - नये  व्यापार समझौते होने लगे। उसी का एक उदाहरण भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता है जो आज से लागू हो गया। उल्लेखनीय है  ट्रम्प के टैरिफ दबाव के जवाब में नरेंद्र मोदी सरकार  का ये छटवाँ मुक्त व्यापार समझौता है। इसके पूर्व भारत  मॉरीशस, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ) और ओमान के साथ ऐसे ही समझौते हस्ताक्षरित कर चुका है। यही वजह है कि अमेरिका के साथ विचाराधीन  नया व्यापार समझौता करने में भारत ने जल्दबाजी नहीं दिखाई और ट्रम्प द्वारा थोपी गई इकतरफा शर्तों को मंजूर नहीं किया।  ब्रिटेन के साथ जो ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता आज, 15 जुलाई 2026 से लागू हुआ उसके अंतर्गत भारत द्वारा निर्यात किये जाने वाले लगभग  99% उत्पादों पर ब्रिटेन ने आयात शुल्क शून्य  कर दिया है। समझौते की मुख्य बातों पर नज़र डालें तो इससे विशेष तौर पर भारतीय  कपड़ा, चमड़े से बनी चीजें , सोने - चांदी के जेवरात, , समुद्री खाद्य (मछली आदि) और इंजीनियरिंग सामग्री के अलावा कृषि उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बड़े पैमाने पर आयात  शुल्क-मुक्त बाजार उपलब्ध होगा। दूसरी तरफ भारत सरकार ब्रिटेन से आयातित वस्तुओं  पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती करेगी। इनमें  स्कॉच व्हिस्की का टैरिफ 150% से घटाकर 40% करने के अलावा ब्रिटेन में बनी पूरी तरह तैयार कारों (सहित इलेक्ट्रिक वाहनों) पर आयात शुल्क धीरे - धीरे  110% से घटाकर 10% तक लाया जाएगा। इसके साथ ही ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के लिए कार्य शर्तों का सरलीकरण भी इस समझौते का हिस्सा हैं। भारत ने सेब, अखरोट, सहित कुछ बीज, सोने की ईंटों व स्मार्टफोन जैसे संवेदनशील उत्पादों पर कोई शुल्क रियायत नहीं दी है। वहीं ब्रिटेन ने भी चावल, चीनी व कुछ मांस उत्पादों को समझौते के दायरे से बाहर रखा । समझौते में प्रावधान है कि भारत से ब्रिटेन जाने वाले कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं को पांच वर्ष तक ब्रिटेन में सोशल सिक्योरिटी योगदान नहीं देना होगा जो आईटी कंपनियों को राहत प्रदान करने वाला है। इनके अलावा भी  ऐसे अनेक बिंदु हैं जिनमें दोनों, पक्षों के हितों को संवर्धन होगा। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ से भी चूंकि ऐसा ही समझौता किया जा चुका है इसलिए अब समूचे यूरोप के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते तो मज़बूत होंगे ही कूटनीतिक संबंधों में भी मिठास आयेगी। कुल मिलाकर ये मुक्त व्यापार समझौते अमेरिका के टैरिफ आतंक के विरुद्ध की गई मोर्चेबंदी है जिसमें भारत के साथ उन देशों ने भी समझौते करने में कोई झिझक नहीं दिखाई जो अमेरिकी शिविर के माने जाते हैं। इनसे एक बात स्पष्ट हो गई कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं अपितु उत्पादक के तौर पर भी अपनी जगह बनाता जा रहा है। सबसे खुशनुमा पहलू ये है कि अब तक जिन - जिन देशों से मुक्त व्यापार समझौते किये गए उन सभी में अप्रवासी मूल के भारतवंशियों की बड़ी संख्या है। उनमें से कुछ वहाँ स्थायी तौर पर बस जाने के बाद भी भारतीय जीवन शैली से जुड़े होने से भारतीय वस्तुओं के उपभोक्ता हैं। उनके अलावा पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के भी जो नागरिक उक्त देशों में रहते हैं वे भी भारतीय उत्पादों के मुरीद होने से उनकी मांग रहती है। इसीलिए  मुक्त व्यापार समझौता लागू होने से हमारे निर्यात को मजबूती मिलने के साथ ही अमेरिका के टैरिफ से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 July 2026

बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत और चीन का महत्व बढ़ रहा



रूस - यूक्रेन और अमेरिका - ईरान की जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। पूरी दुनिया इन युद्धों से हलाकान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। कच्चे तेल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित होने से अभूतपूर्व ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग बंद किये जाने से प. एशिया के तेल उत्पादक देशों का व्यापार ठप होकर रह गया है। दोनों तरफ से बरसाई जा रही बारूद ने तेल रिफ़ाइनरियों को या तो तबाह कर दिया या जबरदस्त नुकसान पहुंचाया जिसके कारण उनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हो गई। अमेरिका होर्मुज  खोलने का साहस दिखाता भी है तो ईरान तेल वाहक जहाजों पर मिसाइलें दागकर दहशत फैलाने से बाज नहीं आता। उसका दावा है वह इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी ऐसी ही धमकी दे रहे हैं। दूसरी तरफ यूक्रेन पर रूसी हमले को शुरू हुए बरसों बीत गए। प्रारंभ में लगता था दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्तियों में शामिल रूस  के सामने यूक्रेन दो - चार दिनों में ही घुटने टेक देगा । रूस द्वारा उसके सीमावर्ती भूभाग पर कब्जा जमा लेने से उक्त सम्भावना और मजबूत हो गई । लेकिन जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार यूक्रेन धीरे - धीरे ही  सही रूस के कब्जे से अपनी खोई हुई जमीन वापस लेता जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि उसने रूस जैसे कच्चे तेल और गैस संपन्न देश में तेल संकट उत्पन्न कर दिया। बजाय बड़े लड़ाकू विमानों के छोटे - छोटे ड्रोन के जरिये इस विश्व शक्ति के बड़े - बड़े तेल शोधन संयंत्रों को नष्ट कर डाला। परिणामस्वरूप राजधानी मॉस्को तक में पेट्रोल पंप खाली पड़े हैं। ये उस देश की हालत है जो कल तक बड़े पैमाने पर तेल और गैस निर्यात किया करता था। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की स्थिति रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तुलना में अत्यंत दयनीय बताई जाती थी। लेकिन खैरात के हथियारों से लड़ने वाले यूक्रेन ने रूस की अपार सैन्य क्षमता की पोल खोलकर रख दी। इस युद्ध के कारण रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का दुष्प्रभाव भी अब असर दिखाने लगा है। कमोबेश ऐसी ही हालत प. एशिया में चल रहे युद्ध में खुद को दुनिया का खलीफा समझने वाले अमेरिका की देखने मिल रही है जो हजारों मिसाइलें दागने और पूरे देश को मलबे के ढेर में बदल देने के बाद भी ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब साबित हुआ है। यूक्रेन की तरह ईरान को भी इस लड़ाई में  अकल्पनीय क्षति पहुंची है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता पर तो विपरीत असर पड़ा ही अन्य क्षेत्रों में भी  भारी तबाही झेलनी पड़ी। सरकार और सेना में पदस्थ अनेक शीर्ष हस्तियां मारी गईं। सड़क, पुल, कारखाने तबाह हो गए। हजारों नागरिक जान गँवा बैठे। लड़ाई शुरू होते ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई की जिस तरह ह्त्या हुई उसके बाद ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि वह अमेरिका के सामने झुक जाएगा। लेकिन उसने उन सभी अरब देशों को निशाना बनाने जैसा दुस्साहस कर डाला जिनमें अमेरिका के सैन्य अड्डे थे । इन देशों को ये गुमान था कि अमेरिका उनका अभेद्य रक्षा कवच है। और इसीलिए वे ईरान  विरोधी शिविर में जाकर बैठे हुए थे। लेकिन ईरान ने उनकी खुशफहमी को तो धक्का पहुंचाया ही अमेरिका के सर्वशक्तिमान होने के अहंकार को भी जबरदस्त चोट पहुंचा दी। युद्धविराम करते समय भी उसने डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी शर्तों पर रजामंदी न देकर बता दिया कि भारी नुकसान के बाद भी वह आत्म समर्पण नहीं करेगा। बीते कुछ दिनों में युद्धविराम की जिस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं उन्हें देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अमेरिका की अब तक की पूरी रणनीति नाकामयाब रही है। यहाँ तक कि इजराइल की रक्षा प्रणाली तक ईरान के हमलों को रोक पाने में विफल साबित हुई। उक्त दोनों लड़ाइयों ने दुनिया की दो महाशक्तियों की दादागिरी को जबरदस्त चोट पहुंचाई है। रूस की विशाल सैन्य शक्ति जहाँ यूक्रेन को झुकाने में  नाकामयाब रही वहीं अमेरिका के बेहद आक्रामक रवैये के बावजूद ईरान झुकने के लिए तैयार नहीं है। कुछ महीनों पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी दी तब यूरोप के वे छोटे - छोटे देश तक उनके विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठ गए जो दूसरे महायुद्ध के बाद से अमेरिका के संरक्षण में रह रहे थे। इस प्रकार मौजूदा परिदृश्य में विश्व का शक्ति संतुलन बदलता प्रतीत हो रहा है। रूस और अमेरिका जहाँ अपने ही बनाये जाल में फंसने के बाद उससे निकल नहीं पा रहे वहीं चीन बिना उलझे चुपचाप अपनी स्थिति मज़बूत करता जा रहा है। आने वाले समय में विश्व की महाशक्तियों को लेकर कुछ और भ्रम भी टूटना तय है। दुनिया को अपनी मुठ्ठी में बन्द करने का दम्भ भरने वाले चन्द देश अपने अंतर्विरोधों के चलते प्रभाव  खोते जा रहे हैं। इसके चलते वैश्विक शक्ति केंद्र पश्चिम से खिसक कर पूरब अर्थात एशिया की तरफ बढ़ रहा है। और इसीलिए भारत और चीन के महत्व तथा प्रभुत्व में उत्तरोत्तर वृद्धि दिखाई देने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 July 2026

मोदी द्वारा तीन देशों की यात्रा में किये समझौतों से देश को दूरगामी लाभ


मोदी विरोधी यू ट्यूबर डाॅ. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने ताजा वीडियो में खुलासा किया कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें नरेंद्र मोदी द्वारा की गईं विदेश यात्राओं की संख्या बाकी सभी की मिलाकर भी अधिक हैं। विपक्षी पार्टियां भी अमूमन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर छींटाकशी करते हुए उनके महंगे विमान का जिक्र करना नहीं भूलतीं। ये बात पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। भारत जैसे देश में इस पर उंगलियाँ उठना स्वाभाविक है जहाँ करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे ज़िंदगी बसर करने मजबूर हैं। लेकिन इसी के साथ ये देखना भी जरूरी है कि श्री मोदी की विदेश यात्राएं किस उद्देश्य से की जाती हैं ? यदि वे महज सैर - सपाटे के लिए होती हों तब उनकी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन अब तक जो कुछ भी देखने मिला उससे ये साफ है कि उनकी  विदेश यात्राएं पूरी तरह देश के दूरगामी हितों पर केंद्रित होती हैं। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के विदेशी दौरे निरुद्देश्य हुआ करते थे किंतु उस दौर में भारत की वैश्विक भूमिका आज जैसी विस्तृत नहीं होने से उन यात्राओं का दायरा रिश्ते मजबूत करने तक सीमित रहता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के साथ ही सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष, चिकित्सा, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी ताकत के तौर पर पहचान बनाता जा रहा है। दुनिया भर में फैले भारतवंशी देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि कर रहे हैं। उदारीकरण के बाद उत्पन्न स्थितियों में विश्व एक बाजार बन गया है जिसके कारण केवल निर्यातक बनकर कोई नहीं रह सकता। उत्पादन के लिये कच्चा माल और तकनीक का आयात जरूरी है वहीं  विकसित देशों को अपने उत्पादों के लिए बाजार की जरूरत पड़ती है। दुनिया  में जारी मौजूदा उठापटक के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर बाजारवाद की छाया है। विदेश नीति भी घूम - फिरकर आर्थिक हितों से प्रभावित होती है। इसीलिए राष्ट्राध्यक्ष अपने विदेशी दौरों में देश के बड़े उद्योगपतियों को ले जाते हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस बात को पूरी तरह समझते हुए विदेश दौरों में व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी और बड़ी आर्थिक शक्तियों के विकल्प के तौर पर विभिन्न देशों के साथ तार जोड़ते हुए देश के आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा का प्रबंध किया। अमेरिका द्वारा प्रतिकूलता दिखाये जाने के कारण भारत के लिए अपने संबंधों का विकेंद्रीकरण आवश्यक होता जा रहा था। उस लिहाज से भारत  ने  चतुराई दिखाई और विभिन्न देशों से समझौते रूपी  दूरदर्शिता दिखाकर उसके दबाव को कम करने में सफलता हासिल की। यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन से मुक्त व्यापार समझौता इसका उदाहरण है जो अमेरिका के टैरिफ रूपी  आतंक का माकूल जवाब है। गत सप्ताह श्री मोदी ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे में जिस प्रकार के व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक समझौते किये वे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की जरूरतों को निर्बाध पूरा करने के साथ ही  कूटनीतिक स्थिति को मजबूत बनाने में मददगार होंगे। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में चीन की कुटिल नीतियों का मुकाबला करने के लिये तमाम देश भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। ब्रिक्स का प्रमुख सदस्य होने के बाद  भी भारत क्वाड नामक संगठन का सदस्य भी है जो चीन के विरुद्ध मोर्चेबंदी के लिए कार्यरत है। इंडोनेशिया के साथ सबांग बंदरगाह को विकसित करने के  अलावा ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम और क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति और न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक  समझौते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की प्रभावशाली भूमिका का प्रमाण है। अमेरिका - ईरान और रूस - यूक्रेन के बीच युद्ध के लंबे खिंचने के कारण दुनिया के सामने जो संकट आते जा रहे हैं उनसे होने वाले नुकसान से बचने के लिए समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था करना ही बुद्धिमत्ता है। प्रधानमंत्री का ताजा विदेश दौरा उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 11 July 2026

बढ़ती आबादी को मानव संसाधन में बदलना समय की मांग


आज विश्व जनसंख्या दिवस है। पूरी दुनिया  चिंतित है कि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन  घटते चले जायेंगे और तब उनके लिए वैसी ही लड़ाई होगी जैसी कई सालों से रूस और यूक्रेन के बीच चली आ रही है। वहीं प. एशिया में  चल रहे युद्ध के पीछे भी कच्चा तेल नामक काला सोना ही है। चीन की विस्तारवादी नीतियाँ भी प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने पर आधारित हैं। भविष्य में पेय जल की समस्या भी विकराल होने जा रही है।और तब उसके लिए भी संघर्ष होगा। उल्लेखनीय है भारत अब चीन को पीछे छोड़ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ चीन और जापान सरीखे देश जन्म दर में गिरावट से चिंतित हैं क्योंकि  उनके उद्योगों को श्रमिक मिलने की किल्लत होने लगी है। उधर परिवार नामक संस्था के टूटने से भी अनेक विकसित देशों में आबादी  ठहर गई है। यूरोप के कुछ छोटे देशों की आबादी तो लाखों में है किंतु अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के कारण वे विकसित और संपन्न राष्ट्रों में शुमार होते हैं।  लेकिन बेहतर जिंदगी के चलते अन्य देशों के नागरिक जिस तेजी से यहां बसते जा रहे हैं उससे माहौल बिगड़ने लगा है ।  विशेष रूप से अरब देशों से आए शरणार्थी समस्या बन गए हैं । दुनिया में बढ़ती आबादी से  जमीन और पानी की कमी के साथ ही वाहनों की बढ़ती संख्या  पर्यावरण के लिए खतरा बन गई  है। समुद्र में चल रहे हजारों जहाज और आकाश में विचरते वायुयानों से जो प्रदूषण होता है उसका दुष्प्रभाव धरती पर रहने वालों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष  है कि  पृथ्वी पर मौजूद संसाधन  जनसंख्या के अनुपात में  घटते जा रहे हैं। विलासिता पूर्ण जीवनशैली  के कारण भी प्रकृति से खिलवाड़ होने से प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं।  जानलेवा कोरोना  वायरस ने   साबित कर दिया कि मनुष्य की अनगिनत कथित उपलब्धियां किसी न किसी बिंदु पर आकर शक्तिहीन हो जाती हैं । अमेरिका जैसा विकसित और ताकतवर देश भी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ न करने की स्थिति में आ जाता है। विश्व भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की जाती है किंतु जितना दिखावा होता है उसका आधा भी काम नहीं होने से स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे की बन चुकी है। विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लिए उपदेश देने वाले बड़े राष्ट्र पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं । चीन ने अपनी आबादी में वृद्धि को तो  थाम लिया लेकिन कार्बन उत्सर्जन के मामले में वह बेहद लापरवाह है।  भारत की ही बात करें तो आर्थिक विकास के मामले में चीन से हमारा मुकाबला है । लेकिन उसने  जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के साथ ही विशाल आबादी को उत्पादकता से जोड़ा जिसके बाद अफीमचियों के लिए कुख्यात चीन ने अमेरिका को टक्कर दे डाली। साम्यवादी व्यवस्था  के बाद भी उसने उदारीकरण की पश्चिमी अवधारणा को अपने अनुरूप बनाया जिसके कारण  लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ अपनी उत्पादन इकाईयां लगाई। दूसरी तरफ भारत में साठ और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन का जो अभियान जोर - शोर से चलाया जाता था वह उपेक्षा का शिकार होकर रह गया। चुनावी राजनीति ने जिस मुफ्त संस्कृति का विकास किया उसकी वजह से करोड़ों लोग बिना हाथ - पैर चलाए सरकारी सहायता पर अपना पेट भर रहे हैं। विरोधाभास ये है कि  बेरोजगारी के आंकड़े  उच्च स्तर पर हैं लेकिन खेती , उद्योग और छोटे कारोबारी तक  कामगारों की कमी से त्रस्त हैं। चीन ने जिस आबादी को संसाधन बनाया वही हमारे देश में बोझ बनकर रह गई। इसके लिए निश्चित रूप से  राजनीति उत्तरदायी है जिसने  कामचोरी को बढ़ावा  दिया। किसी को हजार -  दो हजार बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय यदि उससे रोजाना घंटे - दो घंटे भी काम करवाया जाए तो उसे श्रम का महत्व समझ आएगा । इसी तरह महिलाओं के खातों में  पांच सौ - हजार जमा करने से उनका सशक्तीकरण हो जायेगा , ये सोचना मूर्खों के  स्वर्ग में रहने जैसा है। ये सच है कि चीन में चुनाव महज दिखावा है इसलिए वहां रेवड़ियां नहीं बांटी जाती और काम करने में सक्षम प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादकता से जोड़ा गया है। वहीं हमारे देश में तो चुनाव कभी न खत्म होने वाला महोत्सव है जिसके दौरान जो मांगोगे वहीं मिलेगा वाली दरियादिली दिखाई जाती है। और तो और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने  में भी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसी बातें आड़े आने लगती है। दुनिया का उत्पादन केंद्र बनने की उम्मीद और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की  महत्वाकांक्षा में जनसंख्या का बोझ बड़ी बाधा बन रहा है। हालांकि वर्तमान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति  2000 का मुख्य उद्देश्य प्रजनन दर को कम करके 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना है। लेकिन इसका हश्र भी परिवार नियोजन अभियान जैसा ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 July 2026

एथेनॉल मिले पेट्रोल के दाम भी कम होना चाहिए



इन दिनों पेट्रोल में एथेनॉल मिलाए जाने का मामला सुर्खियों में है। पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल (E20) के मिश्रण की योजना सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए लागू की गई  है । इसके अंतर्गत अधिकांश पेट्रोल पंपों पर अब 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ही उपलब्ध है। पर्यावरण संरक्षण और आयात खर्च घटाने के अलावा पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण को किसानों की आय बढ़ाने का साधन भी बताया जा रहा है। सतही तौर पर तो ये देशहित में  प्रतीत होता है किंतु इसके साथ ही कुछ विवाद भी उठ खड़े हुए हैं । केंद्र सरकार के परिवहन मंत्री नितिन गडकरी  पर आरोप  है कि उन्होंने अपने बेटे को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने का फैसला करवाया जिसकी फैक्टरी  में इसका उत्पादन होता है। ये भी कहा जा रहा है कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा थोड़ी कम होती है, जिसके कारण वाहनों की माइलेज में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। साथ ही यदि वाहन एथेनॉल  के अनुकूल नहीं है (विशेषकर पुरानी गाड़ियां), तो इंजन के  फ्यूल पाइप या पंप में जंग लगने की शिकायत आ सकती है। दूसरी तरफ ये दावा भी किया जा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में बनी अधिकांश गाड़ियां पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।। साथ ही जो वाहन चालक एथेनॉल रहित पेट्रोल उपयोग करना चाहते हैं वे प्रीमियम पेट्रोल का विकल्प चुन सकते हैं, जिनमें एथेनॉल की मात्रा न के बराबर या बहुत कम होती है। दुनिया के अनेक देशों में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का चलन बढ़ रहा है। लेकिन  उन्होंने उसके अनुकूल वाहनों का उत्पादन करने के बाद ही इस दिशा में कदम बढ़ाये। लेकिन भारत में निर्धारित समय  से पहले ही उसे लागू करने के कारण सवाल उठ खड़े हुए। इसे लेकर केंद्र सरकार पर नीतिगत हमलों से ज्यादा श्री गडकरी पर व्यक्तिगत निशाने साधे जा रहे हैं। इसका कारण उनके परिवार का एथेनॉल उत्पादन से जुड़ा होना है ।  उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे। इसे भाजपा के भीतर चल रही खेमेबाजी से भी जोड़कर देखा जाने लगा। ये अटकलें भी लगने लगीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निकट भविष्य में अपने मंत्रीमंडल में किये जाने वाले फेरबदल में श्री गडकरी को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। यद्यपि ऐसा होना काफी कठिन है क्योंकि एक तो उन्हें रास्वसंघ की पसंद माना  जाता है और दूसरा ये कि मोदी सरकार की विकास मूलक छवि के निर्माण में परिवहन मंत्रालय का प्रमुख योगदान है। आज देश में सड़कों विशेष रूप से राजमार्गों और एक्सप्रेस हाइवे का जो जाल बिछा है उसका श्रेय श्री गडकरी के खाते में ही दर्ज होता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनकी लोकप्रियता दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर है। ऐसे में उनकी घेराबंदी से सरकार भी दबाव में आ रही थी। संभवतः यही देखकर वे सामने  आये और  पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण से निजी लाभ के आरोप का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि उसके उत्पादन में उनके बेटे की इकाई की हिस्सेदारी महज 0.07 प्रतिशत तक ही सीमित है। इसके साथ ही उन्होंने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के इंजिन को होने वाले नुकसान के प्रचार को निराधार बताते हुए चुनौती दी कि जिस किसी के वाहन को क्षति पहुंची हो वह आकर बताये। अब, कितने लोग अपनी शिकायतें लेकर मंत्री जी तक पहुँचेगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु कांग्रेस के प्रवक्ता तहसीन पूनावाला ने श्री गडकरी द्वारा निजी फायदा न होने के दावे  पर पलटवार करते हुए कहा कि 0.07 प्रतिशत हिस्सेदारी से भी 50 से 100 करोड़ आय हो सकती है। खैर, राजनीति अपनी जगह है लेकिन एथेनॉल को लेकर जो संदेह आम उपभोक्ता के मन में है उसे दूर करना जरूरी है। विदेशी  मुद्रा की बचत के अलावा पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने में जनता पूर्णतः सरकार के साथ है किंतु अपने वाहन को नुकसान हो ये किसी को स्वीकार नहीं होगा। इसके अलावा चूंकि एथेनॉल अपेक्षाकृत सस्ता है लिहाजा उसको मिलाने के बाद पेट्रोल के दाम भी उसी अनुपात में कम किये जाने जरूरी हैं। बेहतर हो केन्द्र सरकार पूरे प्रकरण पर विस्तारपूर्वक आलोचनाओं का बिंदुवार जवाब दे जिससे कि भ्रांति दूर की जा सके। ये बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि  एथेनॉल का उपयोग निर्धारित समय सीमा से पहले करने का कारण क्या है ? हालांकि इस बारे में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर द्वारा संसद में दिये जा रहे वक्तव्य का वीडियो भी काफी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाये जाने की तरफदारी करते सुने जा सकते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 July 2026

अच्छा हुआ भारत ने अमेरिका - ईरान के झगड़े से खुद को दूर रखा

मेरिका और ईरान के बीच लड़ाई रुकवाने के लिए पाकिस्तान  की कूटनीतिक पहल पर जब  विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर से पूछा गया कि भारत इस मामले में क्यों पीछे रहा तब उन्होंने उत्तर दिया था कि हम दलाली नहीं करते। उसके बाद मोदी सरकार के पेशेवर  विरोधियों ने पाकिस्तान की शान में कसीदे पढ़ते हुए भारतीय विदेश नीति की  आलोचना का अभियान छेड़ दिया। विदेश मंत्री की दलाली वाली टिप्पणी का मखौल उड़ाने में भी  कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इसके लिए भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया कि उसने खामेनेई की हत्या की  निंदा करने में विलंब किया और बजाय  शीर्ष स्तर पर बयान जारी करने के विदेश सचिव को ईरानी दूतावास भेजकर शोक संदेश सौंपा। जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत हेतु पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा हुए और अंतरिम युद्धविराम पर सहमति बनी तब भी भारतीय विदेश नीति पर  निशाने साधे गए और  पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान से नजदीकी बढ़ने को भारत के लिए खतरा बताया जाने लगा। हालांकि जब अंतिम रूप से युद्धविराम हुआ तब भले ही उस पर हस्ताक्षर पाकिस्तान में नहीं हुए किंतु जब उसे इस्लामाबाद समझौता कहा गया तब सरकार विरोधी प्रचारतंत्र को एक मौका और मिल गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री श्री जयशंकर  तमाम आलोचनाओं का उत्तर देने के बजाय संयमित बयानों तक ही सीमित रहे और पूरा ध्यान कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति जारी रहने पर केंद्रित रखा। उसका लाभ ये हुआ कि युद्ध रुकते ही भारत ने ईरान सहित  अन्य तेल उत्पादक देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदकर देश को ऊर्जा संकट से बचाये रखा। यह भी  संज्ञान योग्य है कि युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पाकिस्तान को किनारे कर दिया गया। वहीं फ्रांस में हुए जी - 7 सम्मेलन में  राष्ट्रपति ट्रम्प ने  श्री मोदी की प्रशंसा करते हुए भारत के महत्व को स्वीकार किया।   युद्धविराम के बाद भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों के बीच  धमकियों के आदान -  प्रदान के अलावा बीच - बीच में आक्रमण और प्रत्याक्रमण का दौर भी चलता  रहा। होर्मुज पर कब्जे को लेकर ईरान की हेकड़ी और ट्रम्प की धमकियां भी नहीं रुकीं। बीते कुछ दिनों में खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए दुनिया भर से कूटनीतिक हस्तियां ईरान में जमा थीं। उसी दौरान ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइलें छोड़ कर भड़काऊ कारवाई कर दी जिसके बाद ट्रम्प ने युद्धविराम खत्म कर ईरान में दर्जनों ठिकानों पर बमबारी करवा डाली।  जिसने शांति की संभावना पर  पानी फेर दिया। आश्चर्य ये है कि खुद को कूटनीति का उस्ताद समझ बैठे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर  युद्धविराम के टूटने पर असहाय  बैठे हैं । ये देखने के बाद इस विवाद में भारत द्वारा अपने को निर्लिप्त रखने की नीति का औचित्य स्वतः ही सिद्ध हो गया। सही बात ये है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को ईरान से संवाद स्थपित करने के लिए बतौर औजार उपयोग किया। यदि वाकई  उसकी वजनदारी इतनी होती तब दोनों पक्षों के बीच संवाद सेतु की भूमिका निभाते हुए दोबारा तनाव पैदा होने ही नहीं देता।   वैश्विक राजनीति के मौजूदा समीकरणों को देखते हुए इस युद्धविराम की सफलता शुरू से ही संदिग्ध रही। डोनाल्ड ट्रम्प तो अविश्वसनीयता के जीते - जागते प्रतीक हैं ही किंतु ईरान के नेताओं में भी वह गंभीरता नहीं है जो ऐसे अवसरों पर अपेक्षित होती है। इसीलिए ये कहना गलत नहीं है कि भारत ने इन दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश से खुद को दूर रखकर बुद्धिमत्ता दिखाई। जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है तो जो देश अपने पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान के साथ लड़ाई नहीं रोक पा रहा वह अमेरिका और ईरान जैसे बड़े देशों की जंग रुकवा देगा ये सोचना भी बेकार है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 July 2026

सैन्य महाशक्ति बनने की दिशा में एक और कदम




भारत केवल सोने और कच्चे तेल का ही सबसे बड़ा आयातक नहीं बल्कि विदेशी हथियारों के सबसे बड़े खरीददारों में से भी है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन  स्वीडन और इजराइल आदि देशों से हम अस्त्र - शस्त्र, खरीदते रहे हैं।  तोप, लड़ाकू विमान, पनडुब्बी आदि का निर्माण भारत में होने के बावजूद उनमें लगने वाले कल - पुर्जों के लिए विदेशों पर निर्भरता खत्म नहीं हो सकी ।  इस वजह से इनके उत्पादन में विलंब होता आया है। मोदी सरकार ने इसीलिए टेक्नालाजी ट्रांसफर पर जोर देना शुरू किया जिसके अनुकूल परिणाम भी मिलने लगे हैं। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र को सरकारी एकाधिकार से निकालकर  निजी क्षेत्र को उसमें हिस्सेदारी देने जैसा बहुप्रतीक्षित और साहसिक कदम भी उठाया गया है । यद्यपि निजीकरण के विरोध के नाम पर इस फैसले पर भी उंगलियाँ उठीं। विशेष रूप से ये आपत्ति की गई कि निजी उद्योगों को रक्षा उत्पादन का समुचित तजुर्बा नहीं है। लेकिन बीते कुछ सालों में जो अनुभव आया उसने सरकार के निर्णय के औचित्य पर मुहर लगाते हुए आलोचकों के मुँह बंद कर दिये। सबसे बड़ी बात ये हुई कि भारत ने अपने रक्षा सौदों को एक - दो देशों तक सीमित न रखते हुए राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी और बिना दबाव के उन्हें अंतिम रूप दिया। विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस ने इन सौदों पर प्रधानमंत्री को घेरने का हरसंभव प्रयास किया । 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री को घेरने के लिए चौकीदार चोर है जैसा नारा बुलंद किया किंतु जनता ने उसे अनसुना करते हुए उनको पहले से अधिक सीटें देकर उनकी नीतियों का अनुमोदन कर दिया। जिसके बाद केंद्र सरकार का उत्साह और बढ़ा जिसके चलते उसने रक्षा सौदों के मामले में तेजी से निर्णय लेते हुए सेनाओं को अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित करने का अभियान छेड़ा। 2014 में जब ये सरकार सत्ता में आई तब हमारी सेनाएं उनकी कमी से जूझ रही थीं जिसकी जानकारी सार्वजनिक होने से जनता का मनोबल गिरने लगा । लेकिन अब स्थितियाँ बदल गईं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारी सैन्य शक्ति की क्षमता और श्रेष्ठता पूरी दुनिया के सामने प्रमाणित हो गई। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की महत्वाकांक्षा पूरी होने के लिए जरूरी है हम सैन्य शक्ति के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनें। और उससे भी बढ़कर ये कि रक्षा उत्पादन में विदेशों पर हमारी निर्भरता घटने के बाद हम अपने अस्त्र - शस्त्रों का निर्यात कर सही मायनों में महाशक्ति बनें। गौरव का विषय है कि भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं। वियतनाम के बाद अब इंडिनेशिया ने भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का सौदा किया जिस पर उसकी राजधानी  जकार्ता में गत दिवस प्रधानमंत्री श्री मोदी ने  वहाँ के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ हस्ताक्षर किये। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में व्यापारिक भागीदारी को लेकर भी अनेक समझौते किये गए जिनमें धरती से अंतरिक्ष तक चलने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ शामिल हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने इंडोनेशिया के सबाँग बंदरगाह को विकसित करने का जो समझौता किया वह मलक्का जल डमरूमध्य में भारत की उपस्थिति को मजबूती प्रदान करने वाला है जिससे इस क्षेत्र के समुद्र में चीन के बढ़ते दबदबे को चुनौती दी जा सकेगी। उल्लेखनीय है दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देश चीन की विस्तारवादी नीतियों से भयभीत होकर भारत के साथ जुड़ना चाह रहे हैं। वियतनाम के बाद इंडिनेशिया के साथ हुए समझौते इसके प्रमाण हैं। जाहिर है भारत अब एक क्षेत्रीय महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करने में सफल हो रहा है। प्रधानमंत्री की ये यात्रा इस दिशा में बढ़ाया गया बड़ा कदम है। सबाँग बंदरगाह के विकास का अनुबंध चीन की उस चाल का सटीक जवाब है जो उसने हाल ही में बांग्लादेश के एक बंदरगाह को हथियाकर चली थी। पहले ये सौदा भारत के साथ होना था। इस प्रकार इंडोनेशिया की इस यात्रा से श्री मोदी ने एक साथ कई लक्ष्य साधे। मौजूदा वैश्विक हालातों में भारत की ये उल्लेखनीय सफलता है जिसका असर  निकट भविष्य में महसूस होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 July 2026

बर्फ़ानी बाबा के लिए खतरा बना आस्था का अतिरेक


जम्मू कश्मीर स्थित अमरनाथ की पवित्र गुफा में स्वनिर्मित बर्फ के शिवलिंग का दर्शन करने लाखों श्रृद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। दुर्गम रास्तों से होते हुए वहाँ पहुँचने का सफर मुश्किल  होने के बाद भी आस्था के वशीभूत देश - विदेश से सनातनी परंपरा के अनुगामी शिव भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। पहले पहलगाम से चंदनबाड़ी होते हुए अमरनाथ पहुंचा जाता था, जिसमें तीन दिन लगते थे। लेकिन अब बालटाल से  दूसरा मार्ग  खुल जाने से यात्रा की अवधि कम हो गई है। यात्रियों के लिए पूरे रास्ते में निःशुल्क भोजन का प्रबंध भंडारों के रूप में होता है। यह यात्रा कश्मीर घाटी के मुस्लिम वॅाशिंदों के लिए आय का बड़ा साधन है क्योंकि अमरनाथ आने वाले यात्रियों का बड़ा वर्ग कश्मीर में अन्य स्थानों का भ्रमण भी करता है जिसके कारण वहाँ पर्यटन उद्योग भी फलता - फूलता है। यद्यपि आतंकवाद के दौर  में घाटी का पर्यटन बहुत कम हो गया था किंतु अमरनाथ यात्रा का उत्साह लगातार बढ़ता रहा जो आतंकवाद की प्रतिक्रिया थी। धारा 370 हटने के बाद घाटी के हालात सुधरे तब इस यात्रा का आकर्षण और बढ़ा। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद श्रृद्धालुओं में नये सिरे से जोश दिखाई देने लगा। इस साल गर्मियों में जम्मू कश्मीर में पर्यटकों की संख्या ने भी पुराने कीर्तिमान तोड़ दिये। इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष अमरनाथ यात्रा में श्रृद्धालुओं की बाढ़ आ जायेगी। यद्यपि कश्मीर घाटी से आतंकवाद की विदाई हो चुकी है किंतु उसके कुछ बीज अभी भी अंकुरित हो जाते हैं। यही कारण है कि यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था का दायित्व  सेना को सौंपा जाता है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर जिस पहलू पर लोगों का ध्यान नहीं जाता वह है इस यात्रा से अमरनाथ के पर्यणवरण पर पड़ने वाला प्रभाव। 3 जुलाई से  अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही मात्र चार दिनों में लगभग 60 हजार यात्री अमरनाथ की यात्रा कर चुके हैं। 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा हेतु 4 लाख लोगों का पंजीयन हो चुका है। लेकिन श्रृद्धालुओं को निराश करने वाली खबर ये है कि पवित्र गुफा में बनने वाला पवित्र हिम शिवलिंग तेजी से पिघलकर  करीब एक फीट का रह गया है । जबकि मई माह में इसकी ऊंचाई लगभग 7 फीट और  पहली पूजा के समय  5 फीट से अधिक थी। यदि यही स्थिति रही और पर्यटकों की भीड़ निरंतर बढ़ती गई तब आने वाले दिनों में गुफा के भीतर शिवलिंग आकार ही नहीं लेगा। उल्लेखनीय है अमरनाथ में बढ़ती भीड़ के कारण प्राकृतिक विपदाएं भी आने लगी हैं। इस साल वहाँ हेलीकाप्टर सेवा रोकने का कारण भी पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकना ही है। सोचने वाली बात ये है कि श्रृद्धालु जिस प्रकृति निर्मित पवित्र शिवलिंग के दर्शन हेतु तरह - तरह के कष्ट सहने के साथ ही समय और पैसा खर्च करते हुए आता है, वही उसे न दिखे तो निराशा और दुःख होना स्वाभाविक है। हालांकि अमरनाथ के इस अद्भुत शिवलिंग का पिघलना नई बात नहीं है। प्रतिवर्ष यात्रा शुरू होने के बाद से ऐसा होता है। इसका सीधा कारण इस निर्जन स्थान पर अचानक भीड़ की मौजूदगी है जो दो महीनों तक बनी रहती है। जैसे - जैसे सनातन के प्रति श्रृद्धा और प्रतिबद्धता में वृद्धि हो रही है वैसे - वैसे धर्मस्थलों में जन सैलाब उमड़ने लगा है। लेकिन जो धर्मस्थल पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं उनमें अपेक्षा से अधिक मानवीय उपस्थिति उनके नैसर्गिक स्वरूप के लिए हानिकारक बनती है । भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं इसका प्रमाण हैं। कुछ साल पहले अमरनाथ में  गुफा के पीछे से अचानक आया जनसैलाब प्रलय का एहसास करवा गया था। केदारनाथ त्रासदी की स्मृति भी रोंगटे खड़े कर देती है। ये कहना गलत नहीं है कि  अमरनाथ में शिवलिंग के पिघलने  का सबसे बड़ा कारण वहाँ श्रृद्धालुओं की बढ़ती भीड़ ही है। हमारा आशय किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं है किंतु तीर्थ यात्रा और पर्यटन में जो भावनात्मक अंतर है उसका निहितार्थ समझने की जरूरत है। और जिस बर्फ़ानी बाबा को देखने जाएं , वही लुप्त रहें तो यात्रा का स्वाभाविक आनंद और उससे जुड़ी आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 July 2026

मुंबई की बदहाली शर्मनाक



इस साल मानसून देर से आया। उसके कारण देश के बड़े भूभाग में जल संकट के साथ ही खरीफ फसल के लिए धान के रोपे लगाने में विलंब होने से किसान परेशान है। नदियों, तालाबों और कुओं आदि का जल स्तर खतरे के निशान से भी नीचे चला गया। भूजल स्तर गिरने से जलापूर्ति पर भी बुरा असर पड़ा है। हालांकि अब मानसून सक्रिय होकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन जिस तरह उसके विलंबित होने से स्थिति चिंताजनक हो उठी वही दशा उसके आने के बाद देखने मिल रही है। जिसकी बानगी देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई है। बीते दो - तीन दिनों से वहाँ भारी बारिश होने से जनजीवन अस्त - व्यस्त हो गया है। मुंबई - पुणे के रास्ते में अनेक स्थानों पर भूस्खलन के कारण यातायात अवरुद्ध  है। मुंबई महानगर और उसके उपनगरीय क्षेत्रों में भी अति वृष्टि से सभी व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। निचले इलाकों में जल भराव की समस्या तो सभी शहरों में कमोबेश एक जैसी है। लेकिन मुंबई कोई साधारण शहर न होकर वैश्विक पहचान रखता है। इसीलिए यहाँ होने वाली किसी भी छोटी - बड़ी घटना की चर्चा दूर - दूर तक होती है। आज मिल रही खबरों के  मुताबिक मुंबई से जाने और आने वाली उड़ानें बड़ी संख्या में रद्द की जा चुकी हैं या विलम्बित हैं। इस महानगर की जीवन रेखा कही जाने लोकल ट्रेन सेवा पर भी बुरा असर पड़ा है। दर्जनों गाड़ियां रद्द करने से सप्ताह के पहले दिन ही लाखों लोग अपने गन्तव्य तक नहीं जा सके। कुल मिलाकर हालात चिंताजनक होने के साथ ही शर्मनाक भी हैं। हालांकि अप्रत्याशित रूप से होने वाली भारी बरसात के कारण किसी भी शहर में व्यवस्थाएं   गड़बड़ा जाना स्वाभाविक  हैं किंतु मुंबई में ऐसा होना इसलिए शर्मिंदा करता है क्योंकि यह एक अंतर्राष्ट्रीय महानगर होने से देश की छवि को पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करता है।  देश का मुख्य व्यवसायिक केंद्र होने से यहाँ गतिविधियां ठप होने से प्रतिदिन करोड़ों - अरबों का नुकसान होता है। एक ही दिन में जरूरत से ज्यादा बरसात होने पर स्थितियाँ खराब होना स्वाभाविक है लेकिन मुंबई में चूंकि प्रति वर्ष ऐसा होता है इसलिए ये विचारणीय प्रश्न है कि महाराष्ट्र सरकार और मुंबई महानगर पालिका हर साल पैदा होने वाले इस संकट से लोगों को बचाने के लिए क्या करते हैं ? हालांकि देश के सभी महानगरों के अलावा अन्य प्रमुख शहरों की स्थिति भी भारी बरसात होने पर चिंताजनक हो जाती है जिससे ये साबित होता है कि हमारे देश में शहरों की बसाहट और उनका नियोजन दोषपूर्ण है।  अनियोजित विस्तार  और आबादी के बढ़ते बोझ के कारण शहरों की कमर टूटती जा रही है। यद्यपि चर्चा बड़े शहरों की ज्यादा होती है लेकिन बढ़ते शहरीकरण का दुष्प्रभाव अब पूरे देश में अनुभव किया जा सकता है। मुंबई में आई मौजूदा आपदा के परिप्रेक्ष्य में इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाये जाने चाहिए। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी योजना के तहत अरबों रुपये खर्च करने के बाद जिन शहरों की सूरत सुधारने का दावा सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है उनमें भी बरसात बुरे हाल कर देती है। इन सबसे साबित होता है कि  सिर्फ महानगर ही नहीं अपितु छोटे और मध्यम आकार के शहरों में आपदा प्रबन्धन की स्थिति चिंताजनक है। हर साल इससे होने वाले नुकसान को रोकने की व्यवस्था हो सके तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान से बचाने के अलावा जनता को होने वाली तकलीफों से निजात मिल सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी