पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसके दो संकेत बीते दिनों दिल्ली में देखने मिले। पहला किसानों द्वारा पाँच साल पहले दिल्ली में दिये धरने की पुनरावृत्ति और दूसरा जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन। पहली मुहिम को तो सरकार ने समझा - बुझाकर ठण्डा कर दिया लेकिन जंतर मंतर आंदोलन लम्बा खिंचा जिसकी राष्ट्रव्यापी चर्चा भी हुई। ये सवाल उठना लाजमी है कि उक्त दोनों का पंजाब चुनाव से क्या संबंध है तो इसका जवाब है किसानों के दिल्ली में जमावड़े के पीछे भी पंजाब लॉबी थी और इसी तरह जंतर मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के धरने में आम आदमी पार्टी द्वारा सामने आकर सक्रियता दिखाने के पीछे भी पंजाब चुनाव ही है । असल में दिल्ली की सत्ता गँवाने के बाद अरविंद केजरीवाल भी एक बार सुर्खियों में आने के लिए प्रयासरत थे। शुरू में कॉकरोच जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की जुगलबंदी लोगों को अटपटी लगी परंतु जल्दी ही ये सच्चाई उजागर हो गई कि दोनों का डी. एन.एक ही है। कॉकरोच जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा आम आदमी पार्टी से पुराने जुड़ाव को भी स्वीकार किया गया । जिस तरह से केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, संजय सिंह और आतिशी ने जंतर मंतर पर नियमित उपस्थिति दर्ज करवाई उसके बाद रहा - सहा संदेह भी मिट गया। और जब आंदोलन समाप्त होने पर कॉकरोच जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता से पूछा गया कि पेपर तो पंजाब में भी लीक हुआ तो क्या जंतर मंतर जैसा आंदोलन भगवंत सिंह मान सरकार के विरुद्ध भी किया जाएगा, तब वे उसका जबाब देने से बचे जिससे जाहिर हो गया कि इस पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच रणनीतिक भागीदारी है। इसी ने राहुल गाँधी को जंतर मंतर पर आने से रोका और जिससे हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री निवास पर धरने का आयोजन किया। गत दिवस कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी ये स्वीकार किया कि छात्रों की समस्या को कांग्रेस और राहुल ने पहले ही उठाया था किंतु उसे अपेक्षित जनसमर्थन क्यों नहीं मिला इसके लिए पार्टी को जनता की नब्ज समझने की जरूरत है। कांग्रेस भी पंजाब के आगामी चुनाव के लिए कमर कस रही है लेकिन कुछ साल पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की लड़ाई ने जिस प्रकार उसका भट्टा बिठाया वही इस बार पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के नेतृत्व को अस्वीकार करने की घोषणा से दोहराई जा रही है। आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार वैसे तो काफी अलोकप्रिय हो चुकी है लेकिन सक्षम विकल्प सामने नहीं आने से उसे मैदान खाली नजर आने लगा। कांग्रेस की दुविधा ये है कि पंजाब में उसके भीतरी संग्राम के कारण बचा - खुचा जनाधार भी खिसकने का खतरा है। और फिर वह किसी अन्य पार्टी से गठजोड़ करने की स्थिति में भी नहीं है। संयोग से यही विडंबना भाजपा के साथ भी है। सिखों के बीच वह आज भी समुचित पैठ नहीं बना सकी। हालांकि राज्य में 39 फीसदी हिंदू भी हैं किंतु वे मुख्य रूप से शहरों में ही हैं और उनका एक हिस्सा कांग्रेस के साथ भी है। भाजपा ने पहले कोशिश की कि अन्य राज्यों जैसे ही पंजाब में भी हिंदुओं का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर ले। खालिस्तानी आंतक में वृद्धि से इसकी संभावना बढ़ी भी लेकिन पार्टी के पास ऐसा कोई दमदार नेता नहीं है जो हिंदुओं को गोलबंद कर सके। हालांकि आम आदमी पार्टी से आये आधा दर्जन सांसद उसके मददगार हैं किंतु वे प. बंगाल जैसा उलटफेर करने का माद्दा नहीं रखते। इसीलिये पार्टी ने अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल की तरफ हाथ बढ़ा दिया जिसका प्रमाण सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात से मिल गया। इन दोनों का गठबंधन अतीत में राज्य की सत्ता भी चला चुका है किंतु 3 कृषि कानूनों को लेकर दोनों दूर हुए और 2022 में अलग - अलग लड़कर नुकसान उठाया। शायद दोनों समझ चुके हैं कि एक बार फिर एक साथ आने से वे पंजाब की राजनीतिक मुख्यधारा में लौट सकेंगे। हालांकि प्रकाश सिंह बादल की मृत्यु के बाद अकाली दल की वह ताकत नहीं रही और सिख नेतृत्व भी खेमों में बंट चुका है। बढ़ती नशाखोरी और सीमावर्ती ग्रामीण जिलों में दलित सिखों के तेजी से हो रहा ईसाईकरण भी नये समीकरणों को जन्म दे रहा है। ऐसे में अकाली - भाजपा गठजोड यदि मजबूती से उतरा और दोनों के बीच पुराना भरोसा कायम हुआ तब वे आम आदमी पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। फ़िलहाल तो पंजाब के बारे में सियासी भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी।
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