Saturday, 22 August 2026

इस्लामिक नाटो : डर न सही किंतु सतर्कता जरूरी





पाकिस्तान में तुर्किये के लड़ाकू विमानों की खेप उतरने के बाद भारत में चिंता महसूस की जा रही है। हाल ही में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने  एक समझौता किया जिसके अनुसार इनमें से किसी एक पर हुआ हमला सभी पर माना जाएगा। इस्लामिक नाटो का गठन होने के पहले पाकिस्तान व सऊदी अरब में इस तरह का  समझौता हो चुका था। लेकिन उसकी पोल उस समय खुल गई जब ईरान ने सऊदी अरब पर मिसाइलें दागीं तब पाकिस्तान ने कुछ नहीं किया। उल्टे वह ईरान और अमेरिका के बीच  मध्यस्थता में जुटा रहा। हालांकि उन कोशिशों का कोई लाभ नहीं हुआ और ईरान तथा अमेरिका दोनों ने उसको  हाशिये पर धकेल दिया। दरअसल पाकिस्तान को इस बात का डर सता रहा है कि इजरायल उसे भी निशाना बना सकता है। इसीलिए उसने पहले सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया और अब तुर्किये को भी उसमें जोड़कर अपने लिए रक्षा कवच  का इंतजाम कर लिया। स्मरणीय है तुर्किये पिछले काफी समय से भारत विरोधी रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को सैन्य सामग्री उपलब्ध करवाने में आगे - आगे है। ये भी खबर है कि उसके लड़ाकू विमानों के अलावा चीन ने भी अपने युद्धक विमान पाकिस्तान में तैनात किये हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस जमावड़े को सीधे - सीधे भारत विरोधी मोर्चेबंदी न भी मानें किंतु इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में  तनाव उत्पन्न होने पर ये विमान भारत के विरुद्ध इस्तेमाल हो सकते हैं। फिलहाल तो ये लग रहा है कि पाकिस्तान को भारत के साथ ही इसरायल से भी डर लग रहा है। इसके अलावा ईरान भी उसे संदेह की नजर से देखने लगा है क्योंकि इस्लामाबाद में भले ही अमेरिका और उसके बीच मध्यस्थता की बिसात बिछी किंतु पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिफ मुनीर जिस प्रकार से डोनाल्ड ट्रम्प के चरण चुंबन में जुटे रहे उससे ईरानी हुकूमत सशंकित हो उठी है। उधर इसरायल की नाराजगी इस बात से है कि पाकिस्तान ने गाजा लड़ाई के समय हमास का साथ दिया वहीं  अन्य इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के प्रति भी उसकी, सहानुभूति सर्वविदित है।   और फिर पाकिस्तान खुद भी आतंकवाद की नर्सरी के तौर पर कुख्यात है। लेकिन इस्लामिक नाटो के गठन में जो जल्दबाजी की गई उसके पीछे का कारण  उसकी आंतरिक उथल - पुथल है। बीएलए (बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी) नामक संगठन द्वारा बलूचिस्तान को अलग देश बनाने के लिए किये जा रहे सशस्त्र संघर्ष ने इस्लामाबाद में बैठे हुक्मरानों की नाक में दम कर रखा है। इसकी, देखा सीखी सिंध प्रांत में जिये सिंध आंदोलन के बीज फिर अंकुरित होने लगे हैं। पश्चिमी सीमांत पर  अफ़ग़ानिस्तान पालित तालिबानी लड़ाके पाकिस्तान की सीमा में घुसकर जमीन कब्जाते जा रहे हैं। और अब पाक अधिकृत कश्मीर में भी  वैसा ही विद्रोह देखने मिल रहा है जैसा 1970 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुआ जिसके बाद मुल्क के दो टुकड़े हो गए। पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में चीन का बड़ा पूंजी निवेश होने से वहाँ की तनावपूर्ण स्थिति ने बीजिंग की नींद उड़ा दी है। उसके जो प्रकल्प चल रहे हैं उनमें कार्यरत इंजीनियरों सहित अन्य कर्मियों पर जानलेवा हमले हो चुके हैं। स्थानीय जनता के विरोध से कई काम बंद  हैं। पाकिस्तानी सरकार का आरोप है कि मुल्क के भीतर हो रही गड़बड़ियों में   भारत की भूमिका है। उसे ये भय भी है कि पाक आधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में भारत वैसी ही कार्रवाई कर सकता है जैसी उसने बांग्लादेश में की थी। उसकी चिंता ये भी है कि अफ़ग़ानिस्तान से भारत  के रिश्ते बेहद मधुर चल रहे हैं। वह इस देश को हर संभव सहायता दे रहा है। इस्लामाबाद को इस बात की आशंका है कि भारत , अफगानिस्तान की धरती से बलूचिस्तान के स्वाधीनता संघर्ष को सक्रिय सहायता दे सकता है। चूंकि राजनीतिक अस्थिरता भी पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बनी हुई है इसलिए उसे बाहरी संरक्षण की जरूरत पड़ गई। हालांकि इस्लामिक नाटो उसकी हिफाजत कर सकेगा ये संदिग्ध है क्योंकि तुर्किये और सऊदी अरब दोनों अपनी समस्याओं में जिस तरह उलझे हैं उनसे निकलकर पाकिस्तान की मदद करना बेहद कठिन है। हाँ, ईरान पर दबाव बनाने के लिए अवश्य ये गठजोड़ कारगर हो सकता है। भारत को इससे डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि सऊदी अरब , भारत से पंगा लेने की हिमाकत नहीं करेगा। चीन भी घुड़कियाँ कितनी भी दे लेकिन वह सीधी टक्कर से बचता है। लेकिन सतर्कता जरूरी है क्योंकि तुर्किये और पाकिस्तान धूर्तता के पर्याय हैं। हालांकि पाकिस्तान अपनी आंतरिक समस्याओं में उलझा होने से सीमा पर बड़ी हरकत करने से बचेगा क्योंकि बालाकोट और पिछले मिनी युद्ध की पिटाई वह भूला नहीं होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


No comments:

Post a Comment