Friday, 21 August 2026

जेन जी आंदोलन को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन नहीं



बीते एक दशक में अनेक युवा चेहरे धूमकेतु की तरह उभरे जिन्होंने  बड़े - बड़े आंदोलन खड़े कर सरकार को चुनौती दी । भले ही वे उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सके किंतु  युवाओं का एक वर्ग उनके प्रति आकृष्ट हुआ। उनके आह्वान पर जमा हजारों की भीड़  जोशीले भाषण सुनकर तोडफ़ोड़ और हिंसा के रास्ते पर चलने में भी नहीं डरती। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर, जिग्नेश मेवाणी,  कन्हैया कुमार , उमर खालिद, शर्जील इमाम और ऐसे ही अनेक नाम युवा क्रांति के अग्रदूत बनकर परिदृश्य पर उभरे किंतु जिस तेजी से उनका सितारा चमका उसी तेजी से वह फीका पड़ गया।इनमें से कुछ जेल में हैं, कुछ मामूली सफलता पाकर संतुष्ट हैं और बाकी ने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी का दामन थाम लिया। लेकिन उसके बाद भी वे उस शोहरत को बरकरार नहीं रख सके जो उन्हें कुछ समय के लिए मिली। दरअसल उन्होंने जिस जमीन बड़ी इमारत खड़ी करने का दुस्साहस किया वह ठोस नहीं थी। किसी  ज्वलंत मुद्दे को गर्म करके भीड़ एकत्र कर उसे  उकसाने में उन्हें भले ही सफलता मिली किंतु वह टिकाऊ नहीं हो सकी। दरअसल वे इस बात को नजरंदाज कर बैठे कि भीड़ को संगठित शक्ति में बदलना  कठिन होता है। वह क्षणिक तौर पर तो प्रभाव छोड़ती है किंतु जल्द ही उसमें बिखराव आने लगता है। महत्वाकांक्षाओं का टकराव  अंतर्कलह का रूप लेता है जिसके कारण  आंदोलन का मूल स्वरूप नष्ट होकर निजी हित सर्वोपरि हो जाते हैं।  उदाहरण के तौर पर  हार्दिक पटेल और कन्हैयाकुमार जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। हार्दिक ने गुजरात की शक्तिशाली पटेल जाति को भाजपा सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतारकर  राजनीतिक समीकरण उलट - पुलट करने की संभावना उत्पन्न कर दी थी। लेकिन अंततः वे भी भाजपा शरणम् गच्छामि होकर विधायक बने बैठे हैं। दलितों की आवाज उठाकर प्रकाश में आये जिग्नेश भी लंबी रेस का घोड़ा नहीं बन पाए। दिल्ली स्थित वामपंथियों की वैचारिक नर्सरी कहे जाने वाले जे. एन. यू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार अपनी ओजस्वी भाषण शैली के चलते वामपंथ के भविष्य  के तौर पर उभरे। लेकिन जब कोई संभावना नहीं दिखी तब कांग्रेस में आकर राहुल गाँधी के पिछलग्गू बन बैठे। 2019  में बिहार के घरेलू मैदान बेगूसराय और 2024 में बाहरी दिल्ली में उन्हें शर्मनाक पराजय झेलना पड़ी जबकि इस सीट पर लाखों की संख्या में बिहारी मतदाता हैं। इसी तरह का उदाहरण है अन्ना हजारे के आंदोलन से उत्पन्न आम आदमी पार्टी जो भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का नारा लगाकर सत्ता तक जा पहुंची।  उसके आकर्षण में फंसकर अनेक  प्रतिभाशाली युवा अपना स्वर्णिम भविष्य दांव पर लगाकर साफ - सुथरी राजनीति का झंडा उठाये घूमने लगे। लेकिन जल्द ही उसके अनेक संस्थापक  खुद बाहर आ गये और जिन्होंने अरविंद केजरीवाल को उनके वायदे याद दिलाये उन्हें धकियाकर बाहर कर दिया गया। इसी तरह अनेक युवा भी निराश होकर दूसरे रास्ते पर चले गये। आज पार्टी की दशा और दिशा क्या है ये बताने की जरूरत नहीं है। उपरोक्त उदाहरण देने का उद्देश्य ये बताना मात्र है कि क्षणिक उन्माद के बल पर चमकने वाले आंदोलन और उसका नेतृत्व करने वाले चंद चेहरे समय के प्रवाह में कहाँ ओझल हो जाते हैं,  पता ही नहीं चलता। बीते कुछ समय से हमारे देश में युवाओं को समूहबद्ध कर एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने का अभियान चल रहा है। जेन जी नामक एक  आयु वर्ग को सामने लाकर व्यवस्था में व्याप्त विकृतियों के विरुद्ध आंदोलन के जरिये सत्ता को चुनौती देने का प्रयोग शुरू किया गया जिसका पहला प्रदर्शन दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के रूप में देखा गया।लेकिन तात्कालिक सफलता के बाद वह सैलाब जैसे आया वैसे ही चलता बना। अब उसके कथित नेता अपने लिए किसी भूमिका की तलाश में हैं। लेकिन जो युवा शक्ति उस आंदोलन में नजर आई उसका कोई संगठित ढांचा नहीं होने के कारण उस आंदोलन की उपलब्धियों से ज्यादा उसके साथ जुड़ी नकारात्मक बातों की चर्चा हो रही है। ये कहना भी गलत न होगा कि आंदोलन में शामिल अनेक युवा और छात्र अपराधबोध से ग्रसित हैं। दो दिन पहले लद्दाख़ जा रही एक युवती ने जेन जी के नाम पर वहाँ उपस्थित सेना के अधिकारी और सुरक्षा बल के लोगों से जो बेहूदगी की उसकी पूरे देश में निंदा हो रही है। जेन जी को मोहरा बनाकर देश में अव्यवस्था और  अराजकता फैलाने की जो योजना कुछ लोगों ने तैयार की थी वह शुरुआती दौर में ही दम तोड़ती दिख रही है क्योंकि उसके पीछे अधकचरी सोच और देश को अस्थिर करने में लगीं विदेशी शक्तियों का हाथ है। यही वजह है कि इस खेल को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन हासिल नहीं हो पाया। ऐसे में बड़ी बात नहीं अभिजीत दिपके और उनके कुछ साथी जल्द ही किसी पार्टी की गोद में बैठे दिखें। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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