Thursday, 27 August 2026

नेपाल हादसे का सबक : पहाड़ों को भी शांति और आराम चाहिए



       नेपाल में आये जलसैलाब ने प्रलय जैसा मंजर उत्पन्न कर दिया। वर्ष 2013 के जून महीने में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम में भी इसी तरह के दृश्य देखने मिले थे। उस हादसे में भी सैकड़ों लोग मारे गए थे। केदारनाथ मंदिर से और ऊपर पहाड़ों पर हुई भारी बरसात के कारण हुए हिम स्खलन से बनी बड़ी झील के फूटते ही  असीमित जलधारा ने केदारनाथ धाम सहित गौरीकुंड और उसके आगे तक भयावह दृश्य उत्पन्न कर दिये। जलसैलाब के रास्ते में जो कुछ भी आया वह पलक झपकते नष्ट हो गया।  हिमालय की विशाल पर्वतमाला में प्राकृतिक आपदाओं का आना नई बात नहीं है किंतु केदारनाथ हादसा अकल्पनीय था जिसकी याद तक रोंगटे खड़े कर देती है। गत दिवस नेपाल में जो कुछ भी हुआ उसे उसकी पुनरावृत्ति कहना गलत नहीं होगा। वहाँ भी सैकड़ों लोग मौत का शिकार हुए जिनमें भारत से गए मानसरोवर यात्रियों सहित दर्जनों  देशी - विदेशी  सैलानी भी शामिल हैं । हादसे की विभीषिका समाचार माध्यमों से आये चित्रों और वीडियो से अनुभव की जा सकती है। इस प्राकृतिक आपदा  से भारत को भी सतर्क हो जाना चाहिये क्योंकि हमारे पहाड़ी क्षेत्रों और नेपाल की भौगोलिक संरचना और पर्यावरण की स्थिति कमोबेश एक समान है। बिहार और उ.प्र की नदियों में अचानक आई बाढ़ इसका प्रमाण है। 
       
     पहाड़ों को हौसलों का प्रतीक कहा जाता है। उन तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक तीर्थ स्थल पहाड़ों में स्थित हैं। ग्रीष्म काल में हिल स्टेशन भी सैलानियों से भर जाते  हैं। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में  भी पहाड़ों के प्रति दीवानगी होती है। पर्वतीय स्थल  मानसिक शांति के साथ - साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माने जाते हैं। एक समय था जब वहाँ ऋषि - मुनि तपस्या करते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी पर्वतीय क्षेत्रों में होते थे।  ब्रिटिश राज में   पर्वतीय क्षेत्रों  तक जाने के लिए सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला तो अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। हालांकि आजादी के बाद भी पर्यटन केंद्रों के रूप में तीर्थस्थलों के अलावा पर्वतीय स्थानों को विकसित किया गया।  मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से पर्वतीय क्षेत्रों में बेतहाशा भीड़ होने लगी है। विकास के तौर पर  सड़कों और पुलों आदि का निर्माण भी बड़ी मात्रा में हुआ जिनके  लिए वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के पानी को घुमाने सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना  आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देने का क्रम जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास के साथ ही आमोद - प्रमोद के उद्देश्य से किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों के प्रति उपेक्षाभाव प्रदर्शित किया । यही कारण है कि  उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती  हैं वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों  को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को जो नुकसान हुआ उसकी वजह से  प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी है।
   
    नेपाल की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है जो पर्यटकों के अलावा पर्वतारोहियों की पसंदीदा जगह है। गत दिवस वहाँ जो प्रलय लीला हुई उसे  तात्कालिक संकट मान लेना बड़ी भूल होगी। ये हादसा आगाह करता  है कि पहाड़ों में मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण होना चाहिए।  वहाँ होने वाले निर्माण में  कितनी  भी तकनीकी कुशलता दिखाई जाए किंतु ये सोचना मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है।  हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण सुरक्षा की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। इसलिये बेहतर हो पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना नेपाल जैसी विनाशलीला का सामना हमें भी कब करना पड़ जाए ये कोई नहीं जानता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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