वर्ष 2017 के नवंबर माह में राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर में दर्शन हेतु गए तब वहाँ अतिथि पुस्तिका में उनका नाम गैर हिन्दू के तौर पर दर्ज किया गया। उस समय गुजरात विधानसभा के चुनाव चल रहे थे। श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू के रूप में दर्ज होने की जानकारी सार्वजनिक होते ही कांग्रेस में ये भय व्याप्त हो गया कि इसके कारण गुजरात में हिंदुओं के बीच पार्टी का रहा - सहा जनाधार भी खिसक न जाए। इसलिए फ़ौरन बचाव अभियान शुरू हुआ। राहुल खुद तो नहीं बोले किंतु कांग्रेस की ओर से रणदीप सुरजेवाला ने पत्रकार वार्ता में श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू बताये जाने को भाजपा की साजिश बताते हुए कहा कि वे कश्मीरी ब्राह्मण हैं और उनका गोत्र दत्तात्रेय है । उन्होंने राहुल के जनेऊधारी होने का दावा करते हुए प्रमाण स्वरूप कुछ चित्र भी जारी किये गए जिनमें स्व. राजीव गाँधी की अस्थियाँ संचय करने के दौरान उन्हें जनेऊ धारण किये दिखाया गया है। एक अन्य चित्र में वे अपनी बहिन प्रियंका के विवाह के मौके पर भी जनेऊ में दिखे। उसके बाद श्री गाँधी को न सिर्फ हिन्दू अपितु ब्राह्मण साबित करने के योजनाबद्ध प्रयास भी होने लगे। पुष्कर में भी श्री गाँधी ने खुद को कश्मीरी ब्राह्मण और गोत्र दत्तात्रेय लिखवाया। फिर शिव भक्त बताते हुए मानसरोवर की यात्रा पर गए। हालांकि लौटते समय उन्होंने चीनी सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की जिसके बारे में कोई खुलासा नहीं हुआ। उसके पहले डोलकाम में चीन के साथ चल रहे टकराव के समय वे नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास भी गए जिसके बारे में न तो उन्होंने कुछ बताया और न ही कांग्रेस पार्टी ने। स्मरणीय है राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से मिलने वाला अनुदान भी काफी चर्चाओं में रहा। बहरहाल, हिंदुओं विशेषतः भाजपा के पक्के समर्थक माने जाने वाले सवर्ण मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राहुल को ब्राहमण साबित करने का अभियान आगे भी जारी रहा जिसके अंतर्गत वे हिन्दू मंदिरों और मठों में मत्था टेकने के साथ ही पूजा - अनुष्ठान भी करते देखे गए। लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली जिसका कारण उनकी जाति और धर्म को लेकर व्याप्त अनिश्चितता है। स्मरणीय है उनके दादा पारसी थे। उस आधार पर उनका धर्म भी वही माना जाता है । इसलिए जब श्री गाँधी ने जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का दावा किया तब जनमानस में उसे मान्यता नहीं मिली जिसका प्रमाण काँग्रेस की पराजय का सिलसिला जारी रहना है। यहाँ तक कि राहुल को 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी से भी हार का सामना करना पड़ा जहाँ के ब्राह्मण नेहरू - गाँधी परिवार के स्थायी समर्थक थे। उसी के बाद श्री गाँधी का ब्राह्मण प्रेम ढलान पर आ गया। और वे जातियों के गुणा - भाग में जुट गए। जातिगत जनगणना के अलावा नौकरियों में जातियों की संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का मुद्दा उन्होंने उठाया किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सीमित सफलता से बढ़ा उनका उत्साह हरियाणा , महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन से ठण्डा पड़ गया। और तभी से उन्होंने सपा - बसपा और वामपंथियों की नकल करते हुए मनुवाद और ब्राह्मणवाद पर हमले शुरू किये जिसका ताजा प्रमाण बीते पिछले दिनों पुणे में आयोजित छात्राओं के एक जलसे में मिला। जहाँ उन्होंने मनु स्मृति के एक हिस्से में लड़कियों के पिता, पति और बेटों के अधीन रहने की व्यवस्था की आलोचना करते हुए उपस्थित छात्राओं को पितृ सत्तात्मक सोच से मुक्त होने की सलाह दी। वे बिना मनु स्मृति को उद्धृत किये भी लड़कियों को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित कर सकते थे किंतु उन्होंने मनु स्मृति को कठघरे में खड़ा किया जिसका उद्देश्य सीधे - सीधे दलित और पिछड़ी जातियों में उच्च जातियों के प्रति विद्वेष का भाव उत्पन्न करना था। लेकिन जिस तरह राहुल का जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का स्वांग जनता को रास नहीं आया उसी तरह मनु स्मृति को गाली देकर दलित और पिछड़े वर्ग को आकर्षित करने का ये दाँव भी बेअसर ही रहेगा। इसकी वजह ये है कि जिस तरह उनके ब्राह्मण होने में बनावटीपन था वही मनुवाद के विरोध में भी है। सही बात तो ये है कि श्री गाँधी आगामी उ.प्र और पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने हाथ - पाँव मार रहे हैं। लेकिन उ.प्र में जहाँ भाजपा विरोधी दलित और पिछड़ा वर्ग के अलावा मुस्लिम भी कांग्रेस के बजाय अखिलेश यादव और मायावती के प्रभाव में हैं वहीं पंजाब में कांग्रेस की आपसी लड़ाई उसकी संभावनाओं पर ग्रहण लगा रही है। बेहतर हो श्री गाँधी हिन्दू समाज में फूट डालकर चुनाव जीतने का ख्वाब छोड़ दें। वैसे भी हर चुनावी हार के बाद उनका मुद्दा बदलता रहता है। इसीलिए लंबे समय से किसी ने उनके मुँह से वोट चोरी नहीं सुनी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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