Tuesday, 1 September 2026

खबर अच्छी किंतु आंकड़े पेट नहीं भरते



प. एशिया में चल रहे संकट से उत्पन्न विषम परिस्थितियों के बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही ( अप्रैल से जून) में भारत की जीडीपी ( सकल घरेलू उत्पाद) दर का 7.8 प्रतिशत का आंकड़ा छूना निश्चित रूप से उत्साहित करने वाला लो nnv   । ईरान और अमेरिका में चल रहे युद्ध के परिणामस्वरूप कच्चे तेल , गैस और उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक स्तर पर आर्थिक उथलपुथल मची है। भारत में भी पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी हुई वहीं उर्वरक की कमी से किसान परेशान है। इनके अलावा अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाये जाने से हमारे निर्यात पर विपरीत असर तो पड़ा ही कच्चे तेल के महंगे होने से रुपये की विनिमय दर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले चिंताजनक स्थिति तक नीचे आती चली गई। इसके कारण फैली घबराहट में विदेशी निवेशकों द्वारा भारत में लगाई गई पूंजी तेजी से वापस निकाली जिसका असर शेयर बाजार में आई अस्थिरता के अलावा विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी के रूप में सामने आने लगा।  लेकिन इस सबके बाद भी पहली तिमाही में जीडीपी का भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से अधिक रहना इस बात को प्रमाणित करता है कि हमारा आर्थिक प्रबंधन सही रहा और वैश्विक स्तर पर व्याप्त  घबराहट से प्रभावित हुए बिना सरकार ने वित्तीय अनुशासन बनाये रखा । इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में दुनिया भर का विश्वास न सिर्फ कायम रहा अपितु उसमें वृद्धि भी परिलक्षित हुई। अधिकृत जानकारी के अनुसार पहली तिमाही में जीडीपी  ₹81.36 लाख करोड़ रही, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में ₹75.46 लाख करोड़ थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर पर कहा  कि वैश्विक अनिश्चितताओं और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद यह एक असाधारण उपलब्धि है। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने इस आंकड़े को भ्रामक बताया और सवाल उठाया कि यह उच्च वृद्धि रोजगार और आम नागरिकों की समृद्धि में क्यों नहीं बदल रही है? ये दोनों ही  प्रतिक्रियाएं अपनी - अपनी जगह ठीक हैं । चौतरफा हमलों के बीच सरकार के लिए ये राहत की खबर है जबकि विपक्ष द्वारा उठाया गया सवाल भी वाजिब है क्योंकि जीडीपी में वृद्धि की दर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा होने का लाभ यदि देश के आम नागरिक को न मिल सके तब आंकड़े कितने भी आकर्षक क्यों न हों लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट नहीं ला सकते। उस दृष्टि से देखें तो इस समय जो तिमाही चल रही है इसके आंकड़े आने के बाद ही देश की आर्थिक मजबूती का जमीनी आकलन हो सकेगा क्योंकि  मानसून की कमजोर शुरुआत  और  फिर बाढ़ आदि के चलते खरीफ फसल को जो नुकसान पहुँचा उसने चिंता उत्पन्न कर दी है। बरसात में सब्जियां महंगी होना तो आम बात है किंतु बीते कुछ दिनों में शक्कर के दाम जिस तरह उछले उसने सरकार के प्रबंधन पर सवालिया निशान लगा दिये। इसी तरह 20 फीसदी एथनॉल मिलाये जाने के बाद भी पेट्रोल के दाम नहीं घटाए जाने पर सरकार की आलोचना हो रही है। ये आरोप भी लग रहे हैं कि एथनॉल बनाने में गन्ने के उपयोग से एक तरफ जहाँ शक्कर उत्पादन घट गया वहीं कुछ और खाद्यान्न भी उपभोक्ताओं से दूर हो गए। हालांकि कल समाप्त हुए अगस्त माह में 2 लाख करोड़ रु.जीएसटी वसूली का आंकड़ा  सरकार का हौसला बढ़ाने वाला है जो गत वर्ष इसी माह की तुलना में 14 फीसदी अधिक है किंतु देखने वाली बात ये है कि डॉलर महंगा होने से आयात की लागत बढ़ी जिसका असर जीएसटी संग्रह में वृद्धि पर  स्वाभाविक तौर पर पड़ा  ।  हालांकि आयात बढ़ना अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। बावजूद इसके जीडीपी यदि 8 प्रतिशत को छू रही है तब उसे इस आधार पर संतोषजनक माना जा सकता है क्योंकि वैश्विक हालात पूरी तरह अनिश्चित और विपरीत हैं। यद्यपि आम जनता के लिए ये आंकड़ा तब तक कोई मायने नहीं रखता जब तक उसे सीधी राहत न मिले। उदाहरण के लिए एथनॉल मिलाने के बाद भी यदि पेट्रोल तो सस्ता हो नहीं उल्टे शक्कर सहित खाने - पीने की अन्य चीजें महंगी हो जाएं तब उसकी नाराजगी औचित्यपूर्ण ही कही जाएगी। भले ही विपरीत परिस्थितियों में भी भारत के हालात चिंताजनक नहीं हैं किंतु जनता को इसका भरोसा तभी होगा जब उसे सीधी राहत मिले क्योंकि आंकड़े पेट नहीं भरते। 

- रवीन्द्र वाजपेयी



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