लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने का प्रस्ताव संसद द्वारा 2023 में ही पारित किया जा चुका है। लेकिन इसे लागू करते हुए एक तिहाई सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए संसद का दो दिवसीय अधिवेशन आमंत्रित किया गया है । इसमें परिसीमन सम्बन्धी विधेयक पारित किया जाना है जिसके बाद लोकसभा में 850 सीटें हो जाएंगी। परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना को बनाया जाएगा। दक्षिण के राज्यों को चिंता है कि उ.प्र और बिहार की जनसंख्या ज़्यादा होने से महिला आरक्षण में सबसे ज्यादा लाभ उन्हें मिल जाएगा। हालांकि सरकार की ओर से ये आश्वासन दिया जा रहा है कि किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा । विपक्षी दलों की ओर से जो संकेत आ रहे हैं उन्हें देखते हुए इस अधिवेशन में सरकार द्वारा लाए जाने वाले प्रस्ताव का पारित होना आसान नहीं है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास दोनों सदनों में संविधान संशोधन लायक दो तिहाई बहुमत का अभाव है। हालांकि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने के लिए सीटों की संख्या में वृद्धि के लिए सैद्धांतिक रूप से सभी दल सहमत हैं किंतु असली विवाद श्रेय लूटने का है। कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने संसद के अधिवेशन की तारीखों को लेकर जो सवाल उठाया उसका कारण भी राजनीतिक ही है। दरअसल विपक्ष को शक है कि प. बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के मतदान के हफ्ते भर पहले महिलाओं की एक तिहाई सीटें बढ़ाने जैसे बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित करवाने का पूरा श्रेय लूटकर भाजपा उक्त दोनों राज्यों में महिला मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इसका उपयोग करेगी । लेकिन सरकार का कहना है कि यदि 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ाना है तब इस बारे में संसद को जल्द फैसला करना चाहिए। अन्यथा फिर बात 2034 तक टल जाएगी। उस दृष्टि से सरकार की तत्परता औचित्यपूर्ण है। रही बात उसके राजनीतिक लाभ की तो यदि इस तरह के प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होते हैं तब कोई एक दल उसका श्रेय नहीं लूट पाता। इसीलिए प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की है कि वे इस प्रस्ताव को समर्थन देकर महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने को संवैधानिक रूप देने में सहायक बनें। ये प्रस्ताव संसद में पारित हो पाता है या नहीं ये तो दो दिन बाद ही पता चलेगा किंतु नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर जिस प्रकार केंद्र सरकार प्रचार कर रही है उसे देखते हुए विपक्ष का भयभीत होना स्वाभाविक है। राजनीति के जानकार इस बात से भली - भांति अवगत हैं कि प्रधानमंत्री किसी भी फैसले के पहले गहन मंथन करते हुए उसके दूरगामी फायदे और नुकसान का आकलन करते हैं। 2029 से लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की सीटें बढ़ाने का निर्णय भी उन्होंने काफी सोच - समझकर लिया होगा। यदि विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध करते हैं तब भाजपा इसे मुद्दा बनाकर उनको महिला विरोधी साबित करने में जुट जाएगी। विपक्ष भी इस दांव को समझ रहा है। लेकिन इस सबसे हटकर जो बात जनसामान्य के मन में उठ रही है वह है सांसद - विधायक बनने वाली महिलाओं का शैक्षणिक स्तर और उससे भी बढ़कर सार्वजनिक जीवन में कार्य करने का अनुभव। ये इसलिए जरूरी है क्योंकि देश भर में पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए किए गए आरक्षण के परिणामस्वरुप उनका प्रतिनिधित्व तो बेशक बढ़ा किंतु गुणवत्ता नहीं होने से महिला सशक्तीकरण का जो उद्देश्य इसके पीछे था वह पूरा नहीं हो सका। इसलिए संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित करने के साथ ही राजनीतिक दलों को ये देखना होगा कि जिन महिलाओं को वे चुनाव मैदान में उतारें उनमें बतौर जनप्रतिनिधि अपने दायित्व के प्रति जागरूकता हो । साथ ही निर्णय लेने के लिए पुरुषों पर पूर्णतः निर्भरता से भी वे मुक्त हों। हालांकि आरक्षित सीटों से ऐसे अनेक पुरुष सांसद और विधायक भी चुनकर आते हैं जिन्हें मिट्टी के माधो कहा जा सकता है। लेकिन आजादी के आठ दशक बाद महिलाओं को जब देश चलाने में हिस्सेदारी मिल रही है तब इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि शुरुआत में ही ऐसे मापदण्ड बना दिए जाएं जिससे इस ऐतिहासिक फैसले के औचित्य पर सवाल न उठ सकें। आज जब महिलाएं सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता को सफलता पूर्वक प्रमाणित कर रही हैं तब संसद और विधानसभाओं में भी उनकी एक तिहाई भागीदारी समय की मांग और देशहित में है। ऐसे में इस विधेयक के पारित होने के बाद राजनीतिक दलों को इस दिशा में भी सोचना चाहिए कि सदन में आने वाली नारी अबला नहीं अपितु सबला हो।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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