कलाकार किसी समाज के सांस्कृतिक स्तर के प्रतीक होते हैं। हमारे देश में कला की सभी विधाओं को समुचित सम्मान मिलता रहा और कलाकार भी लोकप्रियता हासिल करते आए हैं। लेकिन उनमें से कुछ विरले होते हैं जिन्हें कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की विशेष कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐसी ही एक विलक्षण कला साधिका सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोसले का गत दिवस 92 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। उनकी प्रारंभिक पहचान भारत कोकिला स्व. लता मंगेशकर की छोटी बहिन के तौर पर बनी किंतु जल्द ही उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर दीदी से अलग अपनी छवि बना ली। कहा जाता है दोनों के बीच अघोषित प्रतिस्पर्धा थी किंतु लता जी की दिव्यता के बावजूद आशा जी ने अपनी विशिष्ट शैली से अपने लिए अलग जगह बनाई। जिस युग में फिल्म उद्योग के सभी दिग्गज संगीतकार और निर्माता लता मंगेशकर को अपरिहार्य मान बैठे थे और प्रसिद्ध अभिनेत्रियां लता जी की आवाज के लिए ही आग्रह करती थीं तब ओ. पी. नैयर जैसे संगीतकार ने केवल आशा भोसले की आवाज का इस्तेमाल करने का दुस्साहस किया। नैयर साहब ने लता जी से मतभेद को लेकर स्पष्ट किया था कि उनकी धुनों पर उनकी आवाज फिट नहीं बैठती। लता मंगेशकर के दबदबे वाले उस दौर में किसी संगीतकार का वह बयान मामूली बात नहीं थी। लेकिन नैयर और आशा की जोड़ी ने दर्जनों ऐसे गीत दिए जो दशकों बाद भी संगीत प्रेमियों को गुदगुदाते हैं। उनके अलावा सचिनदेव बर्मन और जयदेव जैसे प्रयोग धर्मी संगीत निर्देशकों ने भी आशा जी की आवाज में अनेक ऐसे गीतों का सृजन किया जो उनकी गायकी के उच्च स्तर का जीवंत प्रमाण बन गए। पेशेवर जिंदगी में दोनों बहिनों को स्थापित होने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। अनेक संगीतकारों ने लता जी की आवाज को बारीक बताकर उपेक्षित किया । वहीं स्व. दिलीप कुमार ने उनकी गायकी में मराठी लहजा होने की टिप्पणी की। इसी तरह आशा भोसले को रेकॉर्डिंग शुरू होने के बाद बीच में रोककर कह दिया गया कि वे पार्श्व गायन के लायक नहीं हैं। लेकिन कालान्तर में दोनों ने आलोचकों को राय बदलने मजबूर करते हुए इतिहास रच दिया। लता जी ने तो घर नहीं बसाया किंतु आशा जी ने विवाह किया जो कि कड़वा अनुभव रहा। अपने तीन बच्चों के साथ पति से अलग होकर उन्होंने अपने परिवार और पेशे दोनों को संभाला और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चढ़ती उम्र में उन्होंने राहुल देव बर्मन से भी विवाह रचाया किंतु उनकी भी जल्दी ही मृत्यु हो गई। बावजूद उसके उन्होंने आशा नहीं छोड़ी और नए - नए कीर्तिमान रच डाले। 12 हजार गीत गाने वाली आशा भोसले को पद्म भूषण के अलावा अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए किंतु लगभग सात दशकों तक संगीत प्रेमी श्रोताओं से उन्हें जो लोकप्रियता मिलती रही वह सबसे बड़ा सम्मान है। किसी कलाकार के लिए जीते जी किंवदंती बन जाना असाधारणता का प्रमाण होता है। संयोग से लता और आशा नामक स्व. दीनानाथ मंगेशकर की दोनों बेटियों ने अपने जीवनकाल में ही भूतो न भविष्यति की उक्ति को सही साबित कर दिया। लता जी के बारे में तो ये बात हर कोई मान चुका था कि उन जैसा दूसरा पैदा नहीं होगा किंतु अब जबकि आशा भोसले स्मृतियों का हिस्सा बन चुकी हैं, ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लता और आशा अपने आप में एक युग थीं जिसकी पुनरावृत्ति असंभव है। अपनी चुलबुली और खनकती आवाज के लिए विशिष्ट शैली के गीतों में एकाधिकार रखने वाली आशा जी के लिए उनकी दीदी ने भी माना था कि वैसे गीत गाना आशा के लिए ही संभव था। लेकिन उमराव जान फिल्म में संगीतकार खैयाम के निर्देशन में विशुद्ध शास्त्रीय संगीत में ढली ग़ज़लें गाकर आशा जी ने दिखा दिया कि उनकी कला को किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता । उसी के बाद ये कहा जाने लगा कि संगीतकारों ने लता जी के आकर्षण के चलते आशा जी का सही मूल्यांकन नहीं किया । नैयर साहब ने उनकी आवाज की खनक को गीतों में ढाला वहीं सचिन दा, जयदेव,राहुल देव और खैयाम ने आशा जी की छिपी प्रतिभा का लोकार्पण किया जो अन्यथा अछूती रह जाती। लता जी के अवसान के उपरांत आशा जी की उपस्थिति मंगेशकर युग का एहसास कराती थी किंतु अब वह भी नहीं रहा। लता जी की आवाज में जहां सागर जैसी अनंत गहराई थी वहीं आशा जी उसकी लहरों की चंचलता का प्रतीक थीं।
उनका भौतिक शरीर भले ही भस्मीभूत हो गया किंतु जब तक गीत - संगीत रहेंगे तब तक आशा जी की दिव्य आवाज जीवंत रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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