Thursday, 16 April 2026

मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग देश के दूसरे विभाजन का षड़यंत्र


लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित किए जाने के लिए सदन  की मौजूदा सदस्य संख्या बढ़ाने एवं उसके लिए परिसीमन करने के उद्देश्य से आज लोकसभा में सरकार की ओर से तीन संशोधन विधेयक प्रस्तुत कर दिए गए। जैसा कि अपेक्षित था विपक्ष ने इसका जोरदार विरोध शुरू कर दिया जिसका उद्देश्य भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ लेने से रोकने के साथ ही आरक्षण के भीतर आरक्षण रूपी पुराना पेच फंसाकर पूरी प्रक्रिया को बाधित करना  है। बरसों  पहले महिलाओं को आरक्षण के प्रस्ताव  का संसद में स्व. शरद यादव , स्व. मुलायम सिंह यादव के अलावा भाजपा नेत्री उमाश्री भारती ने भी ये कहते हुए विरोध किया था कि इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोटा रखा जाए। । आज बहस के दौरान ये संकेत मिल जाएगा कि विपक्ष का अंतिम फैसला क्या होगा क्योंकि प. बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना शेष है। इसीलिए सभी राजनीतिक दल  अपना दृष्टिकोण सोच - समझकर ही तय करेंगे। ये तो स्पष्ट है कि यदि ये विधेयक संसद में पारित हो गए तो प. बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में भाजपा महिला मतदाताओं के बीच खुद को उनका हितचिंतक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। और कहीं विपक्ष इन विधेयकों पर फैसला टलवाने में कामयाब हो गया तब भाजपा का प्रचारतंत्र उसे महिला विरोधी ठहराकर कठघरे में खड़ा करने में जुट जाएगा। लेकिन इससे अलग हटकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाते हुए पूछा कि आखिर मुस्लिम महिलाएं कहां जाएंगी? इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने तंज कसा कि आप अपनी पार्टी की सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को ही दे देना। बहस में अन्य दलों के विचार भी सुनने मिलेंगे। लेकिन अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग उठाकर जो दांव चला उससे वे अगले वर्ष होने वाले उ.प्र विधानसभा के चुनाव में  मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में भले सफल हो जाएं किंतु उनकी यह मांग देश हित के सर्वथा विरुद्ध है। मुसलमानों को सेना में आरक्षण देने का मुद्दा उनके स्वर्गीय पिता मुलायम सिंह ने भी छेड़ा था। उनकी मुस्लिम परस्ती के कारण ही उन्हें मुल्ला मुलायम सिंह कहा जाने लगा था। हालांकि उस मांग को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका किंतु आज उनके पुत्र अखिलेश ने  मुस्लिम महिलाओं  के लिए अलग से आरक्षण जैसी मांग छेड़कर मुस्लिम तुष्टीकरण वाली  पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर दिया। हालांकि अखिलेश सहित पूरी समाजवादी पार्टी उ.प्र में मुस्लिम समुदाय का चरण चुंबन करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करती किंतु इस मांग से उस दौर की याद ताजा हो उठी जब मुस्लिमों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाकर अंग्रेजी सत्ता ने भारत के दो टुकड़े करने की शुरुआत कर दी थी। मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण यदि कर दिया जाए तो  कल को मुस्लिम पुरुषों के लिए भी अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग जोर पकड़ेगी जो देश की अखंडता के लिए बड़ा खतरा होगी। अखिलेश यादव विदेश में पढ़कर आए हैं। ऐसे में उनसे ये अपेक्षा करना गलत नहीं होता कि वे  आधुनिक सोच का परिचय दें। लेकिन ऐसा लगता है वोट बैंक की वासना में  समाज को जातियों में बांटने के बाद वे और उनकी पार्टी अब देश का नया बंटवारा करने की जमीन तैयार कर रहे हैं। महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें बढ़ाए जाने का उद्देश्य आधी आबादी को राष्ट्रनिर्माण में भागीदार बनाना है। लेकिन इसमें धर्म के नाम पर आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाकर अखिलेश ने एक बार दिखा दिया कि उन्हें देश की एकता और अखंडता की कोई चिंता नहीं है। महिला आरक्षण के लिए आज प्रस्तुत विधेयक पारित हों या न हों किंतु संसद में अखिलेश ने मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की जो बात छेड़ी उसके लिए उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि ये मांग उस शपथ का उल्लंघन करती है जिसमें उन्होंने बतौर सांसद देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि  इस देश विरोधी मांग पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस चुप रही। गृह मंत्री श्री शाह ने तो अखिलेश की मांग को असंवैधानिक बताकर सही किया परन्तु अब इस बात का इंतजार रहेगा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बहस में भाग लेते हुए अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण संबंधी मांग का विरोध करते हैं या नहीं? 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

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