जीत - हार का फैसला तो 4 मई की दोपहर तक ही हो सकेगा किंतु प. बंगाल की 152 और तमिलनाडु की सभी विधानसभा सीटों के लिए दोपहर 12 बजे तक मतदान का प्रतिशत लगभग 50 फीसदी तक पहुंचना लोकतन्त्र और चुनाव आयोग के प्रति जनता के विश्वास का प्रमाण है। इसके पहले असम और केरलम में हुए मतदान ने भी पिछले कीर्तिमान ध्वस्त कर उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था जो चुनाव आयोग पर आरोपों की बौछार करते आ रहे थे। विशेष रूप से प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण के काम में जैसे अड़ंगे लगाए उसके बाद कई बार ऐसा लगा कि वहां राष्ट्रपति शासन न लगाना पड़ जाए किंतु अंततः मतदाता सूचियों से 91 लाख नाम कट जाने के बाद भी स्थिति नियंत्रण में रही। ममता बैनर्जी ने अपना पूरा प्रचार मतदाता सूचियों में किए गए सुधारों पर ही लगा दिया। उनका आरोप यह था कि केंद्र सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग तृणमूल समर्थक मतदाताओं का नाम हटा रहा है। और बांग्लादेशी घुसपैठियों की आड़ में मुस्लिम समुदाय को विशेष निशाना बनाया गया। हालांकि जनता के बीच ये मुद्दा ज्यादा नहीं गर्माया क्योंकि चुनाव आयोग ने सभी मतदाताओं को नाम जुड़वाने का समुचित अवसर दिया और वह भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों की उपस्थिति में। प. बंगाल का चुनावी इतिहास आतंक और हिंसा से भरा रहा है । इस चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती से मतदाताओं के मन में व्याप्त डर को काफी हद तक दूर करने में सहायता मिली है। दोपहर तक कुछ घटनाओं को छोड़कर जिस प्रकार मतदाताओं में उत्साह दिखा उसके अनुसार शाम तक मतदान का आंकड़ा 80- 90 को छू जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। इसका अर्थ ये भी लगाया जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मुस्लिम गोलबंदी की प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दू मतदाता भी ध्रुवीकृत हुआ है। तमाम सियासी विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि 30 फीसदी मुस्लिम बैंक की एकजुटता के जवाब में यदि 70 प्रतिशत हिन्दू मतदाताओं ने एकता दिखा दी तब सुश्री बैनर्जी का किला धसक सकता है। स्मरणीय है 2021 में तृणमूल का चुनाव प्रबंधन देख रहे प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि भाजपा 100 सीटों से ज्यादा नहीं जीतेगी। उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई और भाजपा 77 पर अटक गई। हालांकि तृणमूल के प्रवक्ता इस बार भी इसी तरह के दावे कर रहे हैं किंतु चुनावी पंडित खुलकर स्वीकार कर रहे हैं कि भाजपा ने बहुत जबर्दस्त मोर्चेबंदी की है जिसके अंतर्गत यदि वह अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में सफल हो गई तब प. बंगाल में बदलाव की संभावना बढ़ जाएगी। दूसरे जिस राज्य में आज मतदान हो रहा है वह है तमिलनाडु जहां एक ही चरण में चुनाव हो जाएगा। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण यहां भी हुआ लेकिन स्टालिन सरकार ने उसे मुद्दा बनाने के बजाय अपने परम्परागत प्रतिद्वंद्वी अन्ना द्रमुक के साथ भाजपा के गठबंधन के मद्देनजर केंद्र सरकार , उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध पर अपने प्रचार को केंद्रित रखा । वहीं विपक्षी गठबंधन ने भ्रष्टाचार ओर विकास में कमी के लिए स्टालिन सरकार को घेरा। भाजपा इस राज्य में अभी भी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए प्रयासरत है। शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि अन्ना द्रमुक और भाजपा का गठबंधन सत्तारूढ़ द्रमुक और कांग्रेस के गठजोड़ पर भारी पड़ेगा। जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए उनमें भी मिलते - जुलते संकेत दिए गए परंतु संसद में लाए गए परिसीमन विधेयकों के बाद स्टालिन ने राज्य की लोकसभा सीटें घटने की आशंका को तूल देकर तमिल भावना को उभारने का जो दांव चला उसके कारण राज्य में बदलाव की संभावना संदिग्ध हो चली है। हालांकि तमिलनाडु में भी प. बंगाल जैसा भारी मतदान होने से नतीजों को लेकर कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि चुनाव किसी के भी पक्ष में इकतरफा नहीं रहेगा। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि राज्य में दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी दलों का संगठन जमीनी स्तर पर है। उनकी विचारधारा भी मूलतः एक जैसी ही है। इसलिए मुकाबला चेहरों पर होता है। कुछ लोगों का मानना है कि इस लिहाज से स्टालिन भारी हैं। लेकिन लोकप्रिय तमिल अभिनेता जे. विजय की नवगठित पार्टी के कूदने से चुनाव में अनिश्चितता बढ़ गई है क्योंकि अभी तक ये आकलन कोई नहीं कर पाया कि विजय के उम्मीदवारों को मिलने वाले मत किस गठबंधन को नुकसान पहुंचाएंगे? बहरहाल भारी मतदान झटका है उन लोगों के लिए जो चुनाव प्रक्रिया को बेवजह कठघरे में खड़ा करते रहते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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