Saturday, 18 April 2026

परिसीमन विधेयक गिरने के बाद भी महिला आरक्षण राष्ट्रीय एजेंडा बना


1999 में कर्नाटक की वेल्लारी लोकसभा सीट पर कांग्रेस  नेत्री सोनिया गांधी और भाजपा उम्मीदवार स्व. सुषमा स्वराज के बीच हुआ मुकाबला देश के चुनावी इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। हालांकि कड़ी टक्कर  के बावजूद सुषमा जी 50 हजार मतों से परास्त हो गईं थीं। लेकिन हारने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा था कि कुछ हार , जीत से भी ज्यादा गौरवशाली होती हैं।  दरअसल वे जानती थीं कि कर्नाटक में जो उस समय तक कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, श्रीमती गांधी को पराजित करना असंभव था। लेकिन पार्टी की सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत उन्होंने वह चुनौती  न सिर्फ स्वीकार की अपितु कुछ ही दिनों में कन्नड़ में भाषण देना सीखकर मतदाताओं पर गहरी छाप भी छोड़ी। गत दिवस लोकसभा में महिला आरक्षण लागू करने के लिए सरकार द्वारा प्रस्तुत परिसीमन  संबंधी संविधान संशोधन विधेयक दो तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की अपील और आश्वासन विपक्ष को प्रभावित नहीं कर सके। विधेयक के पारित नहीं होने को विपक्ष अपनी बड़ी जीत मानकर उत्साहित भी है और आनंदित भी। कहा जा रहा है कि विपक्ष में सेंध लगाने में भाजपा विफल रही। लेकिन किसी भी कोण से ये लगा ही नहीं कि सरकार की तरफ से विपक्ष में तोड़फोड़ का प्रयास हुआ हो। सत्र के पहले दिन ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित लगभग सभी विपक्षी दलों ने  विधेयकों का विरोध करने की घोषणा कर दी थी। ऐसे  में आवश्यक संख्याबल नहीं होने पर सत्ता पक्ष में जो चिंता  दिखाई देनी थी  उसका कोई लक्षण नजर नहीं आया। उल्टे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और सरकार की ओर से मोर्चा संभालने वाले सभी वक्ता पूरे आत्मविश्वास में दिखे । सही बात ये है कि सरकार विधेयकों का हश्र जानती थी , फिर भी विशेष सत्र बुलाकर उसने महिला आरक्षण को देश का मुख्य राजनीतिक एजेंडा बनाने का जो दांव चला वह कारगर साबित हुआ। विपक्ष से बार - बार ये आवाजें आती रहीं कि वह महिला आरक्षण के नहीं बल्कि परिसीमन के विरोध में है। इसीलिए जब संशोधन विधेयक गिर गया तब भाजपा ने बिना देर किए विपक्ष को महिला विरोधी बताते हुए कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ दिया। यद्यपि विपक्ष ने 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए बढ़ाई जा रही सीटों के प्रस्ताव को तो रुकवा दिया किंतु आम महिला मतदाता को परिसीमन जैसा तकनीकी शब्द समझ नहीं आएगा। उसके दिमाग में यदि ये बात बैठ गई कि मोदी सरकार महिलाओं के लिए लोकसभा में सीटें बढ़ाना चाहती थी किंतु विपक्ष ने अड़ंगा लगा दिया तो भाजपा इसका लाभ उठा सकती है। मसलन प. बंगाल और तमिलनाडु में सुशिक्षित महिलाओं को भाजपा अपनी बात समझाने में सफल हो गई और 5 फीसदी मत उसने अतिरिक्त खींच लिए तो  बड़ा उलटफेर हो सकता है। विपक्ष का ये कहना शत - प्रतिशत सही है कि सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र उक्त दोनों राज्यों में मतदान के कुछ दिन पहले बुलाने का कारण विशुद्ध राजनीतिक था। लेकिन सभी राजनीतिक दल अवसर का लाभ उठाने के लिए ऐसी कोशिश करते रहे हैं। अब ये तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि सरकार अपनी रणनीति में सफल रही या विपक्ष की मोर्चेबंदी कामयाब क्योंकि  कुछ दिनों के भीतर किसी भी दल के लिए भी मतदाताओं को परिसीमन के समर्थन या विरोध में गोलबंद करना आसान नहीं है। इसीलिए कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का ये सोचना सही है कि दरअसल भाजपा ने उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के आगामी चुनाव के  मद्देनजर महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर खुद। को महिला हितैषी साबित करने का प्रयास किया। विपक्ष की दिक्कत ये है कि संसद में प्रदर्शित एकता के बावजूद मैदानी स्तर पर वह विभाजित है। केरल में कांग्रेस और वामपंथियों के बीच सांप और नेवले जैसी दुश्मनी है। इसी तरह प. बंगाल में ममता बैनर्जी के विरुद्ध कांग्रेस , वामपंथी और ओवैसी सभी ताल ठोक रहे हैं। ये देखते हुए पांच राज्यों के चुनावों के बाद भाजपा बड़े पैमाने पर महिला आरक्षण का मुद्दा उठाएगी और तब विपक्ष के लिए उ.प्र, गुजरात और पंजाब के मतदाताओं को ये समझाना मुश्किल होगा कि उनमें लोकसभा की सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को  क्यों रोका गया। अखिलेश यादव ने तो मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाकर अपने ही गोल में गेंद डाल दी। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने उन्हें अपना मित्र बता दिया जिसका खंडन करने के बजाय श्री यादव मुस्कुराते रहे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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