Monday, 20 April 2026

अंततः ईरान को समर्पण करना ही पड़ेगा


मध्यपूर्व का मसला उलझता ही जा रहा है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि ईरान के जबरदस्त प्रतिरोध के कारण अमेरिका बुरी तरह फंस गया है और किसी तरह इज्जत बचाकर निकलने का रास्ता तलाश रहा है । इसीलिए जब 15 दिन का युद्धविराम हुआ तब यही प्रचारित हुआ कि अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब रहने के कारण ही लड़ाई रोकने बाध्य हुए। अयातुल्ला ख़ामेनेई सहित अनेक बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों की हत्या के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन और शाह पहलवी वंश के उत्तराधिकारी को तेहरान बुलवाकर उसकी ताजपोशी की जो योजना डोनाल्ड ट्रम्प ने बनाई थी उसके मूर्तरूप लेने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। जिन नेताओं के हाथ फिलहाल ईरान की कमान है वे भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार कर रहे हैं। इसी कारण से इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की शांति वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। और कल होने वाला दूसरा दौर भी खटाई में पड़ता दिख रहा है क्योंकि ईरान ने अपने प्रतिनिधिमंडल को नहीं भेजने का ऐलान कर दिया है। युद्धविराम के शुरू होते ही इजराइल द्वारा लेबनान पर किए गए ताबड़तोड़ हमलों से भी ईरान नाराज हो उठा। लेकिन सबसे बड़ा पेच है होर्मुज जलडमरूमध्य जो न सिर्फ ईरान बल्कि तेल उत्पादक खाड़ी देशों की जीवन रेखा बन गया है। दुनिया में 20 प्रतिशत  कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति चूंकि ईरान के कब्जे वाले इसी समुद्री रास्ते से होती है इसीलिए उसने इसे भी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अभूतपूर्व वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न कर दिया। इसके अलावा वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टोल टैक्स के तौर पर भारी - भरकम राशि चुकाने की बंदिश लगा दी। हालांकि भारत, ईराक , चीन, पाकिस्तान और रूस के जहाजों को होर्मुज से बेरोकटोक आने - जाने की छूट  दी गई किंतु ज्यों ही अमेरिका को लगा कि ईरान इस जलडमरूमध्य में आवागमन पर नियंत्रण लगाकर अपने आर्थिक और सामरिक उद्देश्य पूरे कर रहा है त्यों ही उसने भी जवाबी नाकेबंदी करते हुए उन जहाजों को रोकना शुरू  कर दिया जो ईरान को टोल चुकाकर होर्मुज़ से बाहर निकले।  ईरान का रवैया भी होर्मुज़ को लेकर बेहद अनिश्चित या यूं कहें कि गैर जिम्मेदाराना है। युद्धविराम के बाद से वह अनेक बार इस रास्ते को खोलने के बाद बंद कर चुका है। कई बार तो एक दिन में ही सुबह उसने होर्मुज खोला और शाम को पुनः बंद कर दिया। इस ऊहापोह से उसकी विश्वसनीयता पर तो आंच आई ही साथ ही ये भी साफ हो गया कि  अमेरिका को शिकस्त देने के उसके दावे हवा - हवाई ही हैं। ट्रम्प  द्वारा लगातार ये दबाव बनाया जा रहा है कि ईरान होर्मुज को अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र मानकर मुक्त आवागमन के लिए उपलब्ध करवाए। साथ ही परमाणु बम बनाने के लिए जो परिष्कृत ईंधन है उसे भी अमेरिका को सौंपने के अलावा अपनी सैन्य शक्ति विशेष रूप से मिसाइलों के उत्पादन में कमी लाए। इसके अलावा भी अनेक ऐसी शर्तें हैं जो ईरान के नेतृत्व को नागवार गुजर रही हैं। इससे नाराज ट्रम्प  ईरान के तमाम बिजली घर और पुलों को नष्ट करने की धमकी दे रहे हैं। कल होने वाली शांति वार्ता यदि हुई भी तो उसके सफल होने की आशा करना व्यर्थ है। अब तक की स्थिति में अमेरिका और इजराइल भले ही लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाने में असफल रहे हों किंतु रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के प्रत्यक्ष समर्थन के बाद भी ईरान अपनी बर्बादी को नहीं रोक सका। जल्द ही कोई रास्ता नहीं निकला तब उसके शीर्ष नेतृत्व में मतभेद  उभरना तय है। सबसे बड़ी चिंता खामेनेई द्वारा  बनाए गए आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) द्वारा समानांतर सत्ता चलाने की है। गत दिवस होर्मुज से गुजर रहे भारत के जहाजों पर हुई गोलीबारी इसका प्रमाण है। खबर है आईआरजीसी होर्मुज को अपनी मिल्कियत बनाकर आय का स्रोत बनाना चाह रहा है। ईरान सरकार के कुछ नेता भी इस योजना के पीछे हैं। कुल मिलाकर ईरान अब नेतृत्व शून्यता की स्थिति में आ गया है। अमेरिका भी इसी का इंतजार कर रहा है। बड़ी बात नहीं युद्धविराम की अवधि पूरी होते ही ये इलाका एक बार फिर से जंग की आग में जल उठे। लेकिन इस बार अमेरिका भारी पड़ेगा क्योंकि उसने पहले चरण की गलतियों से सीख लेने के बाद ईरान की पुख्ता घेराबंदी करते हुए उसकी कमजोरियों को भांप लिया है। बावजूद इसके तेहरान में बैठे नेता आसानी से समर्पण नहीं करेंगे किंतु देर - सवेर उन्हें ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि उनके पास लंबी लड़ाई लड़ने की शक्ति बची नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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