गत दिवस प. बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु में सभी सीटों पर मतदान संपन्न हो गया। दोनों राज्यों में भारी मतदान से चुनाव विश्लेषक हैरानी में हैं। वैसे उक्त दोनों ही राज्य राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक माने जाते हैं। दोनों में एक साम्यता ये भी है कि तमिलनाडु में जहां कांग्रेस 1967 में सत्ता से बाहर होने के बाद वापिस नहीं आई वहीं प. बंगाल में 1977 में वामपंथियों ने कांग्रेस से राज्य की सत्ता छीनी। उनके बाद 2011 से वहां ममता बैनर्जी मुख्यमंत्री हैं। इस प्रकार तमिलनाडु में 60 और प. बंगाल में 50 वर्षों से कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। तमिलनाडु में तो वह कभी द्रमुक तो कभी अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन करने से सत्ता के साथ जुड़े रहने में सफल रही । वहीं प. बंगाल में वह वामपंथियों के शासन में तो मुख्य विपक्षी दल रही लेकिन ममता बैनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस स्थापित करने के बाद कांग्रेस की दशा दिन ब दिन दयनीय होती गई। 2021 में तो उसे विधानसभा में एक भी सीट नहीं मिली। यही हाल एक जमाने में सबसे बड़ी ताकत रही वामपंथी पार्टियों की भी हो गई। इस खालीपन को आश्चर्यजनक तौर पर भरा भाजपा ने जो 2016 में 3 सीटें जीतने के बाद 2021 में सीधे 77 पर पहुंचकर प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई। इसलिए इस चुनाव में उसे ही सुश्री बैनर्जी के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। ये आश्चर्य का विषय है कि इतने दशकों के बाद भी कांग्रेस ने न तो तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक की चौधराहट खत्म करने की हिम्मत दिखाई और न ही प. बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी प्रकार का उत्साह दिखाया। उस दृष्टि से भाजपा इन राज्यों में शून्य से अपना सफर शुरू कर मुख्यधारा में आने में सफल होती दिखाई दे रही है। तमिलनाडु में वह अकेले लड़ने का दुस्साहस करने के बाद इस बार अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन में भागीदार है। हालांकि उसकी रुचि अपना मत प्रतिशत बढ़ाने में ज्यादा है किंतु जिस तरह केरल में उसने उत्तर भारतीय पार्टी की छवि से हटकर अपनी पहिचान बना ली ठीक वैसे ही तमिलनाडु में भी अपनी जड़ें मजबूत करने की दीर्घकालीन योजना पर तेजी से काम कर रही है जबकि कांग्रेस यहां अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के प्रति पूरी तरह उदासीन है। वर्तमान में वह उस द्रमुक की सहयोगी है जिसके दामन पर पर कभी राजीव गांधी की हत्या के छींटे पड़े थे। मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे ने तो सनातन धर्म की तुलना डेंगू और कोरोना से करते हुए उसी नष्ट करने जैसी डींग हांक दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी सनातन धर्म विरोधी उस बयान का समर्थन कर दिया। यही हाल प. बंगाल में भी है। स्मरणीय है ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को वामपंथियों की बी टीम बताते हुए तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। उनका आरोप सही साबित हुआ जब पिछले चुनावों में कांग्रेस ने ममता सरकार के विरोध में वामपंथियों से गठबंधन किया। हालांकि उससे हुए नुकसान के बाद इस चुनाव में वह अकेले मैदान में उतरी तो है लेकिन प्रथम चरण के मतदान तक कोई ये कहने वाला नहीं है कि वह कहीं भी मुकाबले में है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर बने इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन में तृणमूल भी शामिल है किंतु ममता चूंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में काम नहीं करना चाहतीं इसलिए वे प. बंगाल में कांग्रेस को जरा भी भाव नहीं देतीं। वर्तमान चुनाव में जब श्री गांधी की पहल पर कांग्रेस ने वामपंथियों से अलग होकर एकला चलो रे का फैसला किया तब ये लगा था कि शायद पार्टी खुद को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करेगी। पड़ोसी राज्य असम में उसने ऐसा किया भी। शुरुआत में श्री गांधी ने भी ममता सरकार को सिंडीकेट द्वारा संचालित बताकर ये संकेत दिया कि पार्टी इस बार आक्रामक होकर लड़ेगी। लेकिन असम का चुनाव संपन्न होने के बाद न तो राहुल और न ही प्रियंका ने प. बंगाल में वैसा डेरा जमाया जैसा अमित शाह ने कर दिखाया । जबकि केरल में भी मतदान हो चुका था और तमिलनाडु में कांग्रेस सीमित सीटों पर लड़ रही है और वह भी द्रमुक के भरोसे। प. बंगाल में गत दिवस हुए भारी मतदान के बाद चुनाव विशेषज्ञ भी पशोपेश में हैं किंतु एक बात पर सभी एकमत हैं कि या तो तृणमूल की सरकार बनेगी या भाजपा की। लेकिन कोई भी ये नहीं बता पा रहा कि कांग्रेस का क्या होगा? यहां तक कि उसके सबसे बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी की जीत भी संदेह के घेरे में है। प. बंगाल पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है । भाजपा ने त्रिपुरा , अरुणाचल और असम में पांव जमाने के बाद अब प. बंगाल में भी खुद को बतौर विकल्प स्थापित कर लिया है। यदि 4 मई को उसकी सरकार बन गई तब उसके लिए भविष्य की चुनौतियां आसान हो जाएंगी लेकिन कांग्रेस के लिए स्थितियां और चिंताजनक होने से उसमें बिखराव आ सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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