मध्यपूर्व में भड़की आग ने ईरान और इजराइल के साथ ही अनेक खाड़ी देशों को लपेट लिया है। अमेरिका और इजराइल की सैन्य शक्ति के मुकाबले के साथ ही ईरान ने सऊदी अरब , कतर , बहरीन , यू. ए. ई, ओमान और तुर्किये तक मिसाइलों से हमले किए। विशालकाय अमेरिकी युद्धपोतों तक पर निशाना साधने में वह पीछे नहीं रहा। यहां तक कि हिन्द महासागर में स्थित ब्रिटेन और अमेरिका के सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया तक पर हमले का दुस्साहस कर बैठा। सैन्य मोर्चे के साथ ही ईरान ने होर्मुज नामक समुद्री मार्ग से जल पोतों की आवाजाही रोककर पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस का संकट उत्पन्न कर दिया । दरअसल होर्मुज ईरान का तुरुप का पत्ता है। इसीलिए अमेरिका के मित्र देश भी अपना दामन बचाने में लग गए। ट्रम्प द्वारा युद्धविराम की घोषणा का मजाक उड़ाते हुए ईरान ने अपनी शर्तें जाहिर करते हुए कह दिया कि वह अमेरिका के सामने नहीं झुकेगा और उसने अपना हमलावर रुख जारी रखा। युद्ध रोकने की जो पहल अमेरिका ने की वह इज़राइल को भी रास नहीं आई और उसने ईरान के साथ ही लेबनान पर हमले तेज कर दिए। इस युद्ध में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इजराइल से भी दो कदम आगे बढ़कर सऊदी अरब ने अमेरिका से मांग की है कि ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूत किया जाए जिससे मध्यपूर्व उसके आतंक से मुक्त हो सके। खाड़ी के अन्य मुस्लिम देश भी ईरान की कमर तोड़ने के समर्थक हैं जिन्हें लगने लगा है कि ईरान यदि इस युद्ध में से सकुशल निकल आया तब वह एक सैन्य महाशक्ति के तौर पर स्थापित हो जाएगा और उस स्थिति में उन देशों की सुरक्षा पर खतरे के बादल मंडराते रहेंगे। सबसे बड़ी चिंता उन्हें अपने तेल और गैस के परिवहन की है क्योंकि युद्ध बिना किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचे रुक गया तो ईरान होर्मुज के जरिए अनुचित दबाव बनाने से बाज नहीं आएगा। इस युद्ध ने उसे इस समुद्री रास्ते का रणनीतिक महत्व समझा दिया है। इसीलिए भावी परिस्थितियों का अंदाज कोई नहीं लगा पा रहा। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि लड़ाई लंबी चलने पर ईरान आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक तौर पर पूरी तरह टूट चुका होगा। वहीं राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व का सफाया होने से उसकी निर्णय क्षमता खत्म होने के बाद वह अव्यवस्था और अराजकता में फंसकर रह जायेगा। उस स्थिति में जिन पड़ोसी मुस्लिम देशों को उसने अपना दुश्मन बना लिया वे भी हिसाब चुकता करने आगे आयेंगे। बड़ी बात नहीं ईरान भौगोलिक तौर पर विखंडन का शिकार हो जाए। डोनाल्ड ट्रम्प के लिए इस लड़ाई में जीत हासिल करना जीवन - मरण का सवाल है। इजराइल तो हर लड़ाई में कुछ न कुछ हासिल कर लेता है। लेबनान की काफी जमीन पर अपना कब्जा जमाकर उसने अपनी सीमा का विस्तार कर लिया। उससे भी ज्यादा फायदा उसे ये मिल रहा है कि सऊदी अरब के साथ ही खाड़ी के तेल संपदा सम्पन्न देश ईरान के डर से इज़राइल के साथ खड़े होने मजबूर हो गए। इस कारण ईरान अकेला पड़ गया है। जो एक - दो इस्लामिक देश उसके साथ हैं वे भी कूटनीतिक और सामरिक तौर पर उतने ताकतवर नहीं हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि ज्यादा बहादुर साबित होने के फेर में ईरान ने अपनी बर्बादी की पटकथा तैयार कर ली। उसे चाहिए था कि पड़ोसी देशों पर हमले से बचे क्योंकि इससे वे तटस्थ बने रहने बाध्य हो जाते। दूसरी गलती उसने होर्मुज से आवाजाही रोककर कर दी क्योंकि इस कदम ने उसे दुनिया की नजर में खलनायक बना दिया। चीन और रूस भी सतही तौर पर उसके पक्ष में नजर आते हैं परन्तु तेल और गैस की आपूर्ति रोके जाने के कारण वे भी ईरान से खुश नहीं हैं। ट्रम्प इस समुद्री मार्ग को खोलने का जो दबाव डाल रहे है उसका उद्देश्य भी तेल और गैस संकट दूर करना है । हालांकि ईरान ने भारत सहित कुछ देशों के जलपोतों को निकलने की सुविधा का ऐलान किया है किंतु अमेरिका ने अपनी चेतावनी के मुताबिक हमले तेज किए तो यह रास्ता फिर बंद हो जाएगा। ऐसी स्थिति में ईरान को चाहिए वह एक साथ सभी मोर्चे खोलने के बजाय जंग रोकने की बुद्धिमत्ता दिखाए। उस स्थिति में अमेरिका और इजराइल भी वैश्विक दबाव में आएंगे क्योंकि तेल और गैस का संकट पूरी दुनिया को परेशान किए हुए है। ईरान को ये बात समझ लेना चाहिए कि बिना बाहरी मदद के वह ज्यादा समय तक लड़ नहीं सकेगा। वर्तमान परिस्थितियों में रूस यूक्रेन में फंसा होने से उसकी सहायता करने में असमर्थ है। सीरिया में असद की सत्ता को भी वह इसीलिए नहीं बचा सका। रहा सवाल चीन का तो वह बहुत ही चालाक है। उसे ईरान का तेल तो चाहिए किंतु वह इस बात के लिए हमेशा सतर्क रहता है कि दूसरे को बचाने में उसका हाथ न जल जाए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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