Tuesday, 31 March 2026

शहरी नक्सलियों की कमर तोड़ना भी जरूरी


गृहमंत्री अमित शाह तय समय सीमा में नक्सलियों के आतंक की समाप्ति के लिए प्रशंसा के हकदार हैं। गत दिवस संसद में नक्सलवाद को लेकर दिया उनका भाषण निःसंदेह सराहनीय था। ये कारनामा बिना दृढ़ इच्छा शक्ति के संभव नहीं था। पिछली सरकारें इस मामले में पूरी तरह विफल रहीं। इसका कारण एक तो उनके मन में समाया डर था दूसरा उस दौर के शासन - प्रशासन में घुसे वामपंथी विचाराधारा के पोषक तत्व थे। दरअसल  नक्सलियों का उद्देश्य आर्थिक विषमता, शोषण और पिछड़ापन मिटाना नहीं अपितु भारत में खूनी क्रांति के जरिए चीन की पिट्ठू माओवादी सरकार बनवाना था। प्रारंभ में तो उनकी छवि क्रांतिकारियों जैसी बनी लेकिन धीरे - धीरे  स्पष्ट हो गया कि वे चीन द्वारा प्रशिक्षित और पालित गिरोह हैं जिन्हें भारत में खूनी क्रांति  का जिम्मा सौंपा गया है। शुरुआत में लगा  कि नक्सली , वामपंथी विचारधारा का उग्रपंथी स्वरूप है लेकिन जल्द ही स्पष्ट  हो गया कि सारे साम्यवादी एक हैं। नक्सली जहां जंगली इलाकों में बंदूक के बल पर माओवाद फैलाते थे वहीं शहरी इलाकों में बैठे साम्यवादी कला , साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता , प्रशासन और राजनीति जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहकर नक्सली हिंसा के औचित्य को साबित करने में जुटे रहते। इन शहरी नक्सलियों ने शासन और प्रशासन में जड़ें जमाते हुए नीति - निर्धारण की प्रक्रिया में घुसपैठ कर ली। भोले  - भाले आदिवासियों को  भड़काकर हिंसा के रास्ते पर धकेलने का काम जहां हथियारबंद नक्सली करते रहे वहीं साहित्य , मनोरंजन , शिक्षा जैसे क्षेत्रों में घुसे शहरी नक्सली वामपंथ के पक्ष में वातावरण बनाने में लगे रहे। इस कार्य में उन्हें कांग्रेस सहित अन्य गैर भाजपा सरकारों का प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन मिलता रहा। देश में ऐसे अनेक  संगठन हैं जो सरकारी अनुदान के बल पर वामपंथ का प्रचार करते रहे। अनेक सरकारी संस्थाओं में शहरी नक्सलियों की नियुक्ति की जाती रही। इनमें से जब भी किसी को पकड़ा जाता तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकशाही के लिए खतरे का ढोल बजने लगता। जेएनयू,जादवपुर ,जामिया मीलिया ,उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयों में वामपंथी छात्र एवं शिक्षक मोमबत्ती लेकर निकल पड़ते। हाल ही में जब हिडमा नामक नक्सली सरगना  मारा गया तब जे.एन.यू में बैठे नक्सल समर्थक छात्रों ने दिल्ली के इंडिया गेट पर  प्रदर्शन करते हुए नारे लगाए थे कि कितने हिडमा मारोगे , हर घर से हिडमा निकलेगा।  ऐसी ही नारेबाजी अफज़ल गुरु की फांसी के बाद जेएनयू में की गई थी। नक्सलियों द्वारा निर्दोषों की नृशंस हत्याओं पर ये शहरी नक्सली मुंह में दही जमाकर बैठे रहते थे। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने  और विशेष रूप से श्री शाह के गृह मंत्री बनने के बाद  किए गए युद्धस्तरीय प्रयासों का ही सुफल है कि पशुपति से तिरुपति तक रेड कार्पेट बिछाने का चीन प्रवर्तित वामपंथी षडयंत्र मिट्टी में मिल गया। त्रिपुरा में जहां वामपंथी सत्ता का अंत हुआ वहीं प. बंगाल में भी वामपंथी प्रभुत्व लुप्त होता जा रहा है। केरल का एकमात्र साम्यवादी किला भी धराशायी होने के कगार पर है। ऐसे में  नक्सलवाद के नाम पर होने वाली हिंसा की जड़ें खोद देना बड़ी उपलब्धि है। श्री शाह ने गत दिवस संसद में सही कहा कि नक्सलवाद  विचारधारा आधारित अपराध है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि जो इक्का - दुक्का नक्सली बचे हैं वे भी मुख्यधारा में लौटें वरना  मारे जाएंगे। सबसे बड़ी सफलता ये है कि  नक्सलियों को हथियार रखकर शांति के रास्ते पर लौटने का पूरा अवसर दिया गया। लेकिन जिन्होंने सुरक्षा बलों पर हमले करने का दुस्साहस किया उन्हें मौत के घाट उतारा गया। हिंसा के जरिए देश को भीतर से कमजोर करने वालों के सफाए के बाद जरूरत है , समाज में बैठे उन शहरी नक्सलियों का पर्दाफाश किए जाने की जो देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न करना चाह रहे हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में युवा आंदोलन के जरिए सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में भी वैसा ही करने की कोशिश भी की गई। लेकिन राष्ट्रवादी विचारधारा के बढ़ते पर प्रभाव के चलते देश को अस्थिर करने वाली शक्तियां कामयाब नहीं हो सकीं। बावजूद  इसके सरकार को सजग रहना होगा क्योंकि भले ही हथियारबंद नक्सलियों का सफाया हो गया हो परन्तु शहरी नक्सली और  उनकी पीठ पर हाथ रखने वाली विदेशी शक्तियां नए रूप में सक्रिय हुए बिना नहीं रहेंगी। ऐसे में नक्सलवाद को प्रश्रय देने वाली सोच को ही खत्म करना होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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