पहले रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला कर उसके बड़े भूभाग पर कब्जा करना, फिर अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठाकर ले आना और ग्रीनलैंड पर अधिकार जताना, ईरान पर इजराइल के साथ हमला करना और अब डोनाल्ड ट्रंप द्वारा क्यूबा पर कब्जे की धमकी देने से पूरी वैश्विक व्यवस्था अस्त व्यस्त हो चली है। ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री मार्ग से आवागमन अवरुद्ध करने से दुनिया भर में तेल और गैस का अभूतपूर्व संकट उत्पन्न हो गया है। अमेरिका की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने गत दिवस आपातकालीन बैठक बुलाकर होर्मुज खुलवाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चेबंदी का प्रयास किया। नाटो देश इस लड़ाई में अमेरिका की अपेक्षानुसार चूंकि सहयोग नहीं दे रहे इसलिए ट्रम्प उन्हें कायर बताकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। लगभग रोजाना वे दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य शक्ति को कमजोर कर दिए जाने से वह ज्यादा दिनों तक लड़ने लायक नहीं बचा किंतु उनके दावों को गलत साबित करते हुए ईरान , इजराइल सहित उन पड़ोसी देशों को भी निशाना बना रहा है जिन्हें अमेरिका समर्थक माना जाता है। आज तो उसने हजारों किलोमीटर दूर हिन्द महासागर स्थित डिएगो गार्सिया में अमेरिका और ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे पर मिसाइल हमला कर लड़ाई का दायरा और बढ़ा दिया। हालांकि एक मिसाइल को नष्ट कर दिया गया वहीं दूसरी लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही गिर गई किंतु ईरान के इस कदम से अब इस युद्ध में नया मोड़ आता दिख रहा है। कुछ दिनों पहले ईरान ने धमकी दी थी कि वह अमेरिका के तटीय इलाकों पर ड्रोन से हमला करने वाला है जिसके बाद अमेरिका में आंतरिक सुरक्षा के इंतजाम और कड़े कर दिए गए। अभी तक ईरान के समर्थन में रूस और चीन जैसी दो बड़ी विश्व शक्तियाँ मुखर हुई हैं किंतु वे इस लड़ाई से दूर ही हैं। इसी कारण ईरान को अकेले ही जूझना पड़ रहा है। जहां तक सवाल रूस का है तो वह यूक्रेन के साथ चल रही जंग में इतनी बुरी तरह उलझा हुआ है कि वहां से निकलकर ईरान की मदद करना उसके लिए न तो संभव है और न ही व्यवहारिक। लेकिन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा चीन इस लड़ाई में उसकी मदद को क्यों नहीं आगे आया ये सवाल विश्व राजनीति में रुचि रखने वालों के मस्तिष्क में कौंध रहा है। यहां ये भी उल्लेखनीय है कि वेनेजुएला से भी चीन बड़ी मात्रा में तेल खरीदता था किंतु उसके राष्ट्रपति का अपहरण कर अमेरिका द्वारा वहां के तेल भंडारों पर आधिपत्य जमाने के बावजूद चीन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इस बारे में स्पष्ट है कि चीन और अमेरिका के रिश्ते डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से तनावपूर्ण चल रहे हैं। रूसी तेल की खरीद के कारण ट्रम्प ने भारत सहित चीन पर भी भारी - भरकम टैरिफ थोप दिया । ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि चीन ईरान के बचाव में उतरेगा किंतु अब तक तो इसके कोई संकेत नहीं मिले। हालांकि चीन की तरफ से अमेरिका विरोधी बयान जरूर आए किंतु ऐसा कहीं से भी नहीं लगा कि वह खुलकर उसकी मदद हेतु आयेगा। वैश्विक मामलों पर नजर रखने वालों ने इसका जो कारण बताया वह बेहद चौंकाने वाला है। उनका मानना है कि रूस द्वारा यूक्रेन और अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में की गई कार्रवाई के बाद ईरान पर हमला और फिर ग्रीनलैंड के अलावा क्यूबा पर कब्जे को लेकर की जा रही बयानबाजी के कारण चीन भी ताईवान पर हमला कर अपनी वन चाइना की महत्वाकांक्षी कार्ययोजना को अंजाम देने पर भीतर - भीतर तैयारी कर रहा है। यद्यपि ताईवान की रक्षा हेतु भी अमेरिकी बेड़े सदैव तैनात रहते हैं लेकिन होर्मुज समुद्री मार्ग खुलवाने के लिए प्रशांत क्षेत्र से अनेक अमेरिकी पोत ईरान की तरफ रवाना होने से इस क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति प्रभावित हो रही है। चीन इसी स्थिति का लाभ लेकर ताईवान को हड़पने की फिराक में है। सामान्य परिस्थितियों में अमेरिका इतनी आसानी से उसे ऐसा नहीं करने देता किंतु वर्तमान में वह ईरान की जंग में बुरी तरह फंस गया है। सबसे बड़ी बात विश्व जनमत की ओर से होने वाले विरोध का डर भी कम हुआ है। चीन के वर्तमान नेतृत्व का सोचना है रूस और अमेरिका द्वारा किसी दूसरे देश की सार्वभौमिकता पर हमला किये जाने के बाद न तो संयुक्त राष्ट्र संघ उनका कुछ बिगाड़ पाया और न ही दुनिया के तमाम देश उन्हें रोक सके। और फिर ताईवान तो मूल रूप से उसी का भूभाग रहा है। ये आशंका कितनी सच साबित होगी कहना कठिन है किंतु चीन और चालाकी एक दूसरे के समानार्थी हैं। ऐसे में यदि मौके का लाभ उठाकर वह ताईवान पर कब्जा करने की कार्रवाई करे तो उसे रोकना मुश्किल होगा। रूस और अमेरिका ने उसकी हिम्मत बढ़ा दी है। यदि ऐसा हुआ तब दुनिया एक और जंग झेलने मजबूर हो जाएगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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