गत दिवस इसी स्तम्भ में ईरान युद्ध में आने वाले कुछ घंटे महत्वपूर्ण होने की जो संभावना व्यक्त की गई थी वह सत्य साबित हुई । और शाम होते तक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आगामी पांच दिन तक ईरान के ऊर्जा केंद्रों पर हमला नहीं करने की घोषणा कर दी। उनके ऐलान से पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली जिसका परिणाम कच्चे तेल की कीमतों में 11 फीसदी जैसी बड़ी गिरावट के रूप में देखने मिला। ट्रम्प के अनुसार ईरान से बातचीत के बाद उक्त फैसला लिया गया। दूसरी तरफ ईरान ने उनके दावे को गलत बताते हुए कह दिया कि लड़ाई रोकने जैसी कोई चर्चा नहीं हुई और वह अपने हमले जारी रखेगा। साथ ही युद्धविराम के लिए अपनी पुरानी शर्तों को दोहरा दिया। इसी तरह इजराइल ने भी स्पष्ट कर दिया कि ईरान और लेबनान पर उसके हमले जारी रहेंगे। ईरान और इजराइल द्वारा ट्रम्प के उलट घोषणा किए जाने से तनाव जारी रहने की आशंका प्रबल हो गई है। इसीलिए कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट आज तेजी में बदलने लगी। आज ही ट्रम्प का एक और गैर जिम्मेदाराना बयान आ गया जिसमें कहा गया कि ईरान पर हमला उन्होंने अपने रक्षा सचिव के कहने पर किया था। ये खबर भी आ गई कि उपराष्ट्रपति वेंस इस हमले के विरुद्ध थे। ट्रम्प प्रशासन के भीतर भी इस मामले को लेकर मतभेदों की जो खबरें बाहर आ रही हैं उनके अनुसार अमेरिका को केवल ईरान की परमाणु इकाइयों को नष्ट करना था किंतु वह बड़े युद्ध में उलझ गया। इस संबंध में ट्रम्प के बयान पहले दिन से ही विरोधाभासी रहे हैं। दो दिन पहले तक वे ईरान को पूरी तरह कमजोर करने का दावा कर रहे थे। 48 घंटे में होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही नहीं खोलने पर उसके ऊर्जा केंद्रों पर हमले की उनकी धमकी के जवाब में ईरान ने भी वैसा ही करने की धौंस दे डाली। इसके बाद इस लड़ाई के खतरनाक रूप लेने की सम्भावना बढ़ने लगी। उधर टर्की , मिस्र और कतर सहित कुछ अन्य मुस्लिम देश भी युद्धविराम के लिए कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय हो गए। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि ट्रम्प इस बाबत पाकिस्तान से बात कर रहे हैं जिसकी न ईरान से पटरी बैठ रही है और न ही इजराइल से कोई रिश्ता है। ऐसे में इस युद्धविराम का कोई ठोस कारण और फायदा किसी की समझ में नहीं आ रहा। होर्मुज से समुद्री यातायात खुलवाने में अन्य देशों द्वारा सहायता नहीं करने के बाद ट्रम्प ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि जिन्हें इसकी जरूरत हो वे ही आगे आएं। लेकिन इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं है कि ईरान पर हमले के पहले उसने किसी से चर्चा क्यों नहीं की? बहरहाल मौजूदा स्थिति में सबसे ढुलमुल स्थिति अमेरिका की है। ट्रम्प रोजाना नए - नए दावे करते हैं। संभवतः वे पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिनकी विश्वसनीयता अमेरिका के परम्परागत मित्र देशों तक में नहीं बची। इसमें दो राय नहीं कि यदि नाटो में शामिल सभी देश ईरान के विरुद्ध मोर्चा खोल देते तो उसकी अकड़ कम हो जाती। संयोग से इजराइल और अमेरिका दोनों भौगोलिक दृष्टि से काफी दूर होने से उनकी फौजों के लिए ईरान में प्रवेश काफी कठिन है। इसीलिए ये जंग हवाई माध्यम से ही लड़ी जा रही है। वैसे ट्रम्प का सिरफिरापन देखते हुए ये कहना मुश्किल है कि वे युद्धविराम की घोषणा पर कायम भी रहेंगे । बड़ी बात नहीं होर्मुज और खार्ग द्वीप की घेराबंदी के लिए व्यूह रचना बनाने उन्होंने समय लिया हो। कूटनीतिक क्षेत्रों में ये चर्चा भी है कि ईरान द्वारा घुटना टेकने से इंकार किए जाने से ट्रम्प की हताशा बढ़ रही है और वे किसी तरह अपना पिंड छुड़ाना चाह रहे हैं । हालांकि ऐसा करना इजराइल के साथ धोखा होगा । बीते कुछ दिनों से ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच मतभेद की खबरें भी आती रही हैं। दरअसल इजराइल इस जंग को अंजाम तक पहुंचाना चाहता है ताकि ईरान रूपी खतरा हमेशा के लिए खत्म हो जाए। मध्यपूर्व के अन्य देश भी उसके साथ हैं। लेकिन ट्रम्प की हरकतों से लगता है वे इजराइल के साथ भी यूक्रेन जैसा व्यवहार करते हुए उसे अधर में फंसाकर चलते बनेंगे। असल में ट्रम्प ने इस युद्ध से कुछ लक्ष्य तो हासिल कर ही लिए। पहला ईरान को इस तबाही से उबरने में दशकों लग जाएंगे और दूसरा मध्यपूर्व के तेल उत्पादक देशों की क्षमता घट गई जिसके कारण अमेरिका अब वेनेजुएला का तेल और अपनी गैस बेचकर धन कमाएगा। तीसरा लाभ उसे ये हो गया कि दुनिया भर में डॉलर के विरुद्ध जो मोर्चेबंदी चल रही थी उस पर विराम लग गया। ट्रम्प की नीतियों में कूटनीति से ज्यादा व्यापारिक हित नजर आते हैं इसीलिए अपने लाभ के लिए वे किसी को भी धोखा देने में संकोच नहीं करते।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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