Wednesday, 11 March 2026

समान नागरिक संहिता को सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी


हमारे संविधान में विधायिका (संसद और विधानसभा ) को नया कानून बनाने के साथ ही  प्रचलित कानूनों को संशोधित या समाप्त करने का अधिकार है। लेकिन न्यायपालिका उसे रद्द भी कर सकती है बशर्ते वह संविधान विरुद्ध हो। अतीत में कई बार अधिकार क्षेत्र पर विधायिका और न्यायपालिका में टकराव के चलते एक दूसरे के निर्णयों को रद्द करने का प्रयास भी हुआ किंतु उस  दौरान भी एक दूसरे के सम्मान का ध्यान रखते हुए संयम बरता गया। इसके दो चर्चित उदाहरणों में पहला था जब स्व.राजीव गांधी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शाहबानो मामले में तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता दिलाये जाने  वाले फैसले को संसद में पलटवा दिया।। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने किसी प्रकार की नाराजगी नहीं जताई। दूसरा प्रकरण है नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु बनाए न्यायिक नियुक्ति आयोग को  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर देना। उक्त प्रस्ताव को लोकसभा ने सर्वसम्मति से पारित किया वहीं राज्यसभा में मात्र राम जेठमलानी अकेले विरोध में रहे। लेकिन सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से टकराने की बजाय उक्त निर्णय को मान्य कर लिया। अक्सर सार्वजनिक मंचों पर सरकार और न्यायपालिका के प्रतिनिधि एक दूसरे की आलोचना करते हैं। लेकिन अब तक दोनों पक्षों ने किसी विवाद को प्रतिष्ठा का विषय बनाकर एक - दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं किया। बावजूद इसके कि  न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीति की भूमिका रहने से अनेक ऐसे व्यक्ति भी न्याय की आसंदी पर बैठ जाते हैं जिनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नहीं होती। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों को  राजनीति से प्रभावित माना जाता है। ये बात भी सही है कि जिस प्रकार सरकार  जनता की नाराजगी से बचना चाहती है ठीक उसी तरह सर्वोच्च न्यायालय भी  विवादित होने से बचते  हुए गेंद विधायिका के पाले में खिसका देता है। ताजा उदाहरण समान नागरिक संहिता संबंधी उसकी टिप्पणी है।  गत  दिवस मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन सम्बन्धी याचिका पर सुनवाई करते हुए देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और  आर. महादेवन की पीठ ने विधायिका से पर्सनल लॉ की वजह से पैदा होने वाली जटिलताओं से बचने के लिए काम करने का आह्वान किया। श्री बागची ने कहा कि पर्सनल लॉ को अमान्य घोषित कर एक शून्य की स्थिति पैदा करने से बेहतर  होगा , इसे विधायी विवेक पर छोड़ दिया जाए ताकि वह समान नागरिक संहिता पर कानून बना सके।  मुख्य न्यायाधीश ने भी उनसे  सहमति जताई। न्यायालय ने माना कि समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है, क्योंकि यह लैंगिक समानता और व्यक्तिगत कानूनों की विसंगतियों को दूर करने के लिए सबसे प्रभावी समाधान है। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शरीयत जैसे संवेदनशील व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव करना संसद  का कार्यक्षेत्र है, न कि सीधे अदालत का। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने संसद को आगे बढ़ने का संकेत दे दिया।  इस समय उत्तराखंड और गोवा में समान नागरिक संहिता है। पूरे देश में इसे लागू करने  पर केवल मुस्लिम समाज ही प्रभावित नहीं होगा अपितु  अनेक जनजातीय समुदायों में प्रचलित व्यवस्थाएं भी बदलेंगी । हालांकि आजादी के बाद से  विभिन्न  समुदायों द्वारा अपनी परम्पराओं और रीति रिवाजों में  समयानुकूल परिवर्तन किए गए हैं। ये बात भी सही है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण ये अल्पसंख्यक समुदाय मुख्य धारा से कटा हुआ है। भारतीय संविधान में सभी  को अपनी धार्मिक आस्थाओं से जुड़ने का अधिकार है। लेकिन कानून की नजर में सभी बराबर हैं। ऐसे में जब कानून से ऊपर शरीयत को मानने जैसी बातें सार्वजनिक रूप से सुनाई देती हैं तब धर्म निरपेक्षता का खोखलापन उजागर हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जो भी कहा उसके बाद अब पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की  पहल केंद्र सरकार को करनी चाहिए। ज़ाहिर है मुस्लिम समुदाय के अलावा मुस्लिम वोट बैंक के सौदागर भी इसका विरोध करेंगे। लेकिन देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी है कि जिस प्रकार दंड विधान संहिता सभी धर्मों के लिए एक समान है वैसे ही एक समान नागरिक कानून भी  होना चाहिए। सभी धर्मों का सम्मान और उनमें आस्था रखने वालों के अधिकार की सुरक्षा जितनी जरूरी है उतना ही महत्वपूर्ण है समाज की एकजुटता जो समान नागरिक संहिता से ही मजबूत होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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