बजट सत्र के पहले चरण में कांग्रेस के नेतृत्व में अनेक विपक्षी दलों ने लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया किंतु तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। अब बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होने पर तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध संसद में महाभियोग लाने की घोषणा के साथ ही शर्त रख दी कि वह उक्त अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन तभी करेगी जब बाकी विपक्ष श्री कुमार के विरुद्ध लाए जा रहे महाभियोग पर तृणमूल कांग्रेस का साथ दे। इसके बाद दोनों एक दूसरे का समर्थन करने राजी हो गए। उल्लेखनीय है प.बंगाल में मतदाता सूचियों के एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण ) के विरोध में ममता बैनर्जी ने आसमान सिर पर उठा रखा है। श्री कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग का दल राज्य के दौरे पर आया तो सुश्री बैनर्जी धरना देकर बैठ गईं। आयोग के लोगों को काले झंडे तक दिखाए गए। हद तो तब हो गई जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प. बंगाल आगमन पर उनकी अगवानी हेतु न तो ममता खुद उपस्थित रहीं और न ही अपने किसी मंत्री को ही भेजा। जबकि देश के संवैधानिक प्रमुख के स्वागत - सत्कार की बाकायदा नियमावली है। वैसे भी यह पद राजनीति से ऊपर होता है। लेकिन लंबे समय से मुख्यमंत्री पद पर आसीन सुश्री बैनर्जी को चुनाव आयोग द्वारा प. बंगाल में एस. आई.आर की प्रक्रिया में लाखों मतदाताओं के नाम काटने के कारण नींद नहीं आ रही। हालांकि जिन पाँच राज्यों में आगामी कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें केवल प. बंगाल की मुख्यमंत्री ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर आंदोलन कर रही हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग लाने जैसी बात केरल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों के दिमाग में नहीं आई जबकि वे भी चुनाव आयोग के प्रति अपना विरोध व्यक्त करते रहे हैं । एस. आई.आर के अंतर्गत उक्त राज्यों में भी लाखों नाम मतदाता सूचियों में जोड़े और काटे गए उस पर आपत्तियां भी लगाई गईं किंतु मुख्यमंत्री या कोई मंत्री न तो धरने पर बैठा और न ही सुश्री बैनर्जी की तरह उत्तेजित दिखा। इससे तो यही लगता है प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को अपनी सत्ता खतरे में पड़ती प्रतीत हो रही है। लेकिन ममता ये भूल गईं कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर बिहार विधानसभा चुनाव के पहले राहुल गांधी ने तेजस्वी यादव के साथ पूरे राज्य में यात्रा निकाली और चुनाव आयोग के विरुद्ध खूब प्रचार भी किया लेकिन जनता ने उस मुद्दे को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। उल्लेखनीय है बिहार में तो कांग्रेस और राजद द्वारा बनाए गए महागठबंधन में ज्यादातर विपक्षी दल शामिल थे, लेकिन प.बंगाल में ममता बैनर्जी एकला चलो की नीति पर चलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ सीटों का बंटवारा करने तैयार नहीं होतीं। दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने बजाय कांग्रेस के आम आदमी पार्टी का समर्थन कर इंडिया गठबंधन की एकता को पलीता लगा दिया था। प. बंगाल विधानसभा के आगामी चुनाव में इस बार कांग्रेस भी वाम मोर्चे का साथ छोड़ अकेले लड़ने का निर्णय कर चुकी है। ये सब देखते हुए संसद में लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव और मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग पर विपक्ष की एकता भी मजबूरी का सौदा बन गई है । हालांकि संसद के दोनों सदनों में एनडीए के पास पर्याप्त बहुमत होने से न तो अविश्वास प्रस्ताव पारित होगा और न ही महाभियोग को मंजूरी मिलेगी। विपक्ष भी ये बात जानता है । दरअसल तृणमूल कांग्रेस द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का सशर्त समर्थन करने का दाँव चलने से विपक्षी एकता की पोल खुल गई है। प. बंगाल में तृणमूल, कांग्रेस और वामपंथी जहां अलग - अलग ताल ठोकेंगे वहीं केरल में भी कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध तलवार भांजते नजर आएंगे। इन्हीं सब कारणों से विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध वैसी मोर्चेबंदी नहीं कर पा रहा जैसी अपेक्षित है। 2024 में लोकसभा चुनाव के पहले बना इंडिया गठबंधन भी लगभग मृतप्राय है। ऐसा नहीं हैं कि भाजपा और केंद्र सरकार के विरुद्ध मुद्दों का अभाव है किंतु संकुचित सोच के चलते विपक्ष में लगातार बिखराव आता जा रहा है जिसका लाभ भाजपा को मिल रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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