Thursday, 19 March 2026

कांग्रेस विहीन विपक्षी गठबंधन की संभावना बढ़ रही


पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद सभी की निगाहें विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति पर टिक गईं। इनमें असम , प. बंगाल, तमिलनाडु  और केरल जहां पूर्ण राज्य हैं वहीं पुडुचेरी केंद्र शासित । असम में भाजपा और कांग्रेस  ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया है वहीं प. बंगाल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा जहां अकेले मैदान में हैं वहीं कांग्रेस और वाममोर्चा गठबंधन तोड़ अलग - अलग मैदान में उतर रहे हैं। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक जैसे दिग्गजों के साथ क्रमशः काँग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल गठबंधन में हैं। अभिनेता विजय की नवोदित पार्टी ने तीसरी ताकत के तौर उतरकर चुनाव को रोचक बना दिया। वहीं केरल में मुकाबला इस बार बेहद कड़ा है।  वाममोर्चा सरकार 10 वर्ष से सत्ता में रहने के कारण सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है लेकिन कांग्रेस के  नेतृत्व वाला एल.डी.एफ अंतर्कलह के चलते उसका लाभ नहीं ले पा रहा।  केरल में भाजपा छिपा रुस्तम है जिसने हाल ही में तिरुवनंतपुरम की नगरनिगम पर कब्जा जमाकर  कांग्रेस और वाममोर्चे के लिए खतरे घंटी बजा दी है। पुडुचेरी जैसे छोटे  से राज्य की राष्ट्रीय राजनीति में वैसे तो कोई अहमियत नहीं है लेकिन वहां की गठबंधन सरकार में भाजपा की मौजूदगी दक्षिण में उसकी उपस्थिति का एहसास करवा रही है। लेकिन उक्त पांचों राज्यों के चुनाव में चौंकाने वाली बात ये है कि कांग्रेस की अगुआई  में भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने वाला इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा नजर आ रहा है। कहने को तो तमिलनाडु में उसके दो  प्रमुख घटक द्रमुक और कांग्रेस एकजुट हैं लेकिन कांग्रेस पूरी तरह द्रमुक की दयादृष्टि पर निर्भर है। गठबंधन में सबसे बड़ा बिखराव दरअसल केरल में  है जहां कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध खुलकर मैदान में हैं। हालांकि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी वे एक दूसरे के विरोध में खड़े रहे किंतु इस बार विरोध ने शत्रुता का रूप ले लिया जिसका दुष्परिणाम प. बंगाल में  कांग्रेस और वाम दलों  का गठबंधन टूट जाने के तौर पर देखने मिला। यहां इंडिया गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध तलवारें भांज रहे हैं। हालांकि ऐसा ही बिखराव हरियाणा और दिल्ली में भी दिखाई दिया था। बिहार में भी वह कांग्रेस और राजद के महागठबंधन में ही सिमटकर रह गया जिससे झामुमो नाराज हो गया। दिल्ली में तो कांग्रेस की ओर से आम आदमी पार्टी का विरोध करने खुद राहुल गांधी ने मोर्चा संभाला था। बची - खुची कसर पूरी कर दी सपा और तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के समर्थन में उतरकर। उसके बाद से इंडिया गठबंधन की न कोई बैठक हुई और न संयुक्त रणनीति  सामने आई। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव के ध्वनि मत से नामंजूर हो जाने के बाद कांग्रेस मत विभाजन की मांग करने का साहस नहीं दिखा सकी क्योंकि उसे डर था कि कुछ विपक्षी पार्टियां मतदान से दूर रह सकती हैं। एक बात खुलकर सामने आ रही है कि भाजपा तो उसके सहयोगी क्षेत्रीय दलों के मुकाबले अपना कद बढ़ाती जा रही है वहीं इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहतीं । ममता बैनर्जी ने तो शुरू से ही कांग्रेस को हाशिये पर रखा। बिहार में चारों खाने चित्त होने के बाद अब तेजस्वी और उनका परिवार भी कांग्रेस से बिदकने लगा है। उ.प्र में अखिलेश यादव भी दूरी बनाते दिख रहे हैं। हाल ही में राहुल गांधी द्वारा बसपा  संस्थापक कांशीराम की तारीफ किए जाने से सपा के कान खड़े हो गए हैं। वहीं शराब घोटाले में निचली अदालत द्वारा दोषमुक्त किए जाते ही अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के साथ ही कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उनका इशारा विभिन्न आरोपों से घिरे गांधी परिवार के सदस्यों के जेल न जाने पर था। ये सब देखते हुए लगता है उक्त पांच राज्यों के चुनाव के  बाद गुजरात, पंजाब और उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव के साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव के लिये एक नया विपक्षी गठबंधन आकार लेगा जिसमें  कांग्रेस नहीं होगी। दरअसल क्षेत्रीय दलों में राहुल के प्रति नाराजगी है जो राष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा विदेश यात्राओं को  महत्व देते हैं। क्षेत्रीय क्षत्रपों को धीरे - धीरे ये बात समझ में आ रही है कि कांग्रेस का साथ देने से उनका अपना जनाधार खिसकता जा रहा है। शरद पवार , उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव इसके उदाहरण हैं। इसीलिए ममता बैनर्जी कांग्रेस से छिटकती हैं। बड़ी बात नहीं विधानसभा चुनाव से निपटते ही वे केजरीवाल के साथ मिलकर कांग्रेस विहीन विपक्षी मोर्चे के गठन में जुट जाएं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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