Monday, 23 March 2026

ईरान में चल रही जंग में आने वाले कुछ घंटे महत्वपूर्ण


ईरान से शुरू हुआ युद्ध प्रत्यक्ष तौर पर तो मध्य पूर्व और खाड़ी देशों तक सीमित है लेकिन इससे पूरी दुनिया में अभूतपूर्व ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा उत्पन्न टैरिफ संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले  ही अस्त - व्यस्त थी। लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल की इस जंग ने सब कुछ उलट - पुलट दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार ईरान अपना तेल चीन को बेचने  के अलावा होर्मुज समुद्री मार्ग से तेल टैंकरों को सुरक्षित निकलने के नाम पर अनाप - शनाप  की कमाई कर रहा है। जबकि सऊदी अरब सहित अन्य खाड़ी देशों में तेल और गैस का उत्पादन ठप पड़ जाने से आर्थिक संकट  है। ट्रम्प द्वारा युद्ध विराम की पेशकश पर ईरान ने  नुकसान की भरपाई के अलावा आगे हमला नहीं करने की शर्त रखकर  स्पष्ट कर दिया कि वह आसानी से हार नहीं मानेगा। ट्रम्प द्वारा 48 घंटे में होर्मुज नहीं खोलने पर उसके तेल और गैस भंडार नष्ट किए जाने की धमकी के जवाब में ईरान ने इजराइल सहित अन्य खाड़ी  देशों में समुद्री जल को पीने योग्य बनाने के लिए लगाए संयंत्रों पर  हमले का ऐलान कर दिया। कुल मिलाकर  अमेरिका और इजराइल के अलावा ईरान भी इतना आगे बढ़ चुका है कि किसी के लिए भी पीछे हटना आत्महत्या करने जैसा होगा। ये आकलन करना भी कठिन है कि अब तक किसका पलड़ा भारी है क्योंकि अमेरिका और इजराइल के  हमलों से ईरान ने न सिर्फ  बचाव किया अपितु पलटवार करने में भी कोई  कसर नहीं छोड़ी । यद्यपि ट्रम्प और नेतन्याहू ने ईरान के  राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की प्रथम पंक्ति को लगभग समाप्त कर दिया किंतु उसके बाद भी यदि वह हमले का जवाब उसी  शैली में दे रहा है तब ये मान लेना  होगा कि ईरान के बड़े नेताओं, सैन्य अधिकारियों और वैज्ञानिकों के ठिकानों की सटीक जानकारी लगाकर उन्हें मार देने में सफल होने के बाद भी अमेरिका और इजराइल ये जानने में विफल रहे कि उसके पास मिसाइलों का कितना भंडार है और वह कितने दिन तक जंग में टिका रह सकता है। ये  भी गौरतलब है कि अभी तक मुकाबला मिसाइलों और ड्रोन तक  ही सीमित है। अमेरिका और इजराइल ने जरूर ईरान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले कर बमवर्षा की लेकिन ईरान पूरी तरह मिसाइलों के जरिए ही आक्रमण कर रहा है। इजराइल ने जब ईरान के परमाणु संयंत्र पर हमला किया तो जवाब में उसने भी इजराइल के परमाणु संयंत्र पर मिसाइलें दागकर हिसाब बराबर कर दिया। इसी के साथ हिन्द महासागर में डिएगो गार्सिया स्थित ब्रिटिश और अमेरिकी अड्डे पर भी उसने मिसाइलों से हमला करने में संकोच नहीं किया। युद्ध विश्लेषकों का कहना है ईरान का ये दुस्साहस इस लड़ाई को नया मोड़ दे सकता है। कुछ तो इसकी तुलना दूसरे विश्व युद्ध में जापान द्वारा दक्षिण एशिया में पर्ल हार्बर के अमेरिकी अड्डे पर किए हमले से कर रहे हैं जिससे बौखलाकर अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिरवाकर उसे घुटने टेकने बाध्य कर दिया। यद्यपि डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू ईरान पर परमाणु हमले जैसा कदम तो नहीं उठाएंगे क्योंकि  विश्व जनमत इसे बर्दाश्त नहीं करेगा । लेकिन इजराइल ,  ईरान को घायल कर छोड़ने के पक्ष में नहीं है इसलिए संभावना  है कि वह अमेरिका के साथ मिलकर ऐसा कुछ अवश्य करेगा जिससे कि ईरान पूरी तरह से निहत्था और असहाय होकर रह जाए। सबसे महत्वपूर्ण ये है कि एक -  दो को छोड़कर बाकी पश्चिम एशियाई मुस्लिम देश भी इजराइल के सुर में सुर मिलाते हुए ईरान की कमर तोड़ने का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि  उनकी तेल संपदा को उसके हमलों से जो नुकसान हुआ उसके कारण उनका आर्थिक ढांचा चरमरा गया। खाड़ी देशों में होने वाले विदेशी पूंजी निवेश के दरवाजे भी ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमलों ने बंद कर दिए। अमेरिका के लिए भी ये लड़ाई प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है वरना उसका बचा - खुचा आभामंडल भी फीका पड़ जाएगा। जहां तक बात इजराइल की है तो इस जंग का अंतिम परिणाम जो भी हो किंतु जिन पड़ोसी मुस्लिम देशों पर ईरान ने हमले किए वे स्वाभाविक रूप से उसके साथ जुड़कर एक क्षेत्रीय गठबंधन बनाने के लिए बाध्य होंगे। आने वाले कुछ घंटों  में मध्य एशिया में किसी बड़ी घटना की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रशांत महासगर से अमेरिकी नौसैनिक ईरान के खार्ग द्वीप की घेराबंदी करने पहुंच रहे हैं। इसका उद्देश्य ईरान की आय के स्रोत को बाधित कर देना है। इसके बाद वह क्या पैंतरा दिखाता है उस पर इस लड़ाई का फैसला निर्भर करेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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