Thursday, 12 March 2026

रूस और चीन के दूर रहने से ईरान फंस गया


ईरान पर अमेरिका और इजराइल के आक्रमण को दो हफ्ते बीतने जा रहे हैं। अब तक दोनों पक्ष एक - दूसरे को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के दावे कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प आदतानुसार रोज नया शिगूफा छोड़ते हुए दावा करते हैं कि ईरान तबाह हो चुका है और उसकी सैन्य क्षमता लड़ाई लंबी खींचने लायक नहीं बची। दूसरी तरफ ईरान भी बुलंद हौसलों के साथ कभी इजराइल तो कभी बहरीन और ओमान के तेल भण्डारों पर ड्रोन से बम वर्षा कर नुकसान पहुंचा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही रोककर ईरान ने तेल आपूर्ति रोक दी है। तेल से लदे दर्जनों टैंकर फंसे हुए हैं। एक - दो ने निकलने की कोशिश की तो ईरान ने उन पर हमला कर दिया। थाईलैण्ड का एक जलपोत कल ही ईरानी मिसाइल का शिकार हो गया जिसमें सवार लोगों को ओमान के सुरक्षा दल ने बचाया किंतु कुछ नाविक लापता होने से उनके मारे जाने की आशंका है। गत सप्ताह ईरान ने पड़ोसी मुस्लिम देशों पर किए गए हमलों के लिए माफ़ी मांगकर ये संकेत दिया था कि इजराइल और अमेरिका को छोड़ बाकी सब पर वह हमले नहीं करेगा। लेकिन उसने ये शर्त भी रख दी थी कि जिन मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं उनसे यदि हमले हुए तब उनके जवाब में ईरान भी पलटवार करेगा। हालांकि बहरीन और ओमान में उसके ताजा हमलों का कारण सामने नहीं आया। इस बीच लड़ाई रोकने के लिए किसी ठोस कूटनीतिक प्रयास की जानकारी नहीं मिली। यद्यपि ट्रम्प ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन से घंटे भर फोन पर बात की परंतु उसका कोई सार्थक परिणाम देखने नहीं मिला। अब तक इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है ये आकलन अच्छे - अच्छे सैन्य विशेषज्ञ नहीं कर पा रहे। कुछ का कहना है कि अमेरिका और इजराइल ने हमले करने में जल्दबाजी कर दी। उनके द्वारा ईरान की सैन्य क्षमता को कम आंका गया। इसके अलावा ये अंदाजा भी गलत निकला कि खामेनेई को मारते ही ईरान का मनोबल टूट जाएगा। आंतरिक विद्रोह की उम्मीद भी ग़लत साबित हुई। इसमें दो राय नहीं हैं कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया जिससे उबरने में उसे दशकों लग जाएंगे। इस बारे में उसकी तुलना यूक्रेन से करना सही होगा जो रूस के हमलों के कारण मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। ऐसी ही स्थिति इजराइल ने गाजा की बना दी। बावजूद इसके ईरान यदि मुकाबले में है तब ये मानना पड़ेगा कि अमेरिका और इजराइल से मिलने वाली धमकियों के चलते उसने अपने रक्षा तंत्र के साथ ही आक्रमण क्षमता को काफ़ी विकसित कर लिया था। ऐसा लगता है ईरान लड़ाई को लंबा खींचकर अमेरिका और इजराइल को थका देना चाहता है। वहीं ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की रणनीति ईरान को इतना नुकसान पहुंचाने की है जिससे वह मजबूर होकर घुटने टेके। हालांकि नुकसान इजराइल में भी कम नहीं हुआ लेकिन इस लड़ाई में ज्यादातर मुस्लिम देश उसके साथ होने से वह इस संकट से उबर जाएगा। अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देश भी उसके नुकसान की भरपाई कर देंगे लेकिन ईरान जिन रूस और चीन के भरोसे अमेरिका जैसी महाशक्ति से टकराने का दुस्साहस कर बैठा वे अब तक मदद हेतु नहीं आए। रूस तो खैर यूक्रेन संकट में फंसा हुआ है किंतु चीन परदे के पीछे रहकर ईरान की कितनी भी मदद करता रहा हो लेकिन सामने आने से बचकर उसने परोक्ष रूप से अमेरिका और इजराइल को ही सहायता दी। इसके पीछे की वजह ये है कि अनेक अरब देशों में इजराइल ने विभिन्न परियोजनाओं में भारी निवेश कर रखा है। यद्यपि ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार चीन ही है किंतु वह अपने आर्थिक हितों के प्रति भी सतर्क है। रूस और चीन द्वारा दूर से बैठकर धुआं देखने से ईरान मुसीबत में फंस गया है। इस जंग का परिणाम क्या होगा ये फिलहाल कोई नहीं बता सकता लेकिन इसके जारी रहते पूरी दुनिया ऊर्जा संकट में उलझकर रह गई है और यही वह ब्रह्मास्त्र है जिसका उपयोग कर ईरान  अपनी पराजय को टालना चाह रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि अंततः ईरान के मौजूदा नेतृत्व में फूट पड़ जाएगी। फिलहाल  अनिश्चितता की स्थिति है जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे के थकने का इंतजार कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी


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