पूरी दुनिया को टैरिफ रूपी हथियार से भयाक्रांत करने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुद को ऐसे रास्ते पर ला खड़ा किया है जहां से आगे बढ़ना जहां बेहद कठिन है वहीं पीछे लौटने पर उनके साथ ही देश की रही सही साख भी- धाक मिट्टी में मिल जाएगी। दोबारा राष्ट्रपति का पद संभालते ही ट्रम्प ने सर्कस के रिंग मास्टर की तरह हंटर फटकारना शुरू कर दिया। यूक्रेन संकट के समय अमेरिका के दबाव में यूरोप के जिन देशों ने रूस पर प्रतिबंध थोप दिये थी उन्हें भी ट्रम्प ने नहीं बख्शा। ये कहना गलत नहीं होगा कि ट्रम्प कूटनीतिक सौजन्यता को ताक पर रखते हुए विशुद्ध गुंडागर्दी पर उतर आए। किसी भी राष्ट्रप्रमुख के प्रति स्तरहीन टिप्पणी करना मानो उनका स्वभाव बन गया। सं. रा. संघ तक को धमकाने की जुर्रत उन्होंने कई मर्तबा की। दुनिया भर में जंग रुकवाने का स्वघोषित श्रेय लूटकर नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त करने के लिए उन्होंने पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के संरक्षक देश से सिफारिश करवाने में शर्म महसूस नहीं की। धीरे - धीरे उनकी हरकतों से पूरा विश्व वाकिफ हो गया।इंतेहा तो तब हो गई जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को आधी रात में शयनकक्ष से उठवाकर अमेरिका के जेल में बंद कर वहां के तेल भंडारों पर विशुद्ध माफिया के अंदाज में कब्जा कर लिया। उसके बाद ग्रीनलैंड को हड़पने की उनकी धमकी से पूरा यूरोप थर्रा उठा। लेकिन डेनमार्क सहित अनेक देशों ने उनका विरोध कर ये संकेत दे दिया कि यूरोप अब आँख मूंदकर अमेरिका का समर्थन नहीं करेगा। इसका प्रमाण बीते दिनों देखने मिला जब ट्रम्प द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई में सहयोग की अपील को अमेरिका समर्थक अनेक देशों ने ठुकरा दिया। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही रोकने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया। ट्रम्प चाह रहे थे कि नाटो देश सैन्य कार्रवाई में उनका साथ दें । लेकिन सभी ने इंकार कर दिया। यहाँ तक जिन खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं वे भी दाएं - बाएं होने लगे । इनमें से अनेक देशों ने अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों के साथ ही अपने सैनिक तैनात किए थे। जहां तक बात इस जंग की है तो ये बात पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है कि ईरान भले ही घुटने टेकने मजबूर हो जाए किंतु उसने अमेरिका को भी बुरी तरह लहू - लुहान कर दिया। और यही ट्रम्प की परेशानी का कारण है। पहले हमले में खामेनेई सहित दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतारने में सफल होने के बाद ट्रम्प का हौसला बुलंद हो चला था। खामेनेई के अनेक परिजन सहित शीर्ष नेता और सैन्य अधिकारी भी मारे गए किंतु बजाय दहशत में आने के ईरान ने अमेरिका और इजराइल सहित उन खाड़ी देशों पर भी मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए जहां अमेरिका ने सैनिक अड्डे बना रखे थे। साथ ही सऊदी अरब , ओमान , बहरीन और कतर की तेल और गैस इकाइयों को निशाना बनाकर उनमें उत्पादन रुकवा दिया। टर्की तक को नहीं बख्शा गया जो खुद को मुस्लिम देशों का नेता बनने का ख़्वाब देखने लगा था। दरअसल ईरान ने उन सभी देशों को संदेश दे दिया कि अमेरिका का साथ देने पर वे भी उसकी मिसाइलों से बच नहीं सकेंगे। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद समूचा यूरोप तेल और गैस के अलावा खाद्यान्न के लिए तरस चुका है ।अमेरिका समर्थक देशों को लगा कि ट्रम्प को खुश करने के लिए वे ईरान के कोप भाजन क्यों बनें? इसीलिये उन्होंने अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दी। इस प्रकार ट्रम्प को दोहरी किरकिरी झेलनी पड़ रही है। ईरान को घुटने टिकवा देने की उनकी डींगें अभी तक तो हवा - हवाई ही साबित हुई है। ऊपर से पुराने सहयोगी भी ठेंगा दिखा रहे हैं। इसे विश्व राजनीति का नया मोड़ कहा जा सकता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद बनी अमेरिका के वर्चस्व वाली एकध्रुवीय व्यवस्था एक झटके में बिखरती लग रही है। इसके लिए डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतें ही जिम्मेदार हैं। जिन्होंने अपने साथ ही अमेरिका की विश्वसनीयता का भी जनाजा निकलवा दिया। पूरी दुनिया के लिए जो गड्ढा उन्होंने खोदा आज वे खुद उसी में गिरकर बचाव की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन कोई मदद को नहीं आ रहा । अमेरिका के राष्ट्रपति को दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति मानने वाली धारणा मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में पूरी तरह बदल चुकी हैं जिनके चलते ट्रम्प विश्व के सबसे निरीह व्यक्ति नजर आ रहे हैं।। इस युद्ध में ईरान की तबाही तो सुनिश्चित है किन्तु ट्रम्प की गलतियों से अमेरिका की चौधराहट भी खत्म होने को है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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