Wednesday, 6 May 2026

करारी हार के बाद भी त्यागपत्र न देना दिमागी दिवालियापन


कोई अनुभवहीन व्यक्ति  कहे तो समझ में आता है लेकिन कई बार केंद्र में मंत्री  और 15 सालों तक प. बंगाल जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं ममता बैनर्जी द्वारा चुनावों में मिली करारी हार के बाद भी त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा को दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा। इस चुनाव में सुश्री बैनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बहुमत से काफी पीछे रह गईं। वे स्वयं भी भवानीपुर की अपनी सीट पर 15 हजार  से हार गईं। सामान्य तौर  प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपनी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में शालीनता के साथ जनादेश को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास जाकर अपना त्यागपत्र सौंप देता है। लेकिन उसे नई सरकार के बनने तक काम चलाऊ तौर पर पद पर  रहने कहा जाता है। अतीत में जब भी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की पार्टी जनादेश हासिल करने में विफल रही तब उन्होंने त्यागपत्र देने में संकोच नहीं किया। दरअसल ये किसी कानून से अधिक लोकतांत्रिक मर्यादा और नैतिकता से प्रेरित आचरण है। गत दिवस  सुश्री बैनर्जी ने जो आरोप चुनाव आयोग, भाजपा और केंद्र सरकार पर लगाए वे अपनी जगह हैं। चुनाव में हुई गड़बड़ी की शिकायत याचिकाओं के जरिए न्यायालय में की जा सकती है। लेकिन चुनाव हारने के बावजूद पद नहीं छोड़ने की जिद का कोई औचित्य नहीं है। इसीलिए अन्य विपक्षी दलों और नेताओं तक ने उनकी हेकड़ी का समर्थन नहीं किया। उल्टे अनेक भाजपा विरोधी यू ट्यूबर पत्रकार भी उनके इस गैर जिम्मेदाराना फैसले की आलोचना करते सुने गए। जहां तक बात संवैधानिक प्रावधानों की है तो चुनाव आयोग द्वारा नई विधानसभा के लिए चुने  सदस्यों की सूची राज्यपाल को भेजे जाने के बाद उसके गठन की  अधिसूचना राजपत्र के जरिए जारी होते ही पुरानी विधानसभा अस्तित्वहीन हो जाती है। इसी के साथ ही राज्यपाल बहुमत प्राप्त दल के निर्वाचित नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त  कर शपथ हेतु आमंत्रित करते हैं।  ममता बैनर्जी इतना तो जानती ही होंगी कि निवर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक ही है। ऐसे में वे त्यागपत्र न दें तब  भी राज्यपाल नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति कर  शपथ दिलवा सकते हैं। तब तक सुश्री बैनर्जी सहानुभूति बटोरने का कितना भी प्रयास करें किंतु उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। बेहतर होता वे  जनादेश को गरिमा के साथ स्वीकार करते हुए राज्यपाल से मिलकर पद से हटने की पेशकश करतीं किंतु जिद्दी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध सुश्री बैनर्जी ने हार की खीज में त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा कर खुद को हँसी और आलोचना  का पात्र बना लिया। उन्होंने विपक्षी एकता के लिए काम करने की बात भी कही है । लेकिन वे भूल गईं कि इंडिया गठबंधन जिस दुर्दशा का शिकार है उसके लिए वे  भी जिम्मेदार हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस और वामपंथी दलों को मात्र 2 सीटें देने का प्रस्ताव दिया। बाद में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठबंधन किया। उसके पहले गोवा विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े कर कांग्रेस का नुकसान भी वे करवा चुकी थीं। दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस की बजाय आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया। इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच लगभग 5 फीसदी का अंतर है। लेकिन कांग्रेस , वामपंथी और अन्य मिलकर 12- 13 प्रतिशत मत बटोर ले गए। यदि  वे सबको एकजुट कर भाजपा विरोधी मोर्चा बनातीं तब चुनाव परिणाम कुछ और हो सकता था । सुश्री बैनर्जी के पास अपनी बात रखने के लिए कानून सम्मत अनेक विकल्प हैं। लेकिन लगता है सत्ता के सान्निध्य में रहने से अब उनमें संघर्ष की हिम्मत नहीं रही। और फिर उनके अस्थिर स्वभाव के कारण अन्य दलों के नेतागण भी उनसे छिटकते हैं। सच  तो ये  है कि उनकी  पराजय से कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा अन्य दलों में भी प्रसन्नता है क्योंकि विपक्षी एकता में वे बड़ा रोड़ा थीं। दरअसल राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षा होने से वे किसी और को बर्दाश्त नहीं करना चाहतीं। राहुल गांधी की नेतृत्वक्षमता पर भी वे कई बार उंगली उठा चुकी हैं। विपक्षी गठबंधन का नेता बनने के लिए समानान्तर रूप से वे तमाम विपक्षी नेताओं से भी मिलीं किंतु कामयाब नहीं हुईं। अब जबकि उनका बनाया  ढांचा बुरी तरह ढह चुका है और अपने ही राज्य में उनकी राजनीतिक हैसियत शिखर से लुढ़कर जमीन पर आ गई है तब उन्हें अकड़ छोड़कर सौजन्यता और समझदारी दिखानी चाहिए थी किंतु वे अपने उस स्वभाव को बदलने राजी नहीं हैं जिसने उन्हें सत्ता के सिंहासन से उतारकर सड़क पर ला खड़ा किया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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