ईरान संकट के कारण उत्पन्न हालातों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो तब भारत का अछूता रहना नामुमकिन है जो अपनी ज़रूरत का 85 फीसदी आयात करता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कारण केंद्र सरकार ने पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए किंतु जैसे ही मतदान पूरा हुआ वैसे ही पहला झटका दिया कमर्शियल गैस सिलेंडर की मूल्य वृद्धि के रूप में और वह भी लगभग 1 हजार प्रति सिलेंडर। आम जनता की नाराजगी से बचने फिलहाल घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम नहीं बढ़े और डीजल - पेट्रोल की मूल्यवृद्धि भी रोककर रखी गई है। लेकिन कमर्शियल गैस के बढ़े दाम का असर भी अप्रत्यक्ष रूप से जनता पर पड़े बिना नहीं रहेगा। हालांकि सरकार की ओर से घुमा - फिराकर कहा जा रहा है कि ईरान संकट से पेट्रोलियम कंपनियों को काफी घाटा हो रहा है किंतु इस मामले में वह अपराध बोध से ग्रस्त है। क्योंकि बीते कुछ सालों में रूस से मिले सस्ते कच्चे तेल के कारण पेट्रोलियम कंपनियों ने भरपूर मुनाफा बटोरा। अंतर्राष्ट्रीय मूल्य निचले स्तर पर रहने से भी सरकारी तेल कंपनियों का खजाना खूब भरा। चूंकि उसका लाभ उपभोक्ताओं को देने से परहेज किया गया इसलिए जब ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल और गैस की कीमतें चढ़ीं तब सरकार के पास दाम बढ़ाने का कोई औचित्य या यूं कहें कि नैतिक आधार नहीं है। लेकिन तमाम वित्तीय संस्थान ये संभावना जता रहे हैं कि यदि खाड़ी में संकट जारी रहा और होर्मुज में चल रही नाकेबंदी जारी रही तब चाहे - अनचाहे पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी करनी ही होगी। जनता भी परिस्थितियों का तकाजा समझ रही है। लेकिन इस बारे में दो बातें हैं जिन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली ये कि वाजपेयी सरकार के समय पेट्रोल - डीजल की कीमतों को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़ने की जो व्यवस्था हुई उसे दोबारा प्रारम्भ किया जाए। हालांकि उसी सरकार ने चुनाव आते ही मतदाताओं की नाराजगी से बचने उस पर रोक लगाकर दाम स्थिर रखे। मौजूदा केंद्र सरकार ने प्रारंभ में उस प्रथा को दोबारा लागू करने का साहस दिखाया। उसके अंतर्गत जैसे ही मूल्य घटते या बढ़ते उसी के अनुसार उपभोक्ता को भी उनकी खरीदी करनी पड़ती। आम तौर पर ये घटा - बढ़ी 1 रुपए के भीतर होने से असहनीय नहीं लगती थी किंतु अज्ञात कारणों से उस व्यवस्था को फिर निलंबित कर दिया गया। जिसके कारण कीमतें तो स्थिर रखी गईं किंतु जब वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल सस्ता हुआ तब उसका लाभ उपभोक्ता को देने से बचा गया। कुछ समय तक तो पिछले घाटे की पूर्ति का बहाना समझ में आता है लेकिन उसकी भरपाई के बाद भी पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा पूरा मुनाफा हड़पने की नीति समझ से परे है। दूसरी बात जीएसटी से अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों को बाहर रखना है। यदि अन्य उपभोक्ता वस्तुओं जैसी जीएसटी की दर डीजल - पेट्रोल और रसोई गैस पर निश्चित कर दी जाए तब इनके दाम काफी नीचे आ जाएंगे। शुरुआत में तो उससे सरकार के राजस्व में कमी परिलक्षित होगी किंतु जिस तरह गत वर्ष किए गए बदलाव के बावजूद सरकार को हर माह मिलने वाली जीएसटी वसूली में खास फर्क नहीं आया वैसे ही पेट्रोल - डीजल आदि को जीएसटी के दायरे में लाने पर आम जनता को होने वाली बचत अंततः बाजार में ही आएगी जिससे जीएसटी वसूली का संतुलन बना रहेगा। कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम तकरीबन 1 हजार रुपए बढ़ा देने के बाद ये आशंका बढ़ चली है कि 4 मई के बाद पेट्रोल - डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतों में भी वृद्धि होगी। विपक्षी दल तो काफी पहले से कहते आ रहे हैं कि ईरान संकट के बावजूद दाम नहीं बढ़ाकर सरकार कोई मेहरबानी नहीं कर रही अपितु वह पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जनता के गुस्से से बचना चाह रही है। ये सब देखते हुए उचित तो यही होगा कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़कर उनकी कीमतों में पारदर्शिता लाने के साथ ही उन्हें जीएसटी के अंतर्गत लाकर अनाप - शनाप करों के बोझ को कम करने की ईमानदारी दिखाई जाए। ये बात सही है आर्थिक अनुशासन को लागू करने में चुनावी नफा - नुकसान आड़े आते हैं किंतु देश को वाकई आर्थिक महाशक्ति बनाना है तब ऐसे निर्णय लेने ही होंगे जिनमें कड़ाई और व्यवहारिकता का समन्वय हो।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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