अन्ततः सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई.आर ) को विधि सम्मत मानते हुए स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आयोग के पास प्रक्रिया का पालन करते हुए मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार है, अतः यह पूरी तरह से संवैधानिक और वैध है। गत दिवस दिए फैसले में उसने स्वीकार किया कि जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट को अपडेट और संशोधित करने की शक्ति प्राप्त है। एस.आई.आर विरोधी याचिकाओं को रद्द करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसमें कोई खामी नहीं है। फैसले में कहा गया है कि आयोग मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के साथ ही शर्तों के साथ नागरिकता की जांच भी कर सकता है। इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई होगी जो ये प्रचार करने में जुटे रहे कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आड़ में केंद्र सरकार के इशारे पर उन मतदाताओं के नाम योजनाबद्ध तरीके से काटे गए जिन्हें भाजपा विरोधी समझा जाता था। उधर चुनाव आयोग बाकायदा घोषणा करता रहा कि नाम काटे गए मतदाता आवश्यक दस्तावेजों के साथ दोबारा आवेदन कर सकते हैं। बिहार में ऐसा हुआ भी । इसी के साथ ही 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए मतदाताओं को नाम जोड़ने के लिए भी पर्याप्त अवसर दिया गया। बिहार और प. बंगाल में एस. आई. आर का सबसे ज्यादा विरोध हुआ। प. बंगाल में तो सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों तक को उसकी प्रक्रिया संपन्न करने में लगाया जिससे पारदर्शिता बनी रहे। जिन पांच राज्यों में पिछले महीने विधानसभा चुनाव हुए वहां भारी मतदान से एक बात तो साबित हो गयी कि मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया में पूरा विश्वास है। आयोग द्वारा की गई व्यवस्था को भी खुलकर सराहा गया। एस. आई. आर के विरोध में विपक्ष ने ये सोचकर हल्ला मचाया कि जनता भी उसके साथ सड़कों पर उतरेगी किन्तु बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की यात्रा और प. बंगाल में ममता बैनर्जी द्वारा सड़क से सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ने के बावजूद उन्हें न जन समर्थन मिला और न अदालत ने प्रक्रिया रोकी। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आई.आर को कानून सम्मत बताते हुए उसे चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मान लिया और आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से भी मना कर दिया तब विपक्ष और उसके पीछे खड़े मोदी विरोधियों को भी ये समझ जाना चाहिए कि ये मुद्दा बेअसर हो चुका है। वोट चोरी को लेकर राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को घेरने के लिए धरती - आसमान एक कर दिये वहीं ममता बैनर्जी तो धरने तक पर बैठ गईं। लेकिन उनकी बात न जनता के गले उतरी और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने ही उसे महत्व दिया। बिहार, और प. बंगाल में भाजपा को मिली सफलता से ये साबित हो गया कि एस. आई. आर के विरोध को जनता ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद वोट चोरी का गुब्बारा पूरी तरह फूट चुका है। बिहार और प. बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न होने का कारण मतदाता सूचियों में किया गया संशोधन ही है। अवैध बांग्लादेशियों के अलावा मृत हो चुके लोगों के नाम बड़े पैमाने पर कटने से मतदाता सूचियाँ शुद्ध हो गईं जिससे फर्जी मतदान रोका जा सका। सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य में होने वाले चुनावों के पहले छूटे हुए सभी मतदाताओं के नाम जोड़ने का निर्देश देकर चुनाव आयोग को एस. आई. आर जारी रखने की छूट दे दी। सवाल ये है कि क्या विपक्ष अपना विरोध जारी रखेगा या आयोग के साथ समन्वय स्थापित कर मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने में सहयोग करेगा जिसमें उसका भी हित है। लेकिन इसके लिए उनको अपने संगठन में कसावट लानी होगी। राहुल गांधी जैसे नेताओं को भी ये बात समझनी चाहिए कि जितना समय , श्रम और संसाधन उन्होंने बिहार में चुनाव आयोग को गाली देने में खर्च किया उतना अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगाते तब कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती। प. बंगाल में उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी तो सब सीटों पर उतार दिए किंतु प्रचार से दूरी बनाकर उनकी फजीहत करवा दी। यहां तक कि पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में हारने के बाद विधानसभा चुनाव में भी तीसरे स्थान पर रहे। बिहार और प. बंगाल में औंधे मुंह गिरने के बाद ममता सहित अन्य विपक्षी नेता एकजुट होकर भाजपा से निपटने की बातें कर रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि इन चुनावों में एकता से परहेज क्यों किया गया और आगे उसकी क्या गारंटी है? बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने बिना लाग - लपेट के एस. आई. आर को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मानते हुए चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक भाग बताते हुए विपक्ष द्वारा फैलाए गए झूठ की कलई खोल दी है। ये फैसला विपक्ष के लिए सबक भी है कि वह हवा - हवाई मुद्दों से दूर रहते हुए जनहित से जुड़े विषयों पर आवाज उठाये। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि विपक्ष में आत्मावलोकन की प्रवृत्ति और जनता की अपेक्षाओं को महसूस करने की क्षमता खत्म हो चुकी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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