Thursday, 14 May 2026

राष्ट्रीय संकट में निजी और राजनीतिक हित महत्वहीन


इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक वर्ष तक सोना नहीं खरीदने के साथ पेट्रोल , डीजल , रसायनिक उर्वरक और खाद्य तेलों का उपयोग कम करने की अपील पूरे देश में चर्चा का विषय है। दरअसल भारत उक्त सभी चीजों का काफी आयात करता है जिसका भुगतान विदेशी मुद्रा में  होता है। ईरान युद्ध की वजह से कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ने के कारण रुपए की कीमत भी गिर रही है। भारत को खाद्य तेल भी आयात करने पड़ते हैं। हालांकि उक्त चीजों का आयात पूरी तरह से रोकना असंभव होगा किंतु सोना ऐसी चीज है जो दैनंदिन जीवन के लिए अनिवार्य न होने के बावजूद भारत उसका सबसे बड़ा आयातक है। सदियों से हमारे यहां सोने को सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है। यद्यपि दाम बढ़ते जाने से  आम आदमी की सोना खरीदने की क्षमता घटती जा रही है ,  फिर भी भारत सोने की खरीदी में अग्रणी देश है। कहा जाता है अमेरिकी सरकार के पास जितना स्वर्ण भण्डार है उससे ज्यादा भारत की जनता के पास घरों में रखा है। प्रधानमंत्री की अपील के बाद तरह - तरह की अफवाहें उड़ने लगीं। उनकी बातों का मजाक भी उड़ाया जाने लगा। उल्लेखनीय है श्री मोदी ने एक वर्ष तक सैर - सपाटे के लिए विदेश यात्रा न करने का अनुरोध भी लोगों से किया। सोने और चांदी का आयात घटाने के लिए उन पर आयात शुल्क भी बढ़ा दिया गया जिसके बाद उनकी कीमतें भी बढ़ने लगीं। बहरहाल समझने वाली बात ये है कि प्रधानमंत्री ने उक्त चीजों का उपयोग घटाने के साथ ही कुछ समय तक उनकी खरीदी से बचने की जो बात कही उसका सम्बन्ध मौजूदा तनाव  के चलते विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना है। ईरान युद्ध शुरू हुए ढाई महीने से अधिक हो गए। दुनिया के तमाम देशों में पेट्रोल, डीजल और गैस की राशनिंग लागू हो गई। पड़ोसी देशों में उनके दाम 50 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। लेकिन भारत में रसोई गैस की किल्लत कुछ दिनों तक चलने के बाद स्थिति काफी हद तक सामान्य हो गई जबकि पेट्रोल - डीजल की आपूर्ति निर्बाध जारी होने के अलावा कीमतें भी नहीं बढ़ाई गईं। यद्यपि इसका कारण पांच राज्यों के चुनाव ही थे। इसीलिए संभावना है कि किसी भी समय मूल्यवृद्धि का ऐलान हो सकता है और वह भी अच्छा - खासा। प्रधानमंत्री की अपील का भाजपा शासित राज्यों में तो असर दिखाई देने लगा है। खुद श्री मोदी भी गत दिवस दो वाहनों के साथ निकले। अनेक मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने भी अपने काफिले छोटे कर लिए। जबलपुर में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश महोदय साइकिल से अदालत पहुंचे। हालांकि ये  कब तक जारी रहेगा कहना मुश्किल है क्योंकि स्थिति सामान्य होते ही सब कुछ पहले जैसा होना तय है। लेकिन प्रधानमंत्री की अपील के निहितार्थ को समझना जरूरी है। मौजूदा संकट वैश्विक स्तर का है। इसके जल्द सुलझने की उम्मीद भी नजर नहीं आ रही। ऐसे में  वित्तीय अनुशासन तभी संभव होगा जब जनता के स्तर पर भी उसे आत्मसात किया जाए। उक्त अपील को अर्थव्यवस्था में गिरावट  मान लेना जल्दबाजी है। बुद्धिमत्ता यही है कि सूझबूझ से  भावी चुनौतियों के लिए तैयार रहा जाए। श्री मोदी ने आम जनता से केवल अपील की है जिसे पाबंदी नहीं कहा जा सकता। ये वैसा ही है जब खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए 1965 में स्व. लालबहादुर शास्त्री ने जनता से सोमवार का सायंकालीन भोजन त्यागने की अपील की थी।  उस अपील का बड़ी संख्या में लोगों ने स्वेच्छा से पालन किया। श्री मोदी की अपील भी वर्तमान परिस्थितियों से लड़ने का सुझाव है जिसे मानना या न मानना लोगों पर निर्भर करता है । दुनिया के अनेक देशों में संकट के समय सरकार जनता से इसी तरह का सहयोग मांगती हैं। चीन जैसे देशों में तो ऐसी अपील का अर्थ ही हुक्मनामा होता है। लेकिन भारत में लोकतंत्र होने से सरकार लोगों से हालात के अनुरूप आचरण की अपेक्षा करती है।  अतीत में भी अनेक बार सरकार ने जनता से सहयोग मांगा और लोगों ने खुलकर  दिया भी। 1962 में चीनी हमले के समय  बनाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में साधारण नागरिकों तक ने सोना दान किया था । महिलाओं ने भी अपने आभूषण सहर्ष प्रदान किए जिससे सेना के लिए हथियार आयात किए जा सकें। उसके बाद आए किसी भी राष्ट्रीय संकट में जनता सरकार के साथ खड़ी रही। वर्तमान परिस्थिति बेहद पेचीदा है। जिसमें भारत ही नहीं समूचा विश्व उलझ गया है। आने वाले दिनों में क्या होने वाला है उसका पक्का अंदाज कोई नहीं लगा पा रहा। ऐसे में उचित यही होगा कि हम अभी से मानसिक और आर्थिक तौर पर मुकाबले के लिए तैयार रहें। प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा उस पर राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखकर सोचना ही उचित होगा क्योंकि जब देश पर संकट आता है तब निजी और राजनीतिक हित महत्वहीन हो जाते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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