पांच राज्यों के चुनावों में जो पार्टी जीती वह सरकार बनाने में जुट गई वहीं जिनके हाथ पराजय आई वे भविष्य की तैयारी में लग जाएंगे। निकट भविष्य में जहां चुनाव होने वाले हैं उन राज्यों के लिए रणनीति और मोर्चेबंदी का काम भी जल्द शुरू हो जाएगा। 2027 में गोवा , मणिपुर, उ प्र, उत्तराखंड , पंजाब, हिमाचल और गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे। मणिपुर में शायद अशांति के चलते चुनाव प्रक्रिया निलंबित रहे किंतु बाकी में निर्धारित समय पर मतदान होगा। असम और प. बंगाल में शानदार सफलता के कारण भाजपा का हौसला निश्चित रूप से ऊंचाई पर होगा। हालांकि दक्षिण में उसे पुडुचेरी से ही संतोष करना पड़ा। केरल में तो वह तीन सीटें जीत भी गई किंतु तमिलनाडु में शून्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में मणिपुर को छोड़ भी दें तो गोवा , उत्तराखंड, उ.प्र और गुजरात में अपनी सरकार की वापसी के लिए वह हरसम्भव प्रयास करेगी। इसी के साथ हिमाचल की सत्ता कांग्रेस से छीनने के अलावा पंजाब में अपने दम पर पैर जमाने की रणनीति बनाएगी। हाल ही में आम आदमी पार्टी के कुछ सांसदों को तोड़कर उसने अपने इरादे जता दिए हैं। वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी , आम आदमी पार्टी और अकाली दल भी अपने ढंग से व्यूह रचना करेंगे। लेकिन गत दिवस आए परिणामों से सभी दलों को ये सबक लेना चाहिए कि मुफ्त उपहार बांटकर चुनाव तो जीता जा सकता है किंतु सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी है सरकार का प्रदर्शन हर मोर्चे पर जन अपेक्षाओं के अनुरूप हो। कल सम्पन्न चुनावों वाली सभी राज्य सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई न कोई योजना चला रखी थी । केरल में विजयन और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने सीधे खाते में नगदी के अलावा जनकल्याण की अनेक योजनाएं संचालित करते हुए सत्ता में बने रहने की जमीन तैयार की। ऐसा ही देखने मिला प. बंगाल में जहां ममता बैनर्जी ने महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए तरह - तरह के मुफ्त उपहार बांटे। असम में भी चुनाव के पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने महिलाओं के खाते में हजारों रुपए जमा करवा दिए। वैसे तो सभी राज्यों में जन कल्याण के नाम पर सरकारें खजाना लुटा रही हैं। चुनाव जीतने के लिए भी मौजूदा खैरातों से ज्यादा का वायदा भी आम है। प. बंगाल में महिलाओं को तृणमूल सरकार 1500 रु. प्रतिमाह देती थी। उसका तोड़ निकालते हुए भाजपा ने 3 हजार का वायदा कर दिया। आम तौर पर देखने मिला है कि मतदाता जो मिल रहा है उस पर ही भरोसा जताता है। म. प्र, महाराष्ट्र,झारखंड, बिहार और असम में ये साबित भी हुआ। लेकिन छत्तीसगढ़। और राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकारों ने दिल खोलकर खजाना लुटाया लेकिन मतदाताओं ने उन्हें उखाड़ फेंका। कल आए नतीजों में असम में हिमंता सरकार तो मुफ्त खैरात बांटकर सत्ता में वापस आ गई जबकि प. बंगाल में ममता बैनर्जी, तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन की सरकार को खैरात भी बचा नहीं सकी। सुश्री बैनर्जी और स्टालिन तो खुद भी हार गए। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि प्रतिद्वंदी पार्टी के अधिक लुभावने वायदों के लालच में मतदाताओं ने मौजूदा सरकार के उपकारों को भुला दिया किंतु ये सच्चाई से आँखें चुराने जैसा है। सही बात ये है कि साधारण समझ वाला मतदाता भी समझने लगा है कि इन मुफ्त उपहारों की आड़ में सत्ता में बैठे लोग किस तरह अपना घर भर रहे हैं। इसके अलावा शासन चलाने के तौर - तरीके भी जनता के संज्ञान में आने लगे हैं। ममता बैनर्जी, स्टालिन और विजयन मजबूत नेता माने जाते थे। लेकिन कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के अलावा देश की एकता - अखंडता जैसे मुद्दों की अनदेखी उन्हें महंगी पड़ी। प. बंगाल में घुसपैठियों के प्रति ममता सरकार के लचीले रवैये ने लोगों का गुस्सा बढ़ाया। वहीं जरूरत से ज्यादा मुस्लिम तुष्टीकरण की सहज प्रतिक्रिया हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में देखने मिली। महिलाओं पर अत्याचार के प्रति गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी और तृणमूल के गुंडों का आतंक मुफ्त योजनाओं पर भारी पड़ा। तमिलनाडु तो खैरातों का मुख्यालय है। अभिनेता विजय ने 8 ग्राम सोना देने का वायदा कर स्टालिन सरकार की योजनाओं की चमक फीकी करने का दांव चला किंतु उनकी जीत के पीछे द्रमुक सरकार का खराब प्रदर्शन, मुख्यमंत्री के बेटे की सनातन के विरुद्ध स्तरहीन बयानबाजी जैसी गलतियों ने इस सरकार की जड़ें खोखली कर दीं। इसी तरह केरलम में विजयन सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के दमन के लिए बदनाम हो चली थी।।राज्य में आई प्राकृतिक आपदा के समय भी उसका प्रदर्शन बहुत खराब रहा। वामपंथी सरकारें सुशासन के लिए जानी जाती रहीं किंतु विजयन सरकार इस मामले में भी बदनाम हो गई। कुल मिलाकर निष्कर्ष ये है कि केवल खैरात बांटकर ताउम्र सत्ता में बने रहने की गलतफहमी राजनीतिक दलों और नेताओं को दूर करना चाहिए। हिमंता ने घुसपैठियों के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर मतदाताओं पर छाप छोड़ी जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के लालच में बहुसंख्यक हिंदुओं का समर्थन खो बैठी। उसके 19 विधायकों में से 18।मुस्लिम और एक ईसाई है जिसका निहितार्थ आसानी से निकाला जा सकता है। ममता बैनर्जी भी भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, गुंडागर्दी और घुसपैठियों की समस्या से मुंह मोड़कर बैठ गईं। नतीजा सामने है। ये देखते हुए जिन्हें जीत मिली उन्हें ये एहसास होना चाहिए कि मुफ्त उपहार सत्ता में ला तो सकते हैं लेकिन उसमें बने रहने के लिए सुशासन जरूरी है। वरना न खैरातें काम आएगी और न ही जातिवाद।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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