पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने शुरू हो गए हैं। दोपहर एक बजे तक की स्थिति यथावत रही तब ये नतीजे तमिलनाडु रूपी केवल एक अपवाद छोड़कर उम्मीद के मुताबिक ही हैं। इस मिनी आम चुनाव में प. बंगाल सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। ममता बैनर्जी जैसी मजबूत जनाधार वाली नेत्री को सत्ता से हटाने की संभावना पर राजनीति के अच्छे - अच्छे जानकार कुछ कहने से बच रहे थे । मैदान में घूमने वाले टीवी पत्रकार भी ये तो मान रहे थे कि भाजपा ने इस बार अभूतपूर्व मोर्चेबंदी की है किंतु वे ये कहने से भी नहीं चूकते थे कि सुश्री बैनर्जी द्वारा महिलाओं को प्रति माह दी जा रही 1500 रु. की राशि का करिश्मा काम करेगा जैसा झारखंड में हेमंत सोरेन की जीत से दिख गया था। 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का पुख्ता समर्थन भी तृणमूल की बड़ी पूंजी मानी जा रही थी। राज्य में ममता दीदी की टक्कर का कोई नेता भाजपा के पास नहीं होने के नाम पर भी 2021 जैसे नतीजे दोहराए जाने का दावा भी किया जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगे झटके के बाद तृणमूल का उत्साह और बढ़ गया । लेकिन आज आए परिणाम ने साबित कर दिया कि माँ, मानुष और माटी जैसे भावनात्मक नारे के नाम पर सत्ता में आईं ममता बैनर्जी ने जिस अराजकता को बढ़ावा दिया उसके विरुद्ध प. बंगाल की जनता ने मौन क्रांति कर दी। जिस तरह से मतदाता कैमरे के सामने बोलने से कतराते थे उसने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी जब इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल की दहशत में आम जनता कुछ बोलने से तो डरती थी किंतु चुनाव में उसने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। प. बंगाल का चुनाव परिणाम भी ठीक वैसा ही है जिसने नजदीकी मुकाबले के अनुमानों को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत प्रदान कर दिया। बड़ी बात नहीं वह 200 का आंकड़ा भी पार कर जाए। ये जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सटीक रणनीति और व्यूहरचना का सुपरिणाम होने के साथ ही मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध जनादेश है। प. बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत ने बिहार के बाद एक बार फिर उस मिथक को तोड़ दिया कि मुस्लिम मतों का थोक समर्थन जीत की गारंटी है। इस परिणाम का असर उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा जहां अखिलेश यादव मुस्लिम मतों के बल पर सत्ता में वापसी के ख्वाब देख रहे हैं। प. बंगाल के पड़ोसी असम में भाजपा की धमाकेदार तीसरी जीत से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा भी योगी आदित्यनाथ की तरह ही हिंदुत्व के महानायक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। इसी तरह केरलम में वामपंथी सरकार का पतन तो सुनिश्चित था। लेकिन इस राज्य में कोई अन्य विकल्प नहीं होने से कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ को आशा से अधिक सीटें मिल गईं। हालांकि एनडीए ने तीसरी शक्ति बनने के लिए काफी मशक्कत की लेकिन उसे इस रूप में सफ़लता मिली कि वामपंथी मतों को खींचकर उसने अपने सबसे बड़े वैचारिक विरोधी की जड़ें उखाड़कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना लिया। केरलम में यूडीएफ की बड़ी जीत कांग्रेस के लिए बेशक उत्साहवर्धक है। राहुल गांधी ने यहां काफी जोर भी लगाया था किंतु इस राज्य का राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। यही हाल पुडुचेरी का भी है जहां एनडीए की सत्ता में वापसी से दक्षिण भारत तक के समीकरण प्रभावित नहीं होते। लेकिन द्रविड़ राजनीति के गढ़ तमिलनाडु ने इस बार जो किया वह बीते 60 सालों का सबसे बड़ा चुनावी उलटफेर है। विजय नामक लोकप्रिय तमिल अभिनेता की नवोदित पार्टी टीवीके बहुमत की देहलीज पर आ पहुंची। इस प्रकार विजय तमिलनाडु में धुरंधर की तरह समूचे परिदृश्य पर छा गए। यद्यपि एम. जी. रामचन्द्रन और जयललिता भी फिल्मी दुनिया से थे । उनके बाद रजनीकांत और कमला हासन ने भी सियासत में हाथ आजमाए किंतु असफल रहे। ये देखते हुए विजय ने नया इतिहास रचते हुए द्रविड़ आंदोलन से पैदा हुई दोनों पार्टियों द्रमुक और अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ दिया। हालांकि उनके पास बहुमत के लिए कुछ सीटें कम हैं इसलिए उन्हें बाहर से समर्थन लेना होगा। खबर है कांग्रेस ने उनकी तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया भी है किंतु अभी तमिलनाडु का खेल खुला हुआ है। वैसे द्रमुक और अन्ना द्रमुक दुश्मनी भूलकर एक हो जाएं तो अभी भी सत्ता उनके पास बनी रह सकती है । इस चुनाव ने मुख्यमंत्री स्टालिन की ऐंठ भी खत्म कर दी जो तीसरे स्थान पर आ गए। उनके बेटे द्वारा किया ग़या सनातन का विरोध भी उनकी दुर्गति का कारण बना। आज शाम तक अंतिम परिणाम घोषित हो जाएंगे जिसके बाद बिंदुवार विश्लेषण किया जा सकेगा। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन बड़ी खुशी लेकर आया है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरकर हरियाणा,महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के बाद प. बंगाल जीतकर उसने ये साबित कर दिया कि उसके अच्छे दिन जारी हैं। जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध दिन - रात दुष्प्रचार किया करते हैं प. बंगाल में भाजपा की जबर्दस्त जीत उनके मुंह पर भी झन्नाटेदार तमाचा है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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