अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि होने से ज्यादातर देशों में तो पेट्रोल , डीजल और गैस महंगे हुए किंतु भारत में दाम नहीं बढ़े। भले ही इसका कारण पर्याप्त भंडार बताया गया किंतु सच्चाई ये है कि केंद्र सरकार पांच राज्यों के चुनाव परिणामों का इंतजार कर रही थी। ये साबित भी हो गया जब चुनाव के कुछ दिनों बाद ही पेट्रोल डीजल के दामों में वृद्धि की गई। उल्लेखनीय है मूल्य वृद्धि करने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल - डीजल की फिजूलखर्ची रोकने के साथ ही एक वर्ष तक विदेश यात्रा और सोने की खरीदी से परहेज करने की अपील की थी जिसका उद्देश्य बहुमूल्य विदेशी मुद्दा बचाना था। उक्त चीजों का आयात अमेरिकी डॉलर में होने से उसकी मांग बढ़ती है जिसका परिणाम रुपये की गिरती कीमत के रूप में सामने है। प्रधानमंत्री की उक्त अपील में ही मूल्य वृद्धि का संकेत निहित था। सोने पर आयात शुल्क में वृद्धि और चांदी के आयात में कानूनी रोक लगाना इसका प्रमाण है। अंत में पेट्रोल - डीजल का क्रम आया और बीते 15 दिनों में ही चार किश्तों में लगभग 10 रु. प्रति लिटर की वृद्धि की जा चुकी है। जाहिर है हाल - फिलहाल कोई चुनाव नहीं हाेने की वजह से केंद्र सरकार को राजनीतिक खतरा नजर नहीं आ रहा। यद्यपि जनता भी इस बात को समझ रही है कि पेट्रोल - डीजल का 85 फीसदी विदेशों से आता है जिसकी कीमतें खाड़ी युद्ध के कारण तेजी से न सिर्फ बढ़ीं अपितु ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग से आवाजाही रोककर उनकी आपूर्ति भी बाधित कर दी गई। तेल और गैस संयंत्रों पर हुए हमलों के कारण उत्पादन भी घट गया। ऐसे में इन हालातों से भारत का अछूता रहना असंभव था। युद्ध प्रारंभ होने के दो माह बाद केंद्र सरकार ने दाम बढ़ाने का सिलसिला शुरू किया जिसकी चौथी किश्त आज से लागू हो गई। अभी ये कहना कठिन है कि ये वृद्धि कहां जाकर रुकेगी क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाला कच्चा तेल परिवहन लागत कम होने से सस्ता पड़ता है जबकि अमेरिका, कैनेडा और वेनेजुएला से आयात में ज्यादा समय और खर्च लगता हैं। ऐसे में कीमतें बढ़ाने के वाजिब कारण तो हैं किंतु इसी के साथ ये सवाल उठता है कि जब रूस और ईरान से सस्ता तेल खरीदा गया तब उस उसका लाभ आम जनता को क्यों नहीं दिया गया? मौजूदा हालात में पेट्रोल - डीजल महंगा होना बेहद स्वाभाविक है। यहां तक कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद युद्धविराम होने पर भी मूल्य वृद्धि भले थम जाए लेकिन बढ़ी हुई कीमतें कम होने में कितना समय लगेगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि कच्चे तेल का उत्पादन और आपूर्ति युद्ध पूर्व जैसी स्थिति में आने में लंबा समय लगेगा। और ये भी कि तेल उत्पादक देश युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के लिए कीमतें गिरने नहीं देंगे। ऐसे में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और बढ़ें तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन सरकार चाहे तो वैश्विक बदलावों के अनुरूप पेट्रोल - डीजल की मूल्य वृद्धि करते हुए भी उन पर लगने वाले टेक्सों को स्थिर रखकर कुछ राहत तो दे ही सकती है। मसलन आज जो कीमतें बढ़ाई गईं उनमें राज्यों का टैक्स जोड़ने पर वह और अधिक हो गई। अतीत में कई बार ऐसा हुआ जब केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने - अपने हिस्से के टैक्स में कमी कर मूल्य वृद्धि के बोझ से आम उपभोक्ता को राहत दी। सरकार भी जानती है कि पेट्रोल - डीजल की मूल्य वृद्धि से परिवहन महंगा होने पर महंगाई बढ़ती है। ये देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे पेट्रोल - डीजल के दाम बढ़ने के बावजूद अपने टैक्स को यथावत रहने दें। यदि इस फॉर्मूले को अपनाया जाए तो जनता के कंधों पर मूल्य वृद्धि का बोझ अपेक्षाकृत कम पड़ेगा । वैसे होना तो ये चाहिए कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। वर्तमान में ज्यादातर राज्यों में भाजपा और उसके समर्थक दलों वाली राज्य सरकारें होने से जीएसटी काउंसिल में उक्त प्रस्ताव पारित करवाने में कोई रुकावट नहीं आएगी। वन नेशन वन टैक्स की व्यवस्था लागू करने और आपदा में अवसर तलाशने का यह उपयुक्त समय है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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