Saturday, 30 May 2026

जमानत अर्जी पर त्वरित फैसले जैसी व्यवस्था अन्य मामलों में भी हो


सर्वोच्च न्यायालय ने  जमानत आवेदनों और विचाराधीन कैदियों संबंधी फैसला सुनाते हुए निर्देशित  किया है कि देश की सभी अदालतों को जमानत आवेदनों पर आदर्श रूप से उसी दिन या अधिकतम अगले दिन तक निर्णय लेना अनिवार्य है। शीर्ष अदालत के  अनुसार जमानत नियम है जबकि कारावास अपवाद है। उक्त फैसले में विचाराधीन कैदियों की रिहाई को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा  मौलिक अधिकार  बताते हुए कहा कि यू.ए.पी.ए जैसे कठोर कानूनों में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है । इसलिए अदालतों को जमानत का आदेश उसी दिन या अगले दिन या फैसला सुरक्षित रखने की स्थिति में  3 महीने के भीतर सुनाना होगा। साथ ही जमानत मिल जाने पर उसकी जानकारी तुरंत जेल प्रशासन को भेजी जाना चाहिए ताकि आरोपी उसी दिन या अगले दिन रिहा हो सके। मानवाधिकारों और सभ्य समाज की दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का उक्त आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने ये निर्देश भी दिया कि अग्रिम जमानत के  लिए किसी व्यक्ति को आत्मसमर्पण हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता। कुछ दिनों पहले आतंकवाद से जुड़े कुछ लोगों को अनेक वर्षों से जेल में रखे जाने पर भी सर्वोच्च  न्यायालय ने टीका - टिप्पणी की थी। चूंकि गैर कानूनी गतिविधियों में जेल में बन्द लोगों की स्वतंत्रता को भी अदालत ने आवश्यक मान लिया ऐसे में देश भर की जेलों में बंद सैकड़ों विचाराधीन कैदियों की रिहाई का रास्ता खुल गया है जिनके विरुद्ध या  तो आरोप पत्र  पेश नहीं हुआ या फिर उस पर सुनवाई टलती आ रही है। उल्लेखनीय है फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के आरोपी के तौर पर यू.ए.पी.ए में गिरफ्तार शर्जील इमाम और उमर खालिद को लंबे समय से जेल में बंद रखे जाने पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमानत और त्वरित सुनवाई के अधिकार पर पर विचार करते हुए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया। 6 साल से जेल की हवा खा रहे उक्त दोनों की जमानत अर्जियां निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई मर्तबा इस आधार पर रद्द कर दिया कि प्रथम दृष्टया आरोप संगीन है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले में  उन लोगों के लिए तो राहत की खबर है जो जमानत अर्जी की सुनवाई न होने से या तो जेल में हैं या फरार रहने बाध्य हो गए हैं। न्यायिक हिरासत के कारण जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो जमानत के लिए वकील का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। गौरतलब है एक अर्जी नामंजूर हो जाने के बाद व्यक्ति ऊंची अदालत में आवेदन करे तो फ़िर मोटी फीस वकील साहब को देनी होती है। किसी आपराधिक प्रकरण में गिरफ्तारी के भय से अग्रिम जमानत हेतु आवेदन लगाना भी बेहद खर्चीला है। जिसके रद्द होने पर व्यक्ति छिपा फिरता है। कुल मिलाकर जमानत का पूरा मामला बेहद पेचीदा है और साधारण आर्थिक हैसियत वाले के लिए तो आसमान से तारे तोड़ने जैसा। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भित फैसला स्वागतयोग्य है।  लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का ये कहना कुछ मामलों में समस्या भी खड़ी कर सकता है कि आतंकवाद जैसे खतरनाक अपराधों में बंद आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी सर्वोपरि है। प्रश्न ये है कि शर्जील इमाम और उमर खालिद जैसे लोगों को जमानत मिलना क्या कानून - व्यवस्था के लिए खतरा नहीं होगा? यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे लोगों के बारे में उदारता दिखाते समय देश की एकता ओर अखंडता की रक्षा के प्रति लापरवाह नहीं हो सकता किन्तु इस फैसले से निचले स्तर की अदालतों पर जमानत अर्जी  मंजूर करने में जल्दबाजी का दबाव आने का खतरा पैदा हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय अतीत में जमानत देने में आनाकानी के लिए निचली अदालतों की आलोचना कर चुका है। ये फैसला उसी से प्रभावित है जिसमें फायदे और नुकसान दोनों ही हैं क्योंकि न्यायाधीश भी मनुष्य होते हैं और सभी की सोच और योग्यता एक समान हो ये जरूरी नहीं है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की ये बात सही है कि जमानत जैसे गंभीर विषय में सुनवाई के बाद फैसला सुनाने के लिए निश्चित समय सीमा होनी चाहिए। साथ ही ये भी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी हर किसी को है। लेकिन इस फैसले के परिप्रेक्ष्य में ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि केवल जमानत अर्जी पर ही त्वरित फैसले करने की बंदिश लगाने वाला सर्वोच्च न्यायालय  सामान्य न्याय प्रक्रिया में होने वाले विलम्ब को खत्म करने के बारे में ऐसा ही निर्देश कब देगा ? शीर्ष अदालत में विराजमान माननीय न्यायमूर्तियों को ये बताने की जरूरत नहीं है कि लम्बी और मंहगी न्यायिक प्रक्रिया के कारण आम नागरिक के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और सम्मान लगातार घटता जा रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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