लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष की आलोचना अस्वाभाविक नहीं होती। सरकार की गलतियों को उजागर करना उसका कर्तव्य माना जाता है। सत्ता पक्ष को जहां मतदाता देश चलाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं वहीं विपक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वह जनता की तकलीफों को सत्ता पक्ष की जानकारी में लाते हुए उन्हें दूर करने के लिए सुझाव दे। भारत में ये परम्परा शुरुआत से ही कायम रही। जब कांग्रेस के पास विशाल बहुमत होता था , तब भी संसद में मुट्ठी भर विपक्षी सांसद नेहरू सरकार को जमकर घेर लेते थे। इंदिरा जी के शासन में भी कम संख्याबल के बावजूद विपक्ष ने हमलावर रवैया जारी रखा। उनकी हत्या के पश्चात राजीव गांधी को ऐतिहासिक बहुमत तो मिल गया किंतु विपक्षी घेराबंदी के चलते वे महज पांच साल बाद अलोकप्रिय होकर सत्ता से हाथ गंवा बैठे और 1991 में आज ही के दिन तमिलनाडु में श्रीलंका के आतंकवादी संगठन लिट्टे ने उनकी हत्या करवा दी। धीरे - धीरे विपक्ष संसद में ताकतवर होता गया और मिली - जुली सरकारों का दौर आया जो 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर रुका। यद्यपि 2024 में बहुमत से पीछे रहने के बाद श्री मोदी को भी मिली - जुली सरकार चलानी पड़ रही है किंतु उनकी शख्सियत इतनी बड़ी है कि सहयोगी दल भी दबाव डालने से बचते हैं। और फिर लोकसभा के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और एनडीए के शानदार प्रदर्शन से केंद्र सरकार के स्थायित्व को लेकर व्यक्त की जाने वाली आशंकाएं अपनी मौत मरती गईं । विशेष रूप से महाराष्ट्र, बिहार और प. बंगाल में भाजपा ने जिस धमाकेदार अंदाज में वापसी की उसके कारण विपक्ष की दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। प्रधानमंत्री की हालिया विदेश यात्रा को लेकर जिस तरह के तंज कसे जा रहे हैं उनसे इसकी पुष्टि हो जाती है। सबसे पहले कहा गया कि जनता को पेट्रोल - डीजल का खर्च घटाने और एक वर्ष तक विदेशों में सैर - सपाटा टालने की नसीहत देने के बाद वे खुद कई देशों की यात्रा पर निकल गए। उसके बाद नॉर्वे की एक महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने पर प्रधानमंत्री के चिरपरिचित विरोधी उनको घेरते हुए भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे का ढोल पीटा जाने लगा। और फिर इटली की प्रधानमंत्री को टॉफी देने वाले चित्र पर हल्ला मचा। ध्यान देने योग्य बात ये है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे आनन - फानन में तय नहीं होते। महीनों पूर्व अधिकारी स्तर पर इसकी तैयारी होती है जिसमें बातचीत के मुद्दे और समझौतों का प्रारूप तैयार किया जाता है। उस दृष्टि से देखें तो यूएई से प्रारंभ और इटली में संपन्न अपनी यात्रा के दौरान श्री मोदी ने जो समझौते हस्ताक्षरित किये यदि वे देश हित के विरुद्ध हों तब विपक्ष को आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस मामले में वह खाली हाथ है। जहां तक बात नॉर्वे की महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने की तो न सिर्फ विपक्ष अपितु मोदी विरोधी गैंग के रूप में कुख्यात हो चुके यू ट्यूबर इस मुद्दे पर बिना सच्चाई जाने प्रधानमंत्री पर हमलावर हो गए। लेकिन जल्द ही उन्हें शर्मसार होना पड़ा जब उक्त महिला पत्रकार की बेहूदगी का पर्दाफाश हो गया। जिस अवसर पर उसने श्री मोदी से सवाल पूछा उसमें पत्रकारों से चर्चा का कार्यक्रम नहीं था। बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने पत्रकार वार्ता में उस महिला पत्रकार को प्रश्न पूछने का अवसर देते हुए उसका उत्तर देने की पेशकश की तब वह उठकर चली गई। अब उसके अपने देश में हुई उसकी जमकर किरकिरी हो रही है और भारत में प्रधानमंत्री को मीडिया विरोधी और प्रेस की आजादी को खतरे में बताने वाले मुंह छिपाते फिर रहे हैं। यही स्थिति इटली की प्रधानमंत्री के साथ उनके चित्र के बारे में है। जिसे लेकर अनर्गल टिप्पणियां की जा रही हैं। गत दिवस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री के प्रति गद्दार शब्द का प्रयोग कर एक बार साबित कर दिया कि आयु की आधी शताब्दी पार करने के बाद भी वे परिपक्वता के कोसों दूर हैं। कांग्रेस की वर्तमान दुरावस्था के लिए उनका यही गैर जिम्मेदाराना आचरण जिम्मेदार है। यदि उनमें तनिक भी साहस है तो वे अपनी गोपनीय विदेश यात्राओं का ब्यौरा देश के सामने रखें। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का तो पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है किंतु कैबिनेट मंत्री का दर्जा और उच्च स्तरीय सुरक्षा प्राप्त श्री गांधी की चंद विदेश यात्राओं को छोड़कर ज्यादातर पूरी तरह गोपनीय क्यों रहती हैं इसका खुलासा भी उन्हें करना चाहिए। लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उससे बहुत सारी वे बातें सामने आ जाएंगी जिन पर पर्दा पड़ा हुआ है। ऐसा लगता है प. बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष और माेदी विरोधी गिरोह को बर्दाश्त नहीं हो रही।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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