ट्रम्प को चिढ़ाने और डराने वाली है पुतिन की चीन यात्रा
कूटनीति कभी न रुकने वाली प्रक्रिया है। दुनिया में चाहे युद्ध हो रहा हो या शांति सबके मूल में कूटनीति ही होती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो वैचारिक गुटों में बंट गई थी जिनमें पूंजीवाद समर्थक देश अमेरिका और साम्यवादी शासन व्यवस्था वाले सोवियत संघ के नेतृत्व में एकजुट हो गए। हालांकि एक तीसरा धड़ा भी बना जिसे गुट निरपेक्ष आंदोलन कहा गया जिसकी शुरुआत भारत, इंडोनेशिया , घाना , युगोस्लाविया और मिस्र ने की और कालान्तर में 100 से ज्यादा देश इसमें शामिल हो गए। इस धड़े ने अपने को अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चले शीतयुद्ध से दूर रखा। यद्यपि इसमें शामिल देशों को दोनों महाशक्तियों से संबंध रखने की छूट थी किंतु आश्चर्य की बात है कि युगोस्लाविया साम्यवादी देश होने के बावजूद उसके नेता मार्शल टीटो सोवियत संघ से दूरी बनाए रखते थे जबकि भारत और अमेरिका के रिश्ते सदैव अविश्वास में उलझे रहे। 1949 में चीन में भी साम्यवादी क्रान्ति होने के बाद माओ त्से तुंग वैश्विक परिदृश्य पर क्रांति के प्रतीक बनकर उभरे। लेकिन उन्होंने भी सोवियत संघ के आधिपत्य को स्वीकार करने के बजाय अपना अलग रास्ता चुना। 1972 तक चीन दुनिया से अलग - थलग माओ द्वारा बनाए गए लौह आवरण में सिमटा रहा। उसे संरासंघ की सदस्यता से भी वंचित रखा गया किंतु 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन की यात्रा पर जा पहुंचे और अनेक समझौते करते हुए व्यापार के अलावा सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान - प्रदान के दरवाजे खोल दिए। स्मरणीय है 1971 में साम्यवादी चीन को संरासंघ की सदस्यता के साथ ही सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार भी मिल चुका था जो उसके पहले तक ताईवान के पास रहा। उसके बाद से चीन वैश्विक राजनीति और व्यापार की मुख्यधारा में शामिल होने लगा और देखते ही देखते वह अमेरिका के बाद सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ ही सैन्य क्षमता और तकनीकी ज्ञान में दुनिया से आगे निकलने लगा। साम्यवादी विचारधारा उसकी एकदलीय शासन प्रणाली में तो परिलक्षित होती है किंतु शी जिनपिंग का चीन , माओ त्से तुंग और चाऊ एन लाई के दौर से बहुत आगे आकर पूंजी आधारित आर्थिक विकास की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलता दिखता है। दुनिया भर में उसने निवेश कर रखा है। अमेरिका जैसे संपन्न देश में भी चीनी पूंजी का दबदबा है। यही वजह है कि कभी अफीमचियों के लिए बदनाम चीन आज विकास का जीवंत प्रतीक बन चुका है। हालांकि विस्तारवाद और कुटिलता जैसे अपने मूल स्वभाव को उसने नहीं छोड़ा और इसलिए ज्यादातर पड़ोसी देश उसके प्रति सदैव सशंकित रहते हैं। बावजूद इसके चीन वैश्विक राजनीति और व्यापार के क्षेत्र में बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरा है। इसका ताजा प्रमाण है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गत सप्ताह चीन की यात्रा की। यद्यपि ट्रम्प जो सोचकर गए थे वैसा कुछ भी नहीं हुआ। न तो चीन ने उनके व्यापार प्रस्तावों को भाव दिया और न ही ईरान युद्ध रुकवाने में सहायता का आश्वासन । उलटे ताईवान पर कब्जा करने की अपनी मंशा व्यक्त करते हुए ट्रम्प को आगाह कर दिया कि वे इस मसले से दूर ही रहें। पूरी दुनिया में ये बात फैल चुकी है कि जिनपिंग ने ट्रम्प को खाली हाथ लौटने मजबूर कर विश्व राजनीति में चीन के दबदबे को कायम रखा। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। ट्रम्प के बीजिंग से जाने के कुछ दिन बाद ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन चीन जा पहुंचे। हालांकि उसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच हुई सहयोग और संधि की रजत जयंती का आयोजन है । लेकिन सच्चाई ये है कि पुतिन की यह बीजिंग यात्रा दरअसल अमेरिका के विरुद्ध मोर्चेबंदी को मजबूत करने के लिए हो रही है। उल्लेखनीय है यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में उसके समर्थक देशों ने रूस पर प्रतिबंध थोप दिए तब चीन और भारत ने तटस्थ रहकर पुतिन का हौसला बढ़ाया। और बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर रूस की अर्थव्यवस्था को टेका लगाए रखा। प . एशिया में चल रहे युद्ध में चीन और रूस खुलकर ईरान के साथ हैं। वहीं भारत ने भी अपने हितों के अनुरूप संतुलित नीति अपना रखी है। अब जबकि ट्रम्प इस युद्ध में बुरी तरह उलझ चुके हैं तब चीन और रूस का एक साथ आना किसी बड़ी कूटनीतिक पहल का संकेत है। गौरतलब है कि ये दोनों ब्रिक्स नामक संगठन के संस्थापक सदस्य हैं जिसकी अध्यक्षता इस साल भारत के पास है। सितम्बर में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के लिए पुतिन भारत आने वाले हैं। इस प्रकार ट्रम्प के बीजिंग से लौटते ही पुतिन का वहां पहुंचना महज औपचारिक उपस्थिति न होकर बड़ा कूटनीतिक दांव है जिसका उद्देश्य ट्रम्प को चिढ़ाने के साथ ही डराना भी है। उल्लेखनीय है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अनेक देशों की ताबड़तोड़ यात्रा करके अमेरिका को संकेत दे दिया है कि दुनिया अब उसके इशारों पर चलने वाली नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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