प. एशिया में चल रही जंग अब दिशाहीन होती जा रही है। अमेरिका और इसराइल की ये सोच पूरी तरह गलत साबित हुई कि वे ईरान को कुछ ही दिनों में घुटनाटेक करवा लेंगे। शुरुआत में ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई को मारने में कामयाब होने से उनका हौसला काफी बुलंद हुआ था। लेकिन ईरान के जवाबी हमलों ने सारे समीकरण उलट दिए। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उसने अमेरिकी युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों के अलावा इज़राइल को ही निशाना नहीं बनाया अपितु सऊदी अरब, ओमान, कतर और यू.ए.ई पर भी मिसाइलें दाग दीं क्योंकि इनमें अमेरिकी सैन्य अड्डों के अलावा पश्चिमी देशों का काफी पूंजी निवेश हैं। इसी के साथ ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग को बंद कर दिया। परिणामस्वरूप युद्ध का क्षेत्र तो फैला ही पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की किल्लत होने लगी। इसीलिए इस लड़ाई को दूर से देख रहे देशों के हित भी इससे जुड़ गए। ईरान भी समझ गया कि इस लड़ाई में पूरी तरह जीतना तो संभव नहीं है अतः उसने होर्मुज को बतौर ट्रम्प कार्ड उपयोग करते हुए पूरे युद्ध को नया मोड़ दे दिया। इसका असर ये हुआ कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के बजाय अमेरिका की चिंता होर्मुज पर आकर अटक गई। ईरान ने उससे गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने का फैसला करने के साथ कुछ चुनिन्दा देशों को ही उसकी अनुमति दी। इससे अमेरिका भन्ना गया और उसने वहां अपने युद्धपोत तैनात कर ये संकेत दिया कि वह इस समुद्री मार्ग पर ईरान का आधिपत्य खत्म कर देगा। साथ ही टोल चुकाकर आने वाले जलपोतों पर कार्रवाई की धमकी दे डाली। पाकिस्तान की मध्यस्थता में आयोजित ईरान - अमेरिका की शान्ति वार्ता भी विफल हो गई। हालांकि कहने को तो युद्धविराम चल रहा है लेकिन एक तरफ जहां इसराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखे हैं वहीं दूसरी तरफ ईरान भी कभी ओमान तो कभी यू.ए.ई पर बारूदी वर्षा करने बाज नहीं आ रहा। इसी के साथ खाड़ी के ज्यादातर देशों ने हथियारों की खरीददारी बढ़ाकर युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका को बढ़ावा दिया है। एक बात और भी उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के हजारों सैनिक किराए पर लेने के साथ ही लड़ाकू विमान भी अपने यहां तैनात करवाए हैं। दरअसल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच ये संधि हुई है कि किसी एक पर हमला दोनों पर माना जाएगा। मौजूदा जंग में ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब को काफी नुकसान पहुंचाया है। उस दृष्टि से तो पाकिस्तानी सेना और लड़ाकू विमानों की सऊदी अरब में तैनाती स्वाभाविक है। लेकिन इसमें एक विरोधाभास ये भी है कि एक तरफ तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख ईरान और अमेरिका के बीच समझौता करवाने के लिए हाथ - पांव मारते हुए दोनों ओर के शांति प्रस्तावों को इधर से उधर पहुंचाने की मशक्कत में जुटे हुए हैं और दूसरी तरफ वह सऊदी अरब को अपने सैनिकों और लड़ाकू विमानों की सेवाएं देकर ईरान के विरोधी पाले में खड़ा हो गए। हालांकि शांति वार्ता का मंच सजाकर खुद को कूटनीति का उस्ताद समझने वाले पाकिस्तान को ईरान और अमेरिका दोनों फटकार लगाते रहते हैं। मौजूदा स्थिति में ईरान और अमेरिका दोनों के बीच समझौते की गाड़ी कहां तक पहुंची ये कोई नहीं बता सकता किंतु इस उहापोह के कारण पूरी दुनिया हलाकान है। पेट्रोल - डीजल और गैस के बिना आज के जीवन की कल्पना असंभव है। युद्ध की शुरुआत में सभी को लगा कि हफ्ते दो हफ्ते में ये जंग रुक जाएगी लेकिन तीन महीने के बाद भी इस मसले का कोई हल दूरदराज तक नजर नहीं आ रहा। हालांकि सही बात ये भी है कि ईरान और अमेरिका दोनों को ये समझ नहीं आ रहा कि सम्मानजनक तरीके से कैसे अपनी गर्दन निकालें। डोनाल्ड ट्रम्प थोड़ा ठण्डे पड़ते हैं तो सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देश उन पर दबाव डालते हैं कि ईरान को घायल छोड़कर न जाएं। ताजा खबर ये है कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और ट्रम्प के बीच भी तनातनी हो गई है। आज किसी की समझ में ये नहीं आ रहा कि इस जंग को खत्म कैसे करें क्योंकि दोनों पक्ष अपने को पराजित मानने के लिए तैयार नहीं हैं। साथ ये भी अनुभव हो रहा है कि जंग की शुरुआत जिस भी उद्देश्य से हुई हो किंतु अब वह उद्देश्यविहीन होकर रह गई है। अमेरिका और इसराइल यदि ईरान को झुकाने में सफल नहीं हुए तो ईरान भी अपनी बर्बादी को रोकने में नाकामयाब हुआ। दुर्भाग्य से संरासंघ पूरी तरह नकारा हो गया है। भले ही इसे विश्व युद्ध न कहा जाए लेकिन इसके कारण पूरा विश्व परेशान हो उठा है। आज की स्थिति में ये युद्ध कहां जाकर रुकेगा कहना मुश्किल है किंतु कोरोना महामारी से किसी तरह उबर रही दुनिया उससे भी बड़े संकट में फंस गई है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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