Friday, 29 May 2026

नक्सलियों के सफाए के बाद अब घुसपैठियों पर अमित शाह की नजर


केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने  कहा है कि  ममता बनर्जी  के शासन में रोजाना घुसपैठ होती थी, लेकिन अब डर के मारे घुसपैठिए खुद वापस लौटने लगे हैं।  गृहमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा ,वे खुद  चले जाते हैं, तो  सरकार उन पर कोई केस नहीं करेगी और लौटने में  पूरी मदद भी करेगी। उन्होंने आशा व्यक्त की  कि घुसपैठियों की पहचान का अभियान शुरू होने से पहले ही वे  लौट जाएंगे। उनकी अपील ऐसे समय आई जब प. बंगाल ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में बसे बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस लौटने के लिए प. बंगाल आकर सीमा पर जमा हो रहे हैं। शुभेंदु सरकार ने डिटेक्ट , डिटेन ,और डिपोर्ट  जैसी घोषणा कर जो आक्रामक रवैया अपनाया उससे घुसपैठियों में दहशत फैलने लगी।  वस्तुतः ममता बैनर्जी की सरकार ने न तो घुसपैठियों को आने से रोकने के लिए कोई योजना बनाई और न ही उन्हें वापस भेजने का साहस दिखाया।  उससे भी बड़ी चिंता का कारण ये है कि उनके राशन और आधार कार्ड बनने के अलावा मतदाता सूचियों में नाम भी दर्ज हो गए। इसीलिये विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने एस.आई.आर की प्रक्रिया प्रारंभ की तब ममता बैनर्जी ने अड़ंगे लगाने का हरसंभव प्रयास किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। लाखों नाम मतदाता सूचियों से इसलिए अलग हुए क्योंकि  वे  जरूरी दस्तावेज नहीं दे सके। तृणमूल कांग्रेस को जीत का जो आत्मविश्वास था उसका कारण मुस्लिम मतदाताओं के साथ ही  घुसपैठिये भी रहे।  मतदाता सूची से बाहर होने वाले घुसपैठियों को उम्मीद थी कि ममता सरकार ही लौटकर आएगी इसलिए  वे निश्चिंत बैठे रहे। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया । भाजपा ने सत्ता में आते ही जो तेवर दिखाये उनसे उनको ये महसूस होने लगा कि डिटेंशन (हिरासत) में आने के बजाय बेहतर होगा वापस अपने मुल्क लौटा जाए। चौंकाने वाली बात ये है कि न सिर्फ़ प. बंगाल वरन दक्षिणी राज्यों में कार्यरत घुसपैठिए भी बांग्लादेश लौटने के लिए आने लगे। हाल ही में मुख्यमंत्री श्री अधिकारी ने ये कहकर हलचल मचा दी कि ममता सरकार जिन करोड़ों महिलाओं को प्रतिमाह 1500 रुपए दे रही थी उनमें 30 लाख बांग्लादेशी महिलाएं भी हैं। इसीलिए राज्य सरकार ने महिलाओं को 3 हजार रुपए हर महीने देने संबंधी  वायदे को पूरा करने के पहले  लाभार्थियों की नई सूची तैयार करने का फैसला किया। इसके अलावा भी मुफ्त राशन एवं अन्य  सुविधाओं का लाभ घुसपैठियों को पिछली सरकार दे रही होगी। सवाल ये है कि ममता बैनर्जी जैसी वरिष्ट नेत्री को इन घुसपैठियों को संरक्षण देने की क्या जरूरत पड़ गई? स्मरणीय है बांग्लादेश से घुसपैठियों का  आना वामपंथी सरकार के कार्यकाल में भी जारी रहा। प. बंगाल की जनता ने उस सरकार से नाराज होकर ही ममता बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु उनके राज में तो प. बंगाल घुसपैठियों का स्वर्ग बन गया। यहां की राजनीति में मुस्लिम वर्चस्व का कारण ये घुसपैठिए ही रहे। चूंकि भाजपा ने घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया इसीलिए हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हुआ। दरअसल ममता राज में घुसपैठियों के आतंक से हिंदुओं में भय व्याप्त था। चूंकि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी तुष्टीकरण करती रहीं इसलिए जब भाजपा ने घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई का वायदा किया तो जनता ने  उसको जबरदस्त समर्थन देकर सत्ता सौंप दी। मुख्यमंत्री श्री अधिकारी की प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने बिना देर लगाए घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए ठोस कदम उठाए जिनका असर दिखने भी लगा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर में सीमा पर कंटीले तार की बाड़ लगाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा मांगी जमीन देने का फैसला भी घुसपैठ रोकने की दिशा में बड़ा कदम है। ममता सरकार बरसों से इस मामले को दबाकर बैठी थी। प. बंगाल में घुसपैठियों के विरुद्ध चल रही कार्रवाई राष्ट्रीय स्तर पर की जानी चाहिए क्योंकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या दोनों ही घुसपैठिए मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ मिलकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं। बीते कुछ वर्षों में हुईं अनेक आतंकवादी वारदातों के तार बांग्लादेश से जुड़े पाये जाने से इसकी पुष्टि हो चुकी है। गृह मंत्री अमित शाह  नक्सलवादियों के आतंक का खात्मा कर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दे चुके हैं । उनकी ताजा चेतावनी के बाद ये उम्मीद की जा सकती है कि देश इन घुसपैठियों द्वारा उत्पन्न समस्या से भी मुक्त हो जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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