Wednesday, 1 April 2026

कठिन चुनौतियों के बीच शुरू हो रहा वित्तीय वर्ष


आज से भारत में नया वित्तीय वर्ष प्रारंभ हो रहा है। बीते साल की तीन तिमाही में अच्छे प्रदर्शन से वार्षिक विकास दर 7 प्रतिशत रहने की उम्मीद व्यक्त  की गई थी। वहीं अगले वर्ष में उसके और उछलने का अनुमान था। हालांकि  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा थोपे गए टैरिफ के कारण निर्यात पर बुरा असर पड़ा किंतु सरकार  वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर उस दबाव को कम करने में कामयाब रही। इसीलिए जहां अनेक देशों के कदम लड़खड़ाने लगे वहीं भारत ने  मजबूती से  खड़े रहकर ब्रिटेन , यूरोपीय यूनियन , न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार संधि कर अपने निर्यात को बहुमुखी बना दिया। सबसे बड़ी चतुराई ये रही कि ट्रम्प की बेसिरपैर की बातों में उलझने से बचते हुए उसकी काट निकालकर देशहित को सुरक्षित रखा गया। हालांकि  अनुमानित विकास दर का आंकड़ा थोड़ा नीचे आया किंतु  वैश्विक परिस्थितियों में उसे काफी अच्छा माना गया। लेकिन बीती 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला बोल दिया। अमेरिका मान रहा था कि ईरान जल्द ही घुटने टेक देगा। पहले ही हमले में उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई के अलावा कुछ दिग्गज सैन्य अधिकारियों के मारे जाने से ये लगा कि वहां सत्ता परिवर्तन करवाने की  उसकी योजना सफल हो जाएगी । लेकिन  पांसे उल्टे पड़ गए। ईरान ने आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा है के सिद्धांत पर चलते हुए इजराइल पर तो मिसाइलें बरसाई हीं  उन तमाम पड़ोसी देशों पर भी हमले किए जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। यही नहीं अमेरिका के बेहद अत्यधिक शक्तिशाली कहे जाने वाले युद्धपोतों को निशाना बनाने से भी बाज नहीं आया। इसकी वजह से तेल उत्पादक देशों में उत्पादन थम गया।  उससे भी बड़ी समस्या तब उठ खड़ी हुई जब ईरान ने अपने कब्जे वाले होर्मुज़  नामक समुद्री रास्ते से आवाजाही रोक दी। जिससे सऊदी अरब , कतर , बहरीन , ओमान आदि से आने वाले  तेल और गैस के टैंकर फंस गए। नतीजा पूरी दुनिया में इन चीजों के संकट के रूप में सामने आया। इसका विपरीत प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा और बीते कारोबारी साल का उत्साहजनक वातावरण साल खत्म होते तक चिंताओं में बदल गया। पेट्रोल , डीजल और गैस के संकट ने न सिर्फ आम नागरिक के जनजीवन को झकझोर दिया बल्कि उद्योग  - व्यवसाय के सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े कर दिए।  हजारों कारखाने बंद हो गए। गैस की किल्लत से बड़े होटल, रेस्टोरेंट , ढाबे ही नहीं ठेले और खोमचे पर चाय सहित अन्य खाद्य सामग्री बेचने वालों तक का कारोबार ठप पड़ गया। शहरों से श्रमिकों के पलायन की खबरें आने लगीं। विदेशी पूंजी बड़ी मात्रा में वापस जाने से विदेशी मुद्रा  भंडार घटने लगा। ईरान  युद्ध के थमने की फिलहाल कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कल कह दिया कि ईरान की परमाणु क्षमता को नष्ट करने के साथ ही उसके तेल और गैस उत्पादन इकाइयों को नुकसान पहुंचाकर उसने तो अपना मकसद पूरा कर लिया। अब जिसे होर्मुज का उपयोग करना हो वह अपने स्तर पर प्रयास करे। दरअसल ट्रम्प इस बात पर उखड़ गए कि नाटो से जुड़े ज्यादातर यूरोपीय देशों ने अमेरिकी युद्धक विमानों को अपने आकाश से उड़ने की अनुमति नहीं दी। आज यू.ए.ई ने जरूर होर्मुज़ खुलवाने के लिए लड़ाई में शामिल होने की इच्छा जताई। सऊदी अरब भी अमेरिका से अनुरोध कर चुका है कि वह ईरान को घायल करके न छोड़े। इसके जवाब में ट्रम्प ने युद्ध का खर्च खाड़ी देशों से वसूलने का ऐलान कर दिया। कुल मिलाकर जंग अभी कुछ हफ्ते और जारी रहने की उम्मीद है। जिसके परिणाम लंबे समय तक दुनिया को भुगतने होंगे। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता। विश्व व्यापार में उसकी जो मजबूत स्थिति बनती जा रही थी उस पर बुरा असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि युद्ध जल्दी रुक जाता है तब भारत को मध्यपूर्व में निर्माण गतिविधियों के जरिए अच्छा व्यवसाय मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी जैसा अफगानिस्तान में देखने मिला किंतु ईरान अपने यदि होर्मुज़  को लेकर अड़ियलपन दिखाता रहा तब तेल और गैस की कीमतों में उछाल को रोकना मुश्किल हो जाएगा जिसका असर  अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। ये देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए वह अभी से संभावित संकट का सामना करने की रणनीति बनाकर ऐसे उपाय करे जिससे उद्योग - व्यापार में रुकावट न आए। साथ ही आम जनता को भी तकलीफ न हो। विश्वव्यापी संकट से भारत का बचे रहना तो नामुमकिन है किंतु समय रहते तैयारी कर ली जाए तो नुकसान को कम तो किया ही जा सकता है। नेतृत्व की परीक्षा भी ऐसे ही समय होती है। मोदी सरकार ने कोरोना संकट के समय जो कार्यकुशलता दिखाई वैसा ही कुछ करते हुए इस आपदा में भी अवसर तलाशने का कारनामा दिखाना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी