Saturday, 17 February 2018

ये काम तो संसद को करना चाहिए था

सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों के साथ-साथ  उनकी पत्नी और आश्रितों की आय का स्रोत बताने की अनिवार्यता सम्बन्धी जो आदेश गत दिवस जारी किया वह चुनाव सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । अभी तक केवल धन संपत्ति का ब्यौरा देना होता था। सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि उम्मीदवार द्वारा नामांकन पत्र भरते  समय अपनी चल , अचल सम्पत्ति , नगदी , जेवरात , पूंजीगत निवेश एवं कर्ज की जानकारी तो दी जाती है किन्तु उससे ये पता नहीं चल पाता कि उसकी कमाई के रास्ते कौन से हैं ? पत्नी और आश्रितों की भारी-भरकम आय के बारे में भी मतदाता अनजान बना रहता है । न्यायालय ने ये बताने भी कहा है कि चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशी और उसकी पत्नी तथा बच्चों को कोई सरकारी ठेका तो नहीं मिला । हालांकि न्यायालय ने जनप्रतिनिधियों की बेतहाशा बढ़ती सम्पत्ति की जांच की जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी क्योंकि उसके मुताबिक इसके लिए ठोस सरकारी तंत्र की आवश्यकता पड़ती है लेकिन नई व्यवस्था से ये तो पता चल ही सकेगा कि प्रत्याशी और उसके परिजनों की कमाई का जरिया क्या है ? सर्वोच्च न्यायालय किश्तों में ही सही लेकिन चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और प्रामाणिक बनाने की कोशिशें करता रहता है। उसका ताजा आदेश उसी दिशा में की गई कोशिश है । यद्यपि हमारे देश की राजनीतिक बिरादरी हम डाल-डाल , तुम पात-पात की कहावत चरितार्थ करती रहती है । टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते चुनाव को कम खर्चीला और साफ-सुथरा बनाने की असरकारी कोशिश हुई थी । उसका जनमानस पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ा । उनके बाद आए आयुक्त भी  चुनाव सुधारों के लिए लगातार प्रयासरत रहे । चुनाव खर्च का हिसाब भी नियमित देने की बंदिश से भी काफी फर्क पड़ा है । मोदी सरकार ने चुनाव बांड के जरिये चंदा देने की जो व्यवस्था की उसके पीछे भी निर्वाचन प्रक्रिया को भ्रष्टाचारमुक्त बनाने का उद्देश्य ही है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने धन- संपत्ति का विवरण बताने के साथ-साथ आय के स्रोत उजागर करने सम्बन्धी जो व्यवस्था गत दिवस दी उससे चुनाव आयोग को और ताकत मिल गई । बात काफी हद तक उचित भी है कि चुनाव लडऩे वाले नेताओं की संपन्नता तो अब तक सामने आ जाती थी किन्तु उनकी कमाई किस -किस रास्ते से होती है ये आम मतदाता नहीं जान पाता। संसद और विधानसभाओं में ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिनिधि बहुत होते हैं । उनकी आय कृषि आधारित होने से कर मुक्त होती है लेकिन शहरों में स्थायी रूप से रह रहे तमाम नेतागण भी अपनी काली कमाई पर पर्दा डालने के लिए  किसान बन बैठते हैं । उनके कथित खेतों की पैदावार मेहनतकश किसान से कई गुना ज्यादा होना भी काफी कुछ कह जाता है । इसीलिए किसी नेतानुमा किसान के कर्ज में डूबकर आत्महत्या करने की घटना शायद ही सुनी गई हो । इसके अलावा पत्नी और आश्रित परिजनों को ऐसे व्यवसायों में हिस्सेदार बताया जाता है जिसमें उनकी सक्रिय भूमिका होती ही नहीं । हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेटे की कमाई में अकल्पनीय वृद्धि की खबर पर राजनीतिक क्षेत्र में बहुत बवाल मचा था । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव में उसे जमकर उछाला भी था । अन्य नेता पुत्र-पुत्रियों के व्यावसायिक कौशल की कहानियां भी अक्सर सुनने में आती रहती हैं। अपने पिता की छत्रछाया में रहने वाली औलादों को जब अपना रोजगार करते बताया जाता है तब हंसी आती है । सर्वोच्च न्यायालय  ने जो व्यवस्था दी वह कितनी कारगर होगी ये तो आगामी चुनाव बताएंगे  लेकिन इतना जरूर होगा कि अब राजनीतिक नेताओं के परिजनों की कमाई के तौर तरीके और संसाधनों पर भी समाचार माध्यमों के साथ जागरुक मतदाताओं की नजर रहेगी। वैसे जो काम सर्वोच्च न्यायालय  ने किया वह दरअसल चुनाव आयोग अथवा संसद से अपेक्षित था किन्तु अपने अधिकारों और सुख-सुविधा के लिए सदैव सतर्क रहने वाली राजनीतिक बिरादरी को ऐसी बातों में कोई भी रुचि नहीं रहती जिसमें उनकी असलियत जनता के समक्ष अनावृत्त हो । सर्वोच्च न्यायालय  ने तो अपने कर्तव्य का समुचित निर्वहन कर दिया अब देखना ये है कि चुनाव आयोग कब और कैसे इसे लागू करता है और ये भी कि राजनीतिक दल इस व्यवस्था से कितने सहमत हो पाते हैं क्योंकि अतीत में जितनी व्यवस्थाएं चुनाव सुधार हेतु की गईं उनकी तोड़ नेताओं ने निकाल ली। चुनाव खर्च की जो सीमा लोकसभा और विधानसभा के लिए निर्धारित की गई उससे ज्यादा तो  कई प्रत्याशी स्थानीय निकायों के चुनाव में लुटा देते हैं। फिर भी ये मानकर चला जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रत्याशियों और परिजनों की आय के स्रोत घोषित करने सम्बन्धी जो आदेश दिया वह समयानुकूल तो है ही जन आकांक्षाओं के भी अनुरूप है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

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