Wednesday, 8 July 2026

सैन्य महाशक्ति बनने की दिशा में एक और कदम




भारत केवल सोने और कच्चे तेल का ही सबसे बड़ा आयातक नहीं बल्कि विदेशी हथियारों के सबसे बड़े खरीददारों में से भी है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन  स्वीडन और इजराइल आदि देशों से हम अस्त्र - शस्त्र, खरीदते रहे हैं।  तोप, लड़ाकू विमान, पनडुब्बी आदि का निर्माण भारत में होने के बावजूद उनमें लगने वाले कल - पुर्जों के लिए विदेशों पर निर्भरता खत्म नहीं हो सकी ।  इस वजह से इनके उत्पादन में विलंब होता आया है। मोदी सरकार ने इसीलिए टेक्नालाजी ट्रांसफर पर जोर देना शुरू किया जिसके अनुकूल परिणाम भी मिलने लगे हैं। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र को सरकारी एकाधिकार से निकालकर  निजी क्षेत्र को उसमें हिस्सेदारी देने जैसा बहुप्रतीक्षित और साहसिक कदम भी उठाया गया है । यद्यपि निजीकरण के विरोध के नाम पर इस फैसले पर भी उंगलियाँ उठीं। विशेष रूप से ये आपत्ति की गई कि निजी उद्योगों को रक्षा उत्पादन का समुचित तजुर्बा नहीं है। लेकिन बीते कुछ सालों में जो अनुभव आया उसने सरकार के निर्णय के औचित्य पर मुहर लगाते हुए आलोचकों के मुँह बंद कर दिये। सबसे बड़ी बात ये हुई कि भारत ने अपने रक्षा सौदों को एक - दो देशों तक सीमित न रखते हुए राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी और बिना दबाव के उन्हें अंतिम रूप दिया। विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस ने इन सौदों पर प्रधानमंत्री को घेरने का हरसंभव प्रयास किया । 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री को घेरने के लिए चौकीदार चोर है जैसा नारा बुलंद किया किंतु जनता ने उसे अनसुना करते हुए उनको पहले से अधिक सीटें देकर उनकी नीतियों का अनुमोदन कर दिया। जिसके बाद केंद्र सरकार का उत्साह और बढ़ा जिसके चलते उसने रक्षा सौदों के मामले में तेजी से निर्णय लेते हुए सेनाओं को अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित करने का अभियान छेड़ा। 2014 में जब ये सरकार सत्ता में आई तब हमारी सेनाएं उनकी कमी से जूझ रही थीं जिसकी जानकारी सार्वजनिक होने से जनता का मनोबल गिरने लगा । लेकिन अब स्थितियाँ बदल गईं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारी सैन्य शक्ति की क्षमता और श्रेष्ठता पूरी दुनिया के सामने प्रमाणित हो गई। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की महत्वाकांक्षा पूरी होने के लिए जरूरी है हम सैन्य शक्ति के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनें। और उससे भी बढ़कर ये कि रक्षा उत्पादन में विदेशों पर हमारी निर्भरता घटने के बाद हम अपने अस्त्र - शस्त्रों का निर्यात कर सही मायनों में महाशक्ति बनें। गौरव का विषय है कि भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं। वियतनाम के बाद अब इंडिनेशिया ने भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का सौदा किया जिस पर उसकी राजधानी  जकार्ता में गत दिवस प्रधानमंत्री श्री मोदी ने  वहाँ के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ हस्ताक्षर किये। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में व्यापारिक भागीदारी को लेकर भी अनेक समझौते किये गए जिनमें धरती से अंतरिक्ष तक चलने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ शामिल हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने इंडोनेशिया के सबाँग बंदरगाह को विकसित करने का जो समझौता किया वह मलक्का जल डमरूमध्य में भारत की उपस्थिति को मजबूती प्रदान करने वाला है जिससे इस क्षेत्र के समुद्र में चीन के बढ़ते दबदबे को चुनौती दी जा सकेगी। उल्लेखनीय है दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देश चीन की विस्तारवादी नीतियों से भयभीत होकर भारत के साथ जुड़ना चाह रहे हैं। वियतनाम के बाद इंडिनेशिया के साथ हुए समझौते इसके प्रमाण हैं। जाहिर है भारत अब एक क्षेत्रीय महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करने में सफल हो रहा है। प्रधानमंत्री की ये यात्रा इस दिशा में बढ़ाया गया बड़ा कदम है। सबाँग बंदरगाह के विकास का अनुबंध चीन की उस चाल का सटीक जवाब है जो उसने हाल ही में बांग्लादेश के एक बंदरगाह को हथियाकर चली थी। पहले ये सौदा भारत के साथ होना था। इस प्रकार इंडोनेशिया की इस यात्रा से श्री मोदी ने एक साथ कई लक्ष्य साधे। मौजूदा वैश्विक हालातों में भारत की ये उल्लेखनीय सफलता है जिसका असर  निकट भविष्य में महसूस होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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