इन दिनों पेट्रोल में एथेनॉल मिलाए जाने का मामला सुर्खियों में है। पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल (E20) के मिश्रण की योजना सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए लागू की गई है । इसके अंतर्गत अधिकांश पेट्रोल पंपों पर अब 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ही उपलब्ध है। पर्यावरण संरक्षण और आयात खर्च घटाने के अलावा पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण को किसानों की आय बढ़ाने का साधन भी बताया जा रहा है। सतही तौर पर तो ये देशहित में प्रतीत होता है किंतु इसके साथ ही कुछ विवाद भी उठ खड़े हुए हैं । केंद्र सरकार के परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पर आरोप है कि उन्होंने अपने बेटे को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने का फैसला करवाया जिसकी फैक्टरी में इसका उत्पादन होता है। ये भी कहा जा रहा है कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा थोड़ी कम होती है, जिसके कारण वाहनों की माइलेज में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। साथ ही यदि वाहन एथेनॉल के अनुकूल नहीं है (विशेषकर पुरानी गाड़ियां), तो इंजन के फ्यूल पाइप या पंप में जंग लगने की शिकायत आ सकती है। दूसरी तरफ ये दावा भी किया जा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में बनी अधिकांश गाड़ियां पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।। साथ ही जो वाहन चालक एथेनॉल रहित पेट्रोल उपयोग करना चाहते हैं वे प्रीमियम पेट्रोल का विकल्प चुन सकते हैं, जिनमें एथेनॉल की मात्रा न के बराबर या बहुत कम होती है। दुनिया के अनेक देशों में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का चलन बढ़ रहा है। लेकिन उन्होंने उसके अनुकूल वाहनों का उत्पादन करने के बाद ही इस दिशा में कदम बढ़ाये। लेकिन भारत में निर्धारित समय से पहले ही उसे लागू करने के कारण सवाल उठ खड़े हुए। इसे लेकर केंद्र सरकार पर नीतिगत हमलों से ज्यादा श्री गडकरी पर व्यक्तिगत निशाने साधे जा रहे हैं। इसका कारण उनके परिवार का एथेनॉल उत्पादन से जुड़ा होना है । उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे। इसे भाजपा के भीतर चल रही खेमेबाजी से भी जोड़कर देखा जाने लगा। ये अटकलें भी लगने लगीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निकट भविष्य में अपने मंत्रीमंडल में किये जाने वाले फेरबदल में श्री गडकरी को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। यद्यपि ऐसा होना काफी कठिन है क्योंकि एक तो उन्हें रास्वसंघ की पसंद माना जाता है और दूसरा ये कि मोदी सरकार की विकास मूलक छवि के निर्माण में परिवहन मंत्रालय का प्रमुख योगदान है। आज देश में सड़कों विशेष रूप से राजमार्गों और एक्सप्रेस हाइवे का जो जाल बिछा है उसका श्रेय श्री गडकरी के खाते में ही दर्ज होता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनकी लोकप्रियता दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर है। ऐसे में उनकी घेराबंदी से सरकार भी दबाव में आ रही थी। संभवतः यही देखकर वे सामने आये और पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण से निजी लाभ के आरोप का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि उसके उत्पादन में उनके बेटे की इकाई की हिस्सेदारी महज 0.07 प्रतिशत तक ही सीमित है। इसके साथ ही उन्होंने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के इंजिन को होने वाले नुकसान के प्रचार को निराधार बताते हुए चुनौती दी कि जिस किसी के वाहन को क्षति पहुंची हो वह आकर बताये। अब, कितने लोग अपनी शिकायतें लेकर मंत्री जी तक पहुँचेगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु कांग्रेस के प्रवक्ता तहसीन पूनावाला ने श्री गडकरी द्वारा निजी फायदा न होने के दावे पर पलटवार करते हुए कहा कि 0.07 प्रतिशत हिस्सेदारी से भी 50 से 100 करोड़ आय हो सकती है। खैर, राजनीति अपनी जगह है लेकिन एथेनॉल को लेकर जो संदेह आम उपभोक्ता के मन में है उसे दूर करना जरूरी है। विदेशी मुद्रा की बचत के अलावा पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने में जनता पूर्णतः सरकार के साथ है किंतु अपने वाहन को नुकसान हो ये किसी को स्वीकार नहीं होगा। इसके अलावा चूंकि एथेनॉल अपेक्षाकृत सस्ता है लिहाजा उसको मिलाने के बाद पेट्रोल के दाम भी उसी अनुपात में कम किये जाने जरूरी हैं। बेहतर हो केन्द्र सरकार पूरे प्रकरण पर विस्तारपूर्वक आलोचनाओं का बिंदुवार जवाब दे जिससे कि भ्रांति दूर की जा सके। ये बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि एथेनॉल का उपयोग निर्धारित समय सीमा से पहले करने का कारण क्या है ? हालांकि इस बारे में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर द्वारा संसद में दिये जा रहे वक्तव्य का वीडियो भी काफी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाये जाने की तरफदारी करते सुने जा सकते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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