Monday, 2 November 2026

रामलीला मैदान की रैली से सपा फायदे में कांग्रेस खाली हाथ



मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाये जाने की मांग को लेकर गत दिवस दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की महारैली में कितने लोग आये इसे लेकर परस्पर विरोधी दावे हो रहे हैं। विपक्षी खेमा इस बात को लेकर उत्साहित है कि जनमत उसकी तरफ झुक रहा है। दूसरी तरफ भाजपा का प्रचार तंत्र रामलीला मैदान के खाली पड़े रहे  हिस्सों के साथ उन कुर्सियों के चित्र प्रसारित करने में जुटा रहा जिन पर कोई भी बैठा नहीं था। ड्रोन से लिए गए चित्रों  में दर्शाई गई भीड़ के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि ए. आई तकनीक का इस्तेमाल कर मैदान को भरा दिखाया गया जबकि हकीकत में रैली में शामिल विपक्षी दल दावों के मुताबिक लोग नहीं ला सके। खैर, भीड़ कितनी आई ये उतना मायने नहीं रखता जितना ये कि विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस ने लंबे समय बाद अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। अन्य विपक्षी पार्टियों की बात करें तो आम आदमी पार्टी का रैली में शामिल नहीं होना पहले से तय था क्योंकि पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव में उसका कांग्रेस से मुख्य मुकाबला होने वाला है।  गठबंधन के अन्य सदस्यों में द्रमुक भी कांग्रेस के तमिलनाडु में जोसेफ विजय की सरकार का हिस्सा बनने से नाराज  होने से रैली से दूर रही। बीजू जनता दल और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने भी कांग्रेस का न्यौता स्वीकार नहीं किया। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की गैर मौजूदगी चौंकाने वाली रही। उसके मुखिया अभिजीत दिपके ने इसका कारण ये बताया कि वे अपनी पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखेंगे। इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य पार्टियों के नेता तो मंच पर नजर आये किंतु रैली में मौजूद  संवाददाताओं और विश्लेषकों की मानें तो इसके सबसे बड़े लाभार्थी अखिलेश यादव रहे । कहा जा रहा है रामलीला मैदान में आये 60 से 70 फीसदी लोग उ.प्र के थे जिन्हें या तो समाजवादी पार्टी लेकर आई या फिर दिल्ली से सटे प. उतर प्रदेश के वे किसान जो किसान आंदोलन के समय से भाजपा विरोधी हैं।  आयोजन की सूत्रधार कांग्रेस थी इसलिए मुख्य आकर्षण राहुल गाँधी रहे।  आने वाले कुछ महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें सर्वाधिक चर्चा उ.प्र की है जहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटें जीत जाने के बाद समाजवादी पार्टी का हौसला बुलंद  है। वहीं भाजपा  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त है । मायावती और ओवैसी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हाथ पाँव मार रहे हैं। लेकिन कांग्रेस सबसे दयनीय स्थिति में है। प्रदेश संगठन में बदलाव के बावजूद वह मुकाबले में नजर नहीं आ रही। उम्मीद थी कि रामलीला मैदान में अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव में विपक्षी एकता की रूपरेखा स्पष्ट करेंगे । उन्होंने मंच का उपयोग अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए तो किया किंतु  कांग्रेस की मांग अनुसार सीटें छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया। ये बात पूरी तरह सही है कि कल के जलसे का सबसे ज्यादा फ़ायदा समाजवादी पार्टी को  ही हो सकता है क्योंकि उ.प्र का काफी हिस्सा दिल्ली से सटा हुआ जो है। एक और बात जो इस रैली में देखने मिली वह थी विपक्ष द्वारा किसी भावी कार्ययोजना का ऐलान न करना। दीपावली बाद चुनाव वाले राज्यों के नेता उसमें व्यस्त हो जाएंगे। आज की स्थिति में कांग्रेस के लिए केवल पंजाब में उम्मीद की हल्की सी किरण है। उ.प्र में वह पूरी तरह अखिलेश यादव के रहमो - करम पर निर्भर है वहीं उत्तराखंड में भी उसकी संभावनाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। आगामी वर्ष के अंत में हिमाचल और गुजरात में होने वाले चुनाव में भी भाजपा की जीत तय है। आम आदमी पार्टी भी यहाँ कांग्रेस की जड़ें खोदने में लगी है। ये सब देखते हुए आपसी खींचतान छोड़कर  भाजपा के विरोध में ठोस  गठबंधन बनाकर विपक्षी मतों में बंटवारे को रोकने जैसा फैसला होता तब इस रैली की  सफलता स्वप्रमाणित हो जाती। लेकिन पूरा जमावड़ा वोट चोरी और ज्ञानेश कुमार जैसे मुद्दे पर सिमट गया जिसके प्रति  जनता में कोई रुचि नहीं है। बेहतर होता संघर्ष की भावी रूपरेखा ही पेश कर दी जाती। लेकिन बजाय कोई ठोस बात करने के श्री गाँधी सहित मंच पर बैठे सभी नेता उन्हीं बातों और आरोपों को दोहराते रहे जो बीते कई महीनों से सुनाई दे रहे हैं। चूंकि रैली में आये ज्यादातर नेता सत्ता गँवा चुके हैं। इसलिए वे अपनी खीझ निकालते रहे लेकिन  सही बात ये है कि उन सबने एक दूसरे को हरवाया है। प. बंगाल और केरल इसके जीवंत प्रतीक हैं। जहाँ तक बात कांग्रेस की है तो जब तक वह उ.प्र और बिहार में दोबारा खड़ी नहीं होती तब तक राष्ट्रीय स्तर पर उसकी वापसी असम्भव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी