रूस - यूक्रेन और अमेरिका - ईरान की जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। पूरी दुनिया इन युद्धों से हलाकान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। कच्चे तेल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित होने से अभूतपूर्व ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग बंद किये जाने से प. एशिया के तेल उत्पादक देशों का व्यापार ठप होकर रह गया है। दोनों तरफ से बरसाई जा रही बारूद ने तेल रिफ़ाइनरियों को या तो तबाह कर दिया या जबरदस्त नुकसान पहुंचाया जिसके कारण उनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हो गई। अमेरिका होर्मुज खोलने का साहस दिखाता भी है तो ईरान तेल वाहक जहाजों पर मिसाइलें दागकर दहशत फैलाने से बाज नहीं आता। उसका दावा है वह इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी ऐसी ही धमकी दे रहे हैं। दूसरी तरफ यूक्रेन पर रूसी हमले को शुरू हुए बरसों बीत गए। प्रारंभ में लगता था दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्तियों में शामिल रूस के सामने यूक्रेन दो - चार दिनों में ही घुटने टेक देगा । रूस द्वारा उसके सीमावर्ती भूभाग पर कब्जा जमा लेने से उक्त सम्भावना और मजबूत हो गई । लेकिन जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार यूक्रेन धीरे - धीरे ही सही रूस के कब्जे से अपनी खोई हुई जमीन वापस लेता जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि उसने रूस जैसे कच्चे तेल और गैस संपन्न देश में तेल संकट उत्पन्न कर दिया। बजाय बड़े लड़ाकू विमानों के छोटे - छोटे ड्रोन के जरिये इस विश्व शक्ति के बड़े - बड़े तेल शोधन संयंत्रों को नष्ट कर डाला। परिणामस्वरूप राजधानी मॉस्को तक में पेट्रोल पंप खाली पड़े हैं। ये उस देश की हालत है जो कल तक बड़े पैमाने पर तेल और गैस निर्यात किया करता था। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की स्थिति रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तुलना में अत्यंत दयनीय बताई जाती थी। लेकिन खैरात के हथियारों से लड़ने वाले यूक्रेन ने रूस की अपार सैन्य क्षमता की पोल खोलकर रख दी। इस युद्ध के कारण रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का दुष्प्रभाव भी अब असर दिखाने लगा है। कमोबेश ऐसी ही हालत प. एशिया में चल रहे युद्ध में खुद को दुनिया का खलीफा समझने वाले अमेरिका की देखने मिल रही है जो हजारों मिसाइलें दागने और पूरे देश को मलबे के ढेर में बदल देने के बाद भी ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब साबित हुआ है। यूक्रेन की तरह ईरान को भी इस लड़ाई में अकल्पनीय क्षति पहुंची है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता पर तो विपरीत असर पड़ा ही अन्य क्षेत्रों में भी भारी तबाही झेलनी पड़ी। सरकार और सेना में पदस्थ अनेक शीर्ष हस्तियां मारी गईं। सड़क, पुल, कारखाने तबाह हो गए। हजारों नागरिक जान गँवा बैठे। लड़ाई शुरू होते ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई की जिस तरह ह्त्या हुई उसके बाद ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि वह अमेरिका के सामने झुक जाएगा। लेकिन उसने उन सभी अरब देशों को निशाना बनाने जैसा दुस्साहस कर डाला जिनमें अमेरिका के सैन्य अड्डे थे । इन देशों को ये गुमान था कि अमेरिका उनका अभेद्य रक्षा कवच है। और इसीलिए वे ईरान विरोधी शिविर में जाकर बैठे हुए थे। लेकिन ईरान ने उनकी खुशफहमी को तो धक्का पहुंचाया ही अमेरिका के सर्वशक्तिमान होने के अहंकार को भी जबरदस्त चोट पहुंचा दी। युद्धविराम करते समय भी उसने डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी शर्तों पर रजामंदी न देकर बता दिया कि भारी नुकसान के बाद भी वह आत्म समर्पण नहीं करेगा। बीते कुछ दिनों में युद्धविराम की जिस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं उन्हें देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अमेरिका की अब तक की पूरी रणनीति नाकामयाब रही है। यहाँ तक कि इजराइल की रक्षा प्रणाली तक ईरान के हमलों को रोक पाने में विफल साबित हुई। उक्त दोनों लड़ाइयों ने दुनिया की दो महाशक्तियों की दादागिरी को जबरदस्त चोट पहुंचाई है। रूस की विशाल सैन्य शक्ति जहाँ यूक्रेन को झुकाने में नाकामयाब रही वहीं अमेरिका के बेहद आक्रामक रवैये के बावजूद ईरान झुकने के लिए तैयार नहीं है। कुछ महीनों पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी दी तब यूरोप के वे छोटे - छोटे देश तक उनके विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठ गए जो दूसरे महायुद्ध के बाद से अमेरिका के संरक्षण में रह रहे थे। इस प्रकार मौजूदा परिदृश्य में विश्व का शक्ति संतुलन बदलता प्रतीत हो रहा है। रूस और अमेरिका जहाँ अपने ही बनाये जाल में फंसने के बाद उससे निकल नहीं पा रहे वहीं चीन बिना उलझे चुपचाप अपनी स्थिति मज़बूत करता जा रहा है। आने वाले समय में विश्व की महाशक्तियों को लेकर कुछ और भ्रम भी टूटना तय है। दुनिया को अपनी मुठ्ठी में बन्द करने का दम्भ भरने वाले चन्द देश अपने अंतर्विरोधों के चलते प्रभाव खोते जा रहे हैं। इसके चलते वैश्विक शक्ति केंद्र पश्चिम से खिसक कर पूरब अर्थात एशिया की तरफ बढ़ रहा है। और इसीलिए भारत और चीन के महत्व तथा प्रभुत्व में उत्तरोत्तर वृद्धि दिखाई देने लगी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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