अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये टैरिफ युद्ध ने एक नई तरह की उथल - पुथल को जन्म दिया जिसके कारण अंतराष्ट्रीय व्यापार की समूची स्थापित व्यवस्था के मानदंड टूट - फूट गए। दरअसल ट्रम्प का घोषित उद्देश्य कम आयात शुल्क के कारण अमेरिका को होने वाले व्यापार घाटे में कमी लाना था जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। लेकिन जोश में होश खो बैठने वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए उन्होंने टैरिफ रूपी अस्त्र से दुनिया भर को एक साथ आतंकित करने की जो मूर्खता की उसके कारण सभी प्रमुख देशों ने अपने आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए अमेरिका पर निर्भरता घटाने की मुहिम छेड़ दी। परिणामस्वरूप नये - नये व्यापार समझौते होने लगे। उसी का एक उदाहरण भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता है जो आज से लागू हो गया। उल्लेखनीय है ट्रम्प के टैरिफ दबाव के जवाब में नरेंद्र मोदी सरकार का ये छटवाँ मुक्त व्यापार समझौता है। इसके पूर्व भारत मॉरीशस, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ) और ओमान के साथ ऐसे ही समझौते हस्ताक्षरित कर चुका है। यही वजह है कि अमेरिका के साथ विचाराधीन नया व्यापार समझौता करने में भारत ने जल्दबाजी नहीं दिखाई और ट्रम्प द्वारा थोपी गई इकतरफा शर्तों को मंजूर नहीं किया। ब्रिटेन के साथ जो ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता आज, 15 जुलाई 2026 से लागू हुआ उसके अंतर्गत भारत द्वारा निर्यात किये जाने वाले लगभग 99% उत्पादों पर ब्रिटेन ने आयात शुल्क शून्य कर दिया है। समझौते की मुख्य बातों पर नज़र डालें तो इससे विशेष तौर पर भारतीय कपड़ा, चमड़े से बनी चीजें , सोने - चांदी के जेवरात, , समुद्री खाद्य (मछली आदि) और इंजीनियरिंग सामग्री के अलावा कृषि उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बड़े पैमाने पर आयात शुल्क-मुक्त बाजार उपलब्ध होगा। दूसरी तरफ भारत सरकार ब्रिटेन से आयातित वस्तुओं पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती करेगी। इनमें स्कॉच व्हिस्की का टैरिफ 150% से घटाकर 40% करने के अलावा ब्रिटेन में बनी पूरी तरह तैयार कारों (सहित इलेक्ट्रिक वाहनों) पर आयात शुल्क धीरे - धीरे 110% से घटाकर 10% तक लाया जाएगा। इसके साथ ही ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के लिए कार्य शर्तों का सरलीकरण भी इस समझौते का हिस्सा हैं। भारत ने सेब, अखरोट, सहित कुछ बीज, सोने की ईंटों व स्मार्टफोन जैसे संवेदनशील उत्पादों पर कोई शुल्क रियायत नहीं दी है। वहीं ब्रिटेन ने भी चावल, चीनी व कुछ मांस उत्पादों को समझौते के दायरे से बाहर रखा । समझौते में प्रावधान है कि भारत से ब्रिटेन जाने वाले कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं को पांच वर्ष तक ब्रिटेन में सोशल सिक्योरिटी योगदान नहीं देना होगा जो आईटी कंपनियों को राहत प्रदान करने वाला है। इनके अलावा भी ऐसे अनेक बिंदु हैं जिनमें दोनों, पक्षों के हितों को संवर्धन होगा। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ से भी चूंकि ऐसा ही समझौता किया जा चुका है इसलिए अब समूचे यूरोप के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते तो मज़बूत होंगे ही कूटनीतिक संबंधों में भी मिठास आयेगी। कुल मिलाकर ये मुक्त व्यापार समझौते अमेरिका के टैरिफ आतंक के विरुद्ध की गई मोर्चेबंदी है जिसमें भारत के साथ उन देशों ने भी समझौते करने में कोई झिझक नहीं दिखाई जो अमेरिकी शिविर के माने जाते हैं। इनसे एक बात स्पष्ट हो गई कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं अपितु उत्पादक के तौर पर भी अपनी जगह बनाता जा रहा है। सबसे खुशनुमा पहलू ये है कि अब तक जिन - जिन देशों से मुक्त व्यापार समझौते किये गए उन सभी में अप्रवासी मूल के भारतवंशियों की बड़ी संख्या है। उनमें से कुछ वहाँ स्थायी तौर पर बस जाने के बाद भी भारतीय जीवन शैली से जुड़े होने से भारतीय वस्तुओं के उपभोक्ता हैं। उनके अलावा पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के भी जो नागरिक उक्त देशों में रहते हैं वे भी भारतीय उत्पादों के मुरीद होने से उनकी मांग रहती है। इसीलिए मुक्त व्यापार समझौता लागू होने से हमारे निर्यात को मजबूती मिलने के साथ ही अमेरिका के टैरिफ से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकेगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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