Thursday, 3 September 2026

मनुस्मृति जलाने से कांग्रेस को नुकसान ही होगा



हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा मंच का शुद्धिकरण किये जाने की कांग्रेस ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उस कृत्य के दोषी भाजपा कार्यकर्ताओं पर प्रकरण दर्ज करने की मांग की थी। पार्टी का आरोप है कि  दलित नेता के अपमान के दोषियों को  कटघरे में खड़ा करने के बजाय उल्टे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध मामला दायर कर दिया गया। इसके विरोध में देश भर में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन करते हुए भाजपा को दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताया। यहाँ तक तो ठीक था  लेकिन इसके आगे जो हुआ और जो होने की चर्चा चल रही है उसके कारण श्री खरगे को जो सहानुभूति और कांग्रेस को राजनीतिक बढ़त हासिल हुई उस पर पानी फिरना तय है । जो खबरें आईं उनके अनुसार श्री गाँधी ने युवा कांग्रेस को निर्देश दिये हैं कि रा. स्व. संघ और भाजपा के दफ्तरों के सामने मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाएं। उसके बाद युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब के नेतृत्व में दिल्ली में संघ और भाजपा  मुख्यालय के बाहर मनुस्मृति की प्रतियां और पन्ने जलाकर विरोध प्रदर्शन किया गया । साथ ही पूरे देश में ऐसा ही प्रतीकात्मक विरोध करने की घोषणा भी की गई । दरअसल आजकल श्री गाँधी पर दलितों का हितचिंतक बनने का भूत सवार है। लेकिन न तो उनके पास कोई वैचारिक पृष्ठभूमि है और न ही व्यक्तित्व। दलितों के बीच जाकर काम करने का  अनुभव भी इतना नहीं है जिसके आधार पर उनके दलित प्रेम को निश्छल और स्वाभाविक माना जाए। कभी - कभार किसी दलित के घर जाकर भोजन करने का नाटक तो प्रायः सभी नेता करते हैं ।  इसीलिए इन नौटंकियों का कोई असर नही होता। दरअसल श्री गाँधी आज तक यही नहीँ समझ सके कि जनता के दिलों में जगह कैसे बनाई जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विफलता और दिशाहीनता का पर्याय बन कर रह गया। एक समय था जब उच्च जातियों के साथ ही दलित समुदाय में भी कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। उ.प्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। लेकिन कालांतर में पार्टी के हाथ से दोनों खिसकते गए। सवर्णों का बहुमत भाजपा के साथ जा मिला वहीं दलितों को बसपा ने खींच लिया। यादव और मुसलमान सपा के पाले में चले आये। परिणामस्वरूप कांग्रेस घुटनों के बल आ गई। उ.प्र जैसी हवा अन्य राज्यों में भी बहने से कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ गई। बदहवासी में राहुल ब्राह्मण होने का स्वांग रचते देखे गये। उन्हें लगा इससे कांग्रेस का सवर्ण वोट बैंक वापस आ जाएगा। लेकिन राज्य दर राज्य पराजय का मुँह देखने के बाद उन पर जाति आधारित जनगणना की धुन सवार हुई। लेकिन वह भी काम नहीं आई तब वे जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व का ढोल पीटने लगे। हालांकि उनके राजनीतिक व्यवहार में कृत्रिमता और अक्खड़पन होने से हर दाँव उल्टा पड़ता गया। निराश होकर वे समाज में जातीय संघर्ष पैदा करने में जुट गए और बतौर औजार उस मनुस्मृति का इस्तेमाल करने लगे जो सामाजिक, वैधानिक और यहाँ तक कि आध्यात्मिक तौर पर भी पूर्णतः अप्रासंगिक हो चली थी। सामान्यतः हिंदुओं के घरों में रामायण, श्रीमद् भागवत और गीता होती है। गिने - चुने लोग वेद - पुराण भी संग्रहित करते हैं। अन्य धार्मिक पुस्तकें एवं पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक भी हैं किंतु मनुस्मृति पूरी तरह विस्मृत हो चुकी थी। किसी भी प्रवचन या धार्मिक अनुष्ठान में उसका उल्लेख अपवादस्वरूप ही सुनाई देगा। ऐसे में न जाने किसने श्री गाँधी को समझाइश दे दी कि  मनुस्मृति का सहारा लें तो शायद उनकी नैया पार लग जाए। इसीलिए संविधान की किताब लेकर घूमने वाले राहुल , मनुस्मृति लिए घूम रहे हैं। उनको लगता था कि पूरा दलित समुदाय उनके पीछे चल पड़ेगा किंतु एक बार फिर वे गलत साबित होने जा रहे हैं। उनकी मुहिम का असर ये हुआ कि मनुस्मृति देखते ही देखते राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई। इस ग्रंथ को महिला विरोधी प्रचारित करने की उनकी चाल उल्टी पड़ी और सोशल मीडिया पर मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान में कही गई बातों के उद्धरण देकर लोगों ने श्री गाँधी का मजाक उड़ाने के साथ ही ये चुनौती दे डाली कि हिम्मत है तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा पर कुछ बोलकर बताएं । अब मनुस्मृति को जलाने जैसी मूर्खता के कारण वे उस सवर्ण मतदाता को वापस भाजपा की ओर जाने मजबूर कर रहे हैं जो यूजीसी जैसे विवादों के चलते उससे छिटकने का मन बना रहा था। राहुल भूल गए कि उ.प्र में दलितों के मसीहा बनने के फेर में रामचरित मानस जलाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके  हैं। ऐसा लगता है श्री गाँधी के सलाहकारों को भारत के लोगों की मानसिकता का लेश मात्र भी पता नहीं है । इसीलिए वे बजाय पिछली गलतियों से सबक लेने के उन्हें नई गलतियां करने के लिए उकसाते हैं। 

मनुस्मृति जलाने से कांग्रेस को नुकसान ही होगा

हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा मंच का शुद्धिकरण किये जाने की कांग्रेस ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उस कृत्य के दोषी भाजपा कार्यकर्ताओं पर प्रकरण दर्ज करने की मांग की थी। पार्टी का आरोप है कि  दलित नेता के अपमान के दोषियों को  कटघरे में खड़ा करने के बजाय उल्टे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध मामला दायर कर दिया गया। इसके विरोध में देश भर में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन करते हुए भाजपा को दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताया। यहाँ तक तो ठीक था  लेकिन इसके आगे जो हुआ और जो होने की चर्चा चल रही है उसके कारण श्री खरगे को जो सहानुभूति और कांग्रेस को राजनीतिक बढ़त हासिल हुई उस पर पानी फिरना तय है । जो खबरें आईं उनके अनुसार श्री गाँधी ने युवा कांग्रेस को निर्देश दिये हैं कि रा. स्व. संघ और भाजपा के दफ्तरों के सामने मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाएं। उसके बाद युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब के नेतृत्व में दिल्ली में संघ और भाजपा  मुख्यालय के बाहर मनुस्मृति की प्रतियां और पन्ने जलाकर विरोध प्रदर्शन किया गया । साथ ही पूरे देश में ऐसा ही प्रतीकात्मक विरोध करने की घोषणा भी की गई । दरअसल आजकल श्री गाँधी पर दलितों का हितचिंतक बनने का भूत सवार है। लेकिन न तो उनके पास कोई वैचारिक पृष्ठभूमि है और न ही व्यक्तित्व। दलितों के बीच जाकर काम करने का  अनुभव भी इतना नहीं है जिसके आधार पर उनके दलित प्रेम को निश्छल और स्वाभाविक माना जाए। कभी - कभार किसी दलित के घर जाकर भोजन करने का नाटक तो प्रायः सभी नेता करते हैं ।  इसीलिए इन नौटंकियों का कोई असर नही होता। दरअसल श्री गाँधी आज तक यही नहीँ समझ सके कि जनता के दिलों में जगह कैसे बनाई जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विफलता और दिशाहीनता का पर्याय बन कर रह गया। एक समय था जब उच्च जातियों के साथ ही दलित समुदाय में भी कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। उ.प्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। लेकिन कालांतर में पार्टी के हाथ से दोनों खिसकते गए। सवर्णों का बहुमत भाजपा के साथ जा मिला वहीं दलितों को बसपा ने खींच लिया। यादव और मुसलमान सपा के पाले में चले आये। परिणामस्वरूप कांग्रेस घुटनों के बल आ गई। उ.प्र जैसी हवा अन्य राज्यों में भी बहने से कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ गई। बदहवासी में राहुल ब्राह्मण होने का स्वांग रचते देखे गये। उन्हें लगा इससे कांग्रेस का सवर्ण वोट बैंक वापस आ जाएगा। लेकिन राज्य दर राज्य पराजय का मुँह देखने के बाद उन पर जाति आधारित जनगणना की धुन सवार हुई। लेकिन वह भी काम नहीं आई तब वे जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व का ढोल पीटने लगे। हालांकि उनके राजनीतिक व्यवहार में कृत्रिमता और अक्खड़पन होने से हर दाँव उल्टा पड़ता गया। निराश होकर वे समाज में जातीय संघर्ष पैदा करने में जुट गए और बतौर औजार उस मनुस्मृति का इस्तेमाल करने लगे जो सामाजिक, वैधानिक और यहाँ तक कि आध्यात्मिक तौर पर भी पूर्णतः अप्रासंगिक हो चली थी। सामान्यतः हिंदुओं के घरों में रामायण, श्रीमद् भागवत और गीता होती है। गिने - चुने लोग वेद - पुराण भी संग्रहित करते हैं। अन्य धार्मिक पुस्तकें एवं पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक भी हैं किंतु मनुस्मृति पूरी तरह विस्मृत हो चुकी थी। किसी भी प्रवचन या धार्मिक अनुष्ठान में उसका उल्लेख अपवादस्वरूप ही सुनाई देगा। ऐसे में न जाने किसने श्री गाँधी को समझाइश दे दी कि  मनुस्मृति का सहारा लें तो शायद उनकी नैया पार लग जाए। इसीलिए संविधान की किताब लेकर घूमने वाले राहुल , मनुस्मृति लिए घूम रहे हैं। उनको लगता था कि पूरा दलित समुदाय उनके पीछे चल पड़ेगा किंतु एक बार फिर वे गलत साबित होने जा रहे हैं। उनकी मुहिम का असर ये हुआ कि मनुस्मृति देखते ही देखते राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई। इस ग्रंथ को महिला विरोधी प्रचारित करने की उनकी चाल उल्टी पड़ी और सोशल मीडिया पर मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान में कही गई बातों के उद्धरण देकर लोगों ने श्री गाँधी का मजाक उड़ाने के साथ ही ये चुनौती दे डाली कि हिम्मत है तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा पर कुछ बोलकर बताएं । अब मनुस्मृति को जलाने जैसी मूर्खता के कारण वे उस सवर्ण मतदाता को वापस भाजपा की ओर जाने मजबूर कर रहे हैं जो यूजीसी जैसे विवादों के चलते उससे छिटकने का मन बना रहा था। राहुल भूल गए कि उ.प्र में दलितों के मसीहा बनने के फेर में रामचरित मानस जलाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके  हैं। ऐसा लगता है श्री गाँधी के सलाहकारों को भारत के लोगों की मानसिकता का लेश मात्र भी पता नहीं है । इसीलिए वे बजाय पिछली गलतियों से सबक लेने के उन्हें नई गलतियां करने के लिए उकसाते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


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