Friday, 4 September 2026

मोदी का बढ़ता प्रभाव ट्रम्प को बर्दाश्त नहीं हो रहा



दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन के एक हफ्ते पहले अमेरिका ने धमकी दी है कि ईरान से व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने पर वह भारत पर भी वैसे ही आर्थिक प्रतिबंध लगा देगा जैसे उसने ईरान और रूस पर लगा रखे हैं। इस धमकी का कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच 31 अगस्त 2026 को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान हुई द्विपक्षीय बैठक है। जिसमें दोनों नेताओं ने भारत और ईरान के बीच पुरानी दोस्ती को और मजबूत करने का संकल्प लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने आने वाले समय में तेहरान के साथ व्यापार के दायरे को बढ़ाने और उसमें विविधता लाने की इच्छा व्यक्त की। प. एशिया में तनाव और संघर्ष की शुरुआत के बाद दोनों नेताओं की यह पहली आमने-सामने की मुलाकात थी। इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि कोई भी देश ईरान को प्रतिबंधों से बचने में मदद नहीं कर सकता।अगर कोई देश ईरान के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने में मदद करता है, जिससे वह पैसा कमा सके और उस धन का इस्तेमाल आतंकवाद को समर्थन देने या परमाणु हथियार बनाने में हो, तो अमेरिका ऐसे देशों पर भी प्रतिबंध लगाएगा। भारत सरकार ने इस पर तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर ये कहना कि जब तक राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए जा रहे अनाप - शनाप टैरिफ की दरें सामान्य नहीं जातीं तब तक यह डील अटकी रहेगी। इसे एक तरह से अमेरिकी विदेश मंत्री की धौंस का जवाब कहा जा रहा है। अमेरिका के दबाव के चलते ही भारत ने ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद किया जबकि ये खरीदी बजाय डॉलर के  भारतीय रुपये में होने से विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ नहीं पड़ता था। लेकिन उसके बाद रूस के साथ वैसी ही व्यवस्था होने से भारत में ऊर्जा संकट उत्पन्न नहीं हो सका। अमेरिका ने इस पर भी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि भारत द्वारा कच्चे तेल की खरीद से रूस को यूक्रेन के साथ लड़ाई लंबी खींचने की ताकत मिल रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा उसी कारण टैरिफ का भार बढ़ाया जाता रहा । उनका दबाव ये है कि भारत अमेरिका से तेल और गैस खरीदने के साथ ही वेनेजुएला से भी आयात करे जहाँ के तेल भंडारों पर अमेरिका ने जबरन कब्जा कर रखा है। हालांकि चीन भी भारत की तरह ही रूस के कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है ।  लेकिन भू - राजनीति के मद्देनजर ट्रम्प उसके प्रति उतने कठोर नहीं हो सके। बहरहाल अमेरिका की ताजा धमकी के पीछे का छिपा हुआ कारण ये भी है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ट्रम्प से मिलने वॅाशिंगटन नहीं गए। ऑपरेशन सिंदूर के बाद उन्होंने जिस प्रकार पाकिस्तान की तरफदारी करते हुए भारत को नीचा दिखाने का खेल खेला वह भारत को नागवार गुजरा। इसीलिए जब जी - 8 सम्मेलन में शामिल होने श्री मोदी कैनेडा गए तब उनके पहुँचने से पहले ही जरूरी कार्य के बहाने ट्रम्प वापस लौट गए। और फिर फोन पर प्रधानमंत्री को वाॅशिंगटन आमंत्रित कर  व्हाइट हाउस में दोपहर भोज पर बातचीत का प्रस्ताव दिया। लेकिन जब श्री मोदी को पता चला कि उसी भोज में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर भी रहेंगे तब उन्होंने ट्रम्प को फिर कभी मिलने का वायदा कर टरका दिया जो कि एक तरह से नाराजगी की अभिव्यक्ति ही थी। जाहिर है उससे ट्रम्प के अहं को चोट पहुंची और टैरिफ वृद्धि की उनकी धमकियाँ और तेज हो गईं।   उसके बाद गत जून माह में फ्रांस की राजधानी पेरिस में जी 7 सम्मेलन में जब दोनों का सामना हुआ तब ट्रम्प ने श्री मोदी से अकेले में बात करते हुए उन्हें अपना दोस्त बताकर खुश करना चाहा किंतु भारत ने अपने तौर - तरीके नहीं बदले। अमेरिका के ऐलानिया धमकियों के बावजूद रूस से तेल सहित सैन्य सौदे लगातार हो रहे हैं। किर्गिस्तान के हालिया शिखर सम्मेलन में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की नजदीकी देखने के अलावा ईरानी राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री की निजी बातचीत ने अमेरिका का गुस्सा बढ़ा दिया है। उसे डर है ब्रिक्स के दिल्ली सम्मेलन में भारत, रूस, चीन, द. अफ्रीका और ब्राजील मिलकर किसी नये वैश्विक समीकरण को जन्म दे सकते हैं जो अमेरिकी चौधराहट के लिए खतरा बनेगा। इसीलिये उसने पहले से ही धमकी देना शुरू कर दिया लेकिन ट्रम्प के मूर्खतापूर्ण फैसलों से उनके साथ ही अमेरिका की धाक भी मिट्टी में मिल चुकी है। ईरान युद्ध में उसका दम फूलने लगा है। दूसरी तरफ भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी वजनदारी बढ़ाई है। ब्रिक्स सम्मेलन के बाद वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव होने की संभावना है जिसमें भारत महत्वपूर्ण भूमिका में होगा। और यही ट्रम्प की खिसियाहट का कारण है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


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