मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्पणियाँ कीं उनके बाद विपक्ष द्वारा उनके त्यागपत्र को लेकर किया जा रहा आंदोलन समय और शक्ति की बर्बादी ही है। हालांकि उसका ये अधिकार है कि लोकतंत्रिक तरीकों से आवाज उठाए क्योंकि इससे जनता को उनकी सक्रियता का पता चलता है। कांग्रेस पर ये आरोप लंबे समय से लगता आ रहा है कि वह विपक्ष की भूमिका का समुचित निर्वहन नहीं कर पा रही। राहुल गाँधी के बारे में ये अवधारणा जनमानस में घर कर चुकी थी कि वे सोशल मीडिया पर ही राजनीति करते हैं । महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान उनकी गुप्त विदेश यात्राएं भी आलोचना और उपहास का कारण बनती रहीं। उस लिहाज से बीते कुछ समय से उनका सक्रिय रहते हुए सरकार के विरोध में मुद्दे उठाना और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जाकर प्रत्यक्ष संवाद करना उनके और कांग्रेस दोनों के लिए लाभप्रद है । इन दिनों ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के विरुद्ध जो आंदोलन चल रहा है वह श्री गाँधी के लगातार किये जा रहे प्रयासों का परिणाम है। लेकिन इसी के साथ ही ये बात भी काबिले गौर है कि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के अलावा कॉकरोच जनता पार्टी सहित वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा किये जा रहे इस आंदोलन को हवा एक अखबारी रिपोर्ट से मिली। जिसमें ये दावा किया गया था कि चुनाव आयोग में कुछ ऐसे फैसले हुए जिनसे मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा शेष दो अन्य चुनाव आयुक्त सहमत नहीं थे। और ये भी कि दर्जन भर से ज्यादा निर्णयों में दोनों आयुक्तों ने अपनी सहमति नहीं दी जिसका सीधा मतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने बहुमत की उपेक्षा करते हुए उन्हें लागू किया। यद्यपि विपक्ष के पास इस आरोप की पुष्टि हेतु अब तक कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है और उसका आंदोलन भी संबंधित अखबारी समाचार पर आधारित है। फिर भी राहुल सहित कुछ और विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के निलंबन और गिरफ्तारी की मांग तक कर डाली। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कह दिया कि वह समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर ज्ञानेश कुमार को काम करने से नहीं रोकेगा। हालांकि न्यायालय द्वारा कही गई ये बातें विपक्ष को अच्छी लगी होंगी कि उसने फॉर्म - 6 में बदलाव की अनुमति नहीं दी और चुनाव आयोग में बिना बहुमत या सर्वसम्मति से कोई फैसला हुआ तब उसे रद्द कर दिया जाएगा। इस प्रकार चुनाव आयोग द्वारा लिए गए विवादित फैसलों के साथ ही ज्ञानेश कुमार का भविष्य अब सर्वोच्च न्यायालय के हाथ में हैं जिसने आयोग को नोटिस देकर जवाब मांगा है। उसके जवाब से सर्वोच्च न्यायालय कितना संतुष्ट होगा ये फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि आयोग पहले भी कह चुका था कि फॉर्म - 6 में किये परिवर्तन पर सर्वोच्च न्यायालय की सहमति थी। हालांकि बाद में इसे वापस ले लिया गया। इसके अलावा ये बात भी कही गई कि चुनाव आयोग में आयुक्तों के बीच चर्चा के दौरान असहमति तो होती है किंतु निर्णय सर्वसम्मति से होते हैं। आयोग जो जवाब देगा यदि उससे अदालत संतुष्ट नहीं हुई तब जरूर ज्ञानेश कुमार के अलावा केंद्र सरकार के लिए भी परेशानी पैदा होगी जिस पर श्री गाँधी सहित अन्य विपक्षी नेता वोट चोरी का आरोप लगाते आये हैं। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि जब मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है तब क्या विपक्ष को उसके फैसले का इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते तब इस आंदोलन को कितने दिन खींचा जा सकेगा? अभी तक जो संकेत मिले उनके अनुसार सरकार और ज्ञानेश कुमार दोनों झुकने को राजी नहीं दिखते। धर्मेंद्र प्रधान के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा भी विपक्ष की मांग पर त्यागपत्र देने से ये एहसास प्रबल होगा कि सरकार विपक्षी दबाव का सामना करने में असमर्थ है। इसी तरह ज्ञानेश कुमार को भी लग रहा होगा कि वे इस समय पद छोड़ते हैं तो वह एक तरह से विपक्ष के आरोपों की पुष्टि होगी। इन हालातों में इस विवाद का हल विपक्ष द्वारा किये जा रहे आंदोलन से नहीं अपितु सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से ही होगा। अब ये विपक्ष पर निर्भर है कि वह तब तक प्रतीक्षा करना चाहेगा या मुद्दे को गर्म बनाये रखने के लिए सड़कों पर अपना अभियान जारी रखेगा?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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