Thursday, 1 October 2026

छत पर वर्षा जल संचयन को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए



तमाम प्रयासों के बाद भी भारत में खेती मानसून पर ही आश्रित है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है। अच्छी फसल आने पर बाजार में रौनक आ जाती है। रोजगार प्रदाता के रूप में भी कृषि क्षेत्र का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। इसीलिये सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की वह ग्रामीण विकास के लिए बड़ा बजट आवंटित करती है। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ग्रामीण इलाकों को भी पक्की सड़कों से जोड़ने की जो योजना शुरू की गई उसने वहाँ विकास की रोशनी पहुंचाने में काफी मदद की। पहले गाँव के लोगों को अपनी जरूरतों के लिए शहर आकर बाजार के चक्कर लगाना होते थे किंतु अब बाजार खुद गाँव के चक्कर लगाने लगा है। सड़क और बिजली के आगमन से ग्रामीण भारत में जीवन स्तर भी उठा है। सुख - सुविधा के साधनों की माँग बढ़ी है। महंगी करें अब केवल शहरों में ही नहीं दिखतीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी उनकी मौजूदगी देखी जा सकती है। इन्हीं सबका प्रभाव है कि अब टीवी, फ्रिज, एयर कंडीशनर के साथ ही औटोमोबाइल के शो रूम छोटे कस्बों और शहरों में खुलने लगे हैं। दैनिक उपयोग की लगभग सभी चीजें ग्रामीण बाजार में भी आसानी से मिलने लगी हैं। अब तो अच्छे स्कूल और अस्पताल भी ग्रामीण क्षेत्रों के निकट खुल रहे हैं। लेकिन इन सब व्यापारिक गतिविधियों की सफलता का आधार खेती से होने वाली कमाई ही है। हालांकि सिंचाई के आधुनिक साधन और तौर तरीके कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए हैं किंतु जब तक पर्याप्त मानसूनी वर्षा न हो तब तक अच्छी फसल की उम्मीद करना बेकार है। इसीलिए इस वर्ष मानसून के विदा होते ही जो स्थिति सामने आई उसकी वजह से चिंता व्याप्त है। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार  वर्ष 2026 में सामान्य से तकरीबन 13 फीसदी वर्षा कम होने से देश का काफी बड़ा हिस्सा सूखे जैसे हालात का सामना कर रहा है। 43 प्रतिशत से अधिक जिलों में 20  से 72 फीसदी तक पानी की कमी दिखाई दे रही है। पंजाब, हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के पांचों राज्यों में मानसूनी बरसात कम रही। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जुलाई से सितंबर के बीच कई राज्यों में लगातार हफ़्तों  तक बरसात न होने के कारण खेतों में नमी का अभाव होने से रबी फसल के प्रभावित होने का खतरा हो गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कमजोर मानसून से आगामी फसल खराब होने की चिंता व्याप्त है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उत्तरी बिहार में मिट्टी की नमी दस साल के औसत से नीचे होना खतरे की घंटी है। केंद्रीय जल आयोग की  रिपोर्ट के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कई जलाशयों में भंडारण की कमी दर्ज की गई है। इस स्थिति में इस वर्ष कृषि उत्पादन के साथ ही पानी की कमी भी समस्या उत्पन्न करेगी ।  विशेष रूप से अगला ग्रीष्मकाल जनजीवन पर बुरा असर डालने वाला होगा। खरीफ फसल के गड़बड़ होने का असर दीपावली पर होने वाली खरीद पर ही नजर आने लगेगा। जाहिर है इसकी वजह से  जीडीपी में आ रहा उछाल भी रुक जाएगा। उपभोक्ता बाजार ठंडे रहे तो जीएसटी वसूली भी घटेगी। कुल मिलाकर मानसून की मेहरबानी न होना समूचे आर्थिक ढांचे को प्रभावित करने वाला है। भूजल का अविवेकपूर्ण दोहन भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।  दुर्भाग्य से बरसाती पानी को व्यर्थ बह जाने के बजाय जमीन के अंदर संचयित करने के लिए बनाई गई छत पर वर्षा जल संचयन ( रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग) की योजना के प्रति  गंभीरता न बरती जाने से कमजोर मानसून के बाद की चिंता बढ़ गई है। इस पद्धति के उपयोग से हैंड पम्प आदि के भूजल स्तर को बरकरार रखने में मदद मिलती है। घरों में जो नलकूप हैं उनको यदि छतों पर वर्षा जल संचयन से जोड़ दिया जाए तो कम बरसात के बाद भी वे सूखते नहीं। शहरों में कच्ची जमीन लगातार कम होने से बड़ी मात्रा में बरसाती पानी नाले में बह जाता है। सरकार ने सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए जो अनुदान योजना शुरू की उसके परिणामस्वरूप देश में सौर ऊर्जा उत्पादन में खासी वृद्धि देखी जा रही है किंतु छत पर वर्षा जल संचयन पर उतना जोर नहीं दिये जाने से जल संकट साल दर साल बढ़ता जा रहा है। स्थानीय निकाय भी नये निर्माण में इसको अनिवार्य बताते हैं किंतु निर्माण पूरा होने के बाद कोई देखने नहीं आता कि उसका पालन हुआ या नहीं? इस वर्ष उत्पन्न संकट के मद्देनज़र आवश्यक है प्रधानमंत्री इसे राष्ट्रीय अभियान बनाएं जिससे आगामी कुछ वर्षों में देश का भूजल स्तर बढ़ सके। मानसून कितना बरसेगा ये अनिश्चित होता है किंतु जो हमारे हाथ में है उसे तो किया ही जा सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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