सर्वोच्च न्यायालय की कड़ाई के बाद अब सरकार भी कैंसर की दवाइयों पर हो रही मुनाफाखोरी के विरुद्ध कदम उठाने जा रही है। इसके अंतर्गत 110 दवाओं के दाम घटाए जाएंगे। इसके प्रभावस्वरूप इन दवाओं पर मुनाफा अंकित अधिकतम मूल्य के 30 फीसदी से ज्यादा नहीं होंगे। अब तक ये दवाएं सरकारी नियंत्रण की सूची से बाहर रही हैं। इस फैसले से मरीजों के सालाना 2500 करोड़ बचेंगे क्योंकि ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों प्रकार की दवाइयाँ सस्ती होंगी। ये फैसला निश्चित रूप से जनहित में है किंतु ये सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद ही सरकार की नींद क्यों खुली? हालांकि वर्तमान केंद्र सरकार ने इसके पहले भी कैंसर सहित उच्च रक्त चाप और मधुमेह की दवाओं को सस्ता किया किंतु दवा कंपनियों और चिकित्सकों की मिलीभगत के चलते मरीजों से लूटपाट बेरोकटोक जारी रही। केन्द्र सरकार की आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत गरीबों और वरिष्ट नागरिकों को सरकारी और निजी अस्पतालों में 5 लाख तक के निःशुल्क इलाज की जो सुविधा दी गई उसमें भी घपलेबाजीे की शिकायतें लगातार मिल रहीं हैं। निजी अस्पताल वाले ऐसी सेवाएं और जांचों का बिल बना देते हैं जो न तो सरकार की योजनाओं में स्वीकृत होता है और न ही स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा मान्य किया जाता है। लेकिन इन योजनाओं के अलावा जो मरीज निजी अस्पतालों में भर्ती होते हैं उनसे दवाओं और उपकरणों आदि के पाँच - दस गुना दाम तक वसूले जाते हैं। अस्पताल परिसर में संचालित दवा दुकानों से ही खरीदने की मजबूरी के चलते मरीज और उसके परिजनों के समक्ष अपना शोषण होते देखकर भी चुप रहने की मजबूरी रहती है। ऐसा नहीं है कि सरकार इससे अनभिज्ञ हो किंतु जिस शासकीय अमले पर इसे रोकने का दायित्व है वही इसका संरक्षक बना रहता है। दवा कंपनियों द्वारा दिये जाने वाले कमीशन और सुविधाओं को रोकने की लाख कोशिशों के बाद भी वह बदस्तूर जारी है। निजी चिकित्सक द्वारा लिखी दवा उसके अपने क्लीनिक या फिर बगल वाली दुकान पर ही उपलब्ध होना अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। संक्षेप में कहें तो पूरे देश में मेडिकल माफिया का बोलबाला है जिसने समूचे चिकित्सा जगत को अपने शिकंजे में फंसा रखा है। अपवादस्वरूप कुछ चिकित्सकों को छोड़ दें तो ज्यादातर अंधाधुंध कमाई के फेर में वह शपथ भुला बैठे हैं जो चिकित्सक बनते समय उन्होंने ली। डॉक्टर को भगवान मानने जैसी भावना इसीलिए लुप्त हो चली है। निजी अस्पताल जहाँ अनाप - शनाप कमाई के अड्डे बन चुके हैं वहीं सरकारी चिकित्सा व्यवस्था ज्यादातर जगहों पर खुद ही बीमार है। वहाँ डॉक्टरों के अलावा नर्सिंग स्टाफ, जाँच के साधन और दवाइयों का टोटा आम बात है। समाचार माध्यमों द्वारा लगातार इस ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है। लेकिन सरकारी तंत्र कान में रुई ठूंसे बैठा रहता है। कभी - कभार कोई कार्रवाई करने का दिखावा भी होता है किंतु ले देकर वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति बनी रहती है। सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाएं सस्ती करने का रास्ता तो निकाल दिया किंतु ऐसी ही व्यवस्था अन्य दवाओं के अलावा इलाज में उपयोग आने वाली छोटी - छोटी चीजों के बारे में भी की जानी चाहिये। इसके अलावा निजी अस्पतालों के कमरों विशेष रूप से आईसीयू के किरायों पर भी लगाम लगानी चाहिए। इन अस्पतालों में आने वाले डॉक्टर पूरे वार्ड के मरीजों को देखते हैं लेकिन हर मरीज के बिल में मोटी फीस जोड़ दी जाती है। और भी ऐसी विसंगतियाँ हैं जिनकी सूची बहुत लंबी है। इतने बड़े देश में व्याप्त अव्यवस्था को एक झटके से सुधारना तो संभव नहीं । लेकिन सरकार चरणबद्ध योजना बनाये तो ये असंभव भी नहीं, बशर्ते नीति और नीयत दोनों सही हों। फिलहाल तो कैंसर की दवाओं को सस्ता करने की पहल स्वागत योग्य है। इसके साथ ही डॉक्टरों को जेनरिक दवाएं लिखने के लिए बाध्य किया जाना भी जरूरी है जो स्पष्ट निर्देश के बावजूद भी ब्रांडेड दवा लिखने से बाज नहीं आते। सरकार को ये बात समझ लेनी चाहिये कि मेडिकल माफिया पर लगाम कसे बिना बिना स्वस्थ भारत का सपना साकार नहीं हो सकेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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